भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

अध्याय अवतार-सामग्री २५५ अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तर महत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है । दसवें अध्याय में, १६४वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं, "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्ति-भावना भी उत्पन्न हुई और धीरे-धीरे विकसित होने लगी। बुल्के की दृष्टि में अवतारवाद एक भावनामात्र है। राम के आदर्शचरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी, वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ राम-भक्ति भी विकसित होने लगी।" परन्तु विष्णु, राम, कृष्ण अनादि काल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति भी अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है। बुल्के कहते हैं, "भारतीय भक्ति-मार्ग का सूत्रपात और विकास राम-भक्ति के शताब्दियों पूर्व हुआ था । वेदों में इसका बीजारोपण हुआ और भागवत धर्म में वह पल्लवित हुआ। बौद्ध धर्म और जैन-धर्म की भाँति भागवतों का भक्ति-मार्ग भी कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया रूप में उत्पन्न हुआ। लेकिन इसमें वेदों की निन्दा को स्थान नहीं मिला और इस प्रकार बाद में ब्राह्मण तथा भागवत धर्म के समन्वय के साथ वैष्णव धर्म की उत्पत्ति सम्भव हो सकी । इसमें भागवतों के देवता वासुदेव कृष्ण प्राचीन वैदिक देवता विष्णु के अवतार माने गये हैं। भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु नारायण वासुदेव कृष्ण में केन्द्रीभूत होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी । विष्णु के अवतार भी माने जाने लगे । जिनमें से रामावतार भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से सबसे महत्त्वपूर्ण है । फिर भक्तिमार्ग के इतिहास में भागवत धर्म तथा पाञ्चरात्र के साहित्य में शाण्डिल्यभक्तिसूत्र, नारदीयभक्तिशास्त्र, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभाचार्य के सम्प्रदायों में कृष्णावतार को प्रायः एकाधिकार मिला है।" परन्तु अपने उक्त कथन की पुष्टि में बुल्के ने कोई प्रमाण नहीं दिया। टिप्पणी में इनसाइक्लोपीडिया आव रिलीजन एण्ड एथिक्स के भक्तिमार्ग, हेमचन्द्रराय चौधरी के अर्ली हिस्ट्री आव वैष्णव सेक्ट, बलदेवप्रसाद मिश्र के तुलसीदर्शन को ही अपने कथन का आधार बताया है, जो कि स्वयं में ही प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उक्त कथन भारतीय साहित्य के विरुद्ध ही हैं। बुल्के भी वेदों में भक्तिमार्ग का बीज मानते हैं। पर वेद नित्य एवं अनादि हैं (दे० वेदप्रामाण्य ) । भागवतों का भक्तिमार्ग ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, किन्तु वह ब्राह्मण- धर्म का ही एक अंग है। साथ ही वैदिक धर्म से भिन्न कोई ब्राह्मण-धर्म है यह केवल पाश्चात्यों की कल्पना है। वेदों के आरण्यक, उपनिषद् भागों में ही उपासना और ज्ञान काण्ड का प्रतिपादन है। इसी लिए वेद त्रिकाण्ड कहा जाता है। वेदों में कर्मकाण्ड की तथा कर्मकाण्ड में भी अनेक निन्दाएँ मिलती हैं पर उन निन्दाओं का तात्पर्य विविक्षित अर्थ की स्तुति में ही होता है : "नहि निन्दा निन्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति ॥" "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥" (यजु० सं० ४०।९) उक्त प्रसङ्गों में वेदोक्त कर्मकाण्ड और उपासनात्मक ज्ञान दोनों की निन्दा है । पर यह निन्दा दोनों के समुच्चयानुष्ठान विधि के प्रशंसार्थ ही है। इस तरह कहीं कर्मकाण्ड की निन्दा देखकर इसे प्रतिक्रिया समझना भ्रान्ति ही है। महाभारत वेद का उपबृंहणमात्र है। श्रीभागवत में कहा गया है कि भगवान् व्यास ने भारत के व्यपदेश से वेदार्थ ही प्रदर्शित किया है। फलतः भागवत-धर्म का मूल नारायणीयोपाख्यान आदि भी वेदार्थ का ही उपबृंहणमात्र है। विष्णुपुराण, हरिवंश, भागवत आदि सभी पुराण भी वेदार्थ के उपबृंहण और वेद के विस्तृत आर्ष भाष्यमात्र हैं ।