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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२५६ रामायणमीमांसा अष्टम

शैव, वैष्णव, शाक्त आदि विभिन्न आगम एवं तन्त्र आदि भी वैदिक धर्म की ही शाखा-प्रशाखाओं के ही उपबृंहक हैं। सर्वत्र ही न केवल विष्णु या कृष्ण की ही भक्ति वर्णित है बल्कि शिव, शक्ति, विष्णु एवं राम तथा कृष्ण आदि की भक्ति का स्पष्ट वर्णन है। जैसे उपनिषदों में रामतापनीय है वैसे ही गोपालतापनीय, नृसिंहतापनीय आदि हैं। रामानुज, निम्बार्क, मध्व आदि ने रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को परम प्रमाण माना है। सुतरां उनमें वर्णित राम की भक्ति को भी पूर्णरूप से आदृत किया है। श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में रामचरित का सर्वोत्तम वर्णन है।

'भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ' यह कहना सर्वथा असङ्गत है। वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि है। आधुनिक इतिहास की दृष्टि में भी वेद, वैदिक सभ्यता तथा शिवभक्ति ईसा से हजारों वर्ष पूर्व का है। ऋग्वेद में रुद्र शब्द का प्रयोग शिव के लिए मिलता है और जो विशेषण शिवजी के लिए प्रयुक्त हुए हैं, वे प्रायः रुद्र के लिए मिलते हैं। शिव शब्द भी है ही।

आधुनिक मोहनजोदड़ो और हरप्पा की खुदाई ने भारतीय धार्मिक इतिहास पर बहुत प्रभाव डाला है। वहाँ दो प्रकार की शिव-मूर्तियाँ मिली हैं, पहली जो मोहनजोदड़ो की मुहरों में मिली है, उसमें योगावस्था में बैठे ध्यानी शिव हैं। इसमें शिवजी बीच में बैठे हैं ओर चारों ओर पशुओं की आकृतियाँ हैं। शिव को पशुपतिनाथ कहा ही जाता है, अतः बाघ, हाथी, गेंडा और भैंसा ध्यानी शिव के चारों तरफ खड़े हैं। त्रिशूल की जगह पर शिव के मस्तक पर तीन आकृतियाँ हैं। उसमें शिव के सिंहासन के नीचे दो मृग भी हैं। दूसरी मुहर में शिव के तीन मुख हैं जो ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश त्रिरूप के बोधक हैं। हरप्पा में बहुत सी पत्थर की सामग्रियाँ मिली हैं जो शिव-लिङ्ग जैसी हैं। एतावता शिव-लिङ्ग की पूजा स्वतः प्रमाणित हो जाती है। ऋग्वेद में शिश्नदेवाः शब्द (ऋ० सं० ७।२१।५ और १०।१०।१९) आया है। पाश्चात्य लोग इसके आधार पर कहते हैं कि अनार्य लोग शिव-लिङ्ग के पूजक थे, आर्यों में उन्हीं से वह ली गयी है। परन्तु पाश्चात्यों की उक्त धारणा गलत है। यास्क तथा सायण ने इसका 'अब्रह्मचर्य' अर्थ लिया है। शिश्नोदरपरायण विषयी लोग शिश्नदेव माने जाते थे। अब भी वैसे ही माने जाते हैं। इस आधार पर कम से कम ६ हजार वर्ष पहले शिव-पूजा प्रचलित थी, यह सिद्ध होता है।

ईसा से २०० वर्ष पूर्व पुष्यमित्र शृङ्ग ने वैदिक धर्म का प्रसार किया। ईसा के पूर्व पहली शती में बैंक्ट्रियन तथा शक राजाओं ने उत्तर पश्चिम भारत पर राज्य किया था। उनके सिक्कों पर वृषभ के चिह्न हैं।

ईसा की पहली शती में कुषाणवंशीय नरेशों ने एक बहुत बड़ा राज्य स्थापित किया था जिसका विस्तार वाराणसी तक था। राजा बीम कड फाइसीस तो शैव धर्म स्वीकार कर महादेव का पूर्ण उपासक हो गया था। उसके सिक्कों से यह स्पष्ट है। उनमें एक तरफ राजा का चित्र है दूसरी तरफ महादेव नन्दी को साथ लिए खड़े हैं। उनमें शिवजी त्रिशूल और डमरू लिये दिखाये गये हैं। कनिष्क ने भी वैसे ही सिक्के चलाये थे। उसके सिक्कों में शिवजी ईशो या ईश नाम से अङ्कित हैं। उस मूर्ति में महादेव की चार भुजाएँ हैं।

काशीप्रसाद जायसवाल ने नागवंशीय राजाओं का पता लगाया है। यह वंश कुषाणों के बाद और गुप्तकाल के पहले का है। इसके शिलालेखों से विदित होता है कि इस वंश के आदि पुरुष ने शिवलिङ्ग को अपने कन्धे पर रखकर शिवजी को परितुष्ट कर राज्य-स्थापना की थी। अंसभारसंनिवेशितशिवलिङ्गोद्वहनशिवसुपरितुष्टसमुत्थापित- राजवंशानां पराक्रमाधिगतभागीरथ्यमलजलमूर्धाभिषिक्तानां दशाश्वमेधावभृथस्नानानां भारशिवानाम्। (ना० प्र० पत्रिका भाग १२ अङ्क १)। इस वंश का नाम ही भारशिव था। इसके बाद भी गुप्तकाल में और उसके बाद भी शिव की उपासना चलती रही।