रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें।४ )-> wait, is it ७।१०।४? Yes,७।१०।४`.
Line 10-12:
“योजनौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय
नमोऽअस्त्वग्नये ।” ( अथ० सं० ७।९२।१ ), “भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ ।
बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्न मृध्नुवेम कविनेषितासः ॥” ( ऋ० सं० ६।४९।१० )
Wait, look at line 12: सुषुम्न मृध्नुवेम - is there a space between सुषुम्न and मृध्नुवेम? Yes, there is a clear space.
Line 13-16:
जो रुद्र अग्न्यादि वेदों का कारण है, जो विश्व का एकमात्र स्वामी है, महाज्ञानी और अतीन्द्रियार्थदर्शी है
और जो हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है वह हमें शुभ बुद्धि दे । जो रुद्र अग्नि में, जल में, ओषधियों और वनस्पतियों
में है और जो भुवनों का निर्माण करता है उस तेजस्वी रुद्र को हमारा नमस्कार हो। जो भुवनों का रक्षक है तथा जो
`बड़ा ज्ञानी है, प्रेरक