रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें२५८ रामायणमीमांसा अष्टम थे तब हनुमान् और लक्ष्मण उन्हें दबा-दबाकर उनकी थकावट दूर करते थे । शूर्पणखा की नाक और कान काटकर विरूप करने के कारण उन्हें अपनी प्रिया का वियोग भी सहना पड़ा । इस वियोगजनित रोष के कारण भौंहें तन गयीं जिन्हें देखकर समुद्र भी भयभीत हो गया । इसके बाद उन्होंने समुद्र में पुल बाँधा और लङ्का में जाकर दुष्ट राक्षसों के जङ्गल को दावाग्नि के समान दग्ध कर दिया । वे कोशलेन्द्र हम सबकी रक्षा करें । “नेदं यशो रघुपतेः सुरयाञ्चयाऽऽत्तलीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवधो जलधिबन्धनमक्षपूगैः किं तस्य शत्रुहनने :कपयः सहायाः ॥” (भा० पु० ९।११।२०) “यस्यामलं नृपसदःसु यशोऽधुनापि गायन्त्यघघ्नमृषयो दिग्भेन्द्रपट्टम् । तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्टपादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥” (भा० पु० ९।११।२१) भगवान् श्रीराम के समान भी यश और ऐश्वर्यवाला कोई नहीं, फिर उनसे अधिक ऐश्वर्यशाली कैसे कोई हो सकता है ? भगवान् ने देवताओं की प्रार्थना से ही दिव्य लीलाविग्रह धारण किया था । उन रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीराम के लिए यह कोई बड़े गौरव की बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों से बड़े-बड़े राक्षसों को मार डाला, या समुद्र पर पुल बाँध दिया । भला क्या उन्हें शत्रुओं को मारने के लिए बन्दरों की सहायता की आवश्यकता थी । वस्तुतः सब उनकी लीला ही थी । भगवान् का निर्मल यश सब पापों को नष्ट करनेवाला है । वह इतना फैल गया कि दिग्गजों का भूषणरूप हो गया है । आज भी बड़े-बड़े मार्कण्डेय आदि ऋषि-महर्षि युधिष्ठिर आदि राजाओं की सभाओं में उस यश का गान करते हैं । स्वर्ग के देवता तथा पृथ्वी के नरपति अपने कमनीय किरीटों से उनके चरणकमल का नीराजन करते हैं । श्रीमद्भागवत वोपदेवकृत है यह कहना असङ्गत है, क्योंकि १३ वीं शती में देवगिरिस्थ वोपदेव ने भागवत के ही आधार पर मुक्ताफल, भागवतानुक्रमणिका और भागवतसारबोधक ग्रन्थ लिखे हैं । यदि वोपदेव ने भागवत भी बनाया होता तो उसका उल्लेख अवश्य किया होता । जैसे अन्य ग्रन्थों के कर्ता के रूप में वोपदेव का उल्लेख है वैसे ही भागवत में भी उल्लेख होना चाहिए था । परन्तु भागवत के प्रथम स्कन्ध में कर्ता रूप से ही व्यास का उल्लेख है । वोपदेव के आश्रयदाता चतुर्वर्गचिन्तामणि के निर्माता हेमाद्रि थे । उन्होंने महापुराणों के दान के प्रसङ्ग में श्रीमद्भागवत पुराण का भी दान लिखा है । यदि भागवत का निर्माण उसी समय हुआ होता तो महापुराणों के प्रसङ्ग में महा- पुराणरूप से भागवत का दान वर्णन कैसे होता ? फिर, वोपदेव हुए तेरहवीं शती में ग्यारहवीं शती का हस्तलिखित भागवत काशी के सरस्वतीभवन में विद्यमान है । श्रीमध्वाचार्य ने अपने भागवततात्पर्यनिर्णय ग्रन्थ में लिखा है— ‘श्रीशङ्कराचार्यचित्सुखाचार्यप्रभृतिभिर्भागवते टीकाः कृताः ।’ अर्थात् श्रीशङ्कराचार्य, चित्सुखाचार्य आदि ने भागवत पर टीकाएँ लिखी थीं । पद्मपुराण के वासुदेव- सहस्रनामभाष्य में श्रीशङ्कराचार्य ने स्वयं भागवत के श्लोक का उद्धरण किया है । श्लोक यह है—"पश्यन्त्यदो रूपमभ्रचक्षुषा ।” ( भाग० पु० १।३।४ ) । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौड़पादाचार्य ने पञ्चीकरण-टीका में भागवत का उल्लेख किया है— “स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा । कोशलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥” (भा० पु० ९।११।२२) जिन्होंने राम का स्पर्श किया, जिन्होंने दर्शन किया, जो पास बैठे और जिन्होंने राम का अनुगमन किया वे सभी कोशलवासी जहाँ योगी लोग जाते हैं उस दिव्य साकेत धाम में पहुँच गये । जब शङ्कराचार्य का समय ही