भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 336

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अध्याय अवतार-सामग्री २५९ नेपाल में मिले प्रमाणों के आधार पर ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व है तो उनके परमगुरु गौडपादाचार्य के समय की प्राचीनता में क्या सन्देह ? जब उनके द्वारा भी रामभक्ति से ओतप्रोत भागवत-श्लोक उद्धृत है तो भक्तिमार्ग को और भागवत को ईसा से कुछ वर्ष पूर्व के कहने का क्या अर्थ है । श्रीकृष्ण भगवान् भी अपनी विश्वविख्यात गीता में जैसा कहते हैं— ‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’ (गी० १०।३७ ) वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ । उसी तरह कहते हैं—‘रामः शस्त्रभृतामहम्’ (गी० १०।३१ ) । शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । जन-जन में रामनाम जितना प्रख्यात है उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण आदि का नाम प्रख्यात न हो सका । पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वती को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप विष्णुसहस्रनाम जप के तुल्य होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने ! मैं अतिराम अर्थात् जामदग्न्य का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ । अतिरामे रामे अतिरामे— “राम रामेतिरामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥” १४७ वें अनु० में बुल्के का यह कहना भी असङ्गत है कि “रामायण के प्रक्षिप्त अंशों में तथा भारत में कई स्थलों पर रामावतार का उल्लेख है ।” भ्रान्ति या दुरभिसन्धि से ही बुल्के रामावतार-बोधक श्लोकों को प्रक्षिप्त मानते हैं । उनके पास इसके लिए कोई भी ठोस आधार नहीं है । जब कि अवतार-पक्ष में वेद, रामायण, महाभारत तथा सभी पुराण प्रमाण हैं । सीता को लक्ष्मी बतलानेवाला युद्धकाण्ड का श्लोक भी प्रक्षिप्त नहीं है । अतएव प्राचीन रामसाहित्य में कहीं भी रामभक्ति का निरूपण नहीं मिलता, यह कहना भी गलत है, क्योंकि रामतापनीय, रामरहस्योपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, अध्यात्मरामायण, पुराण आदि सब प्राचीन राम- साहित्य हैं । उनमें रामभक्ति का पूर्णतया उल्लेख है । बुल्के का कहना हैं कि “हरिवंश में तथा प्राचीन पुराणों में भी रामभक्ति का उल्लेख नहीं हुआ, अतः रामावतार की भावना के बहुत काल के बाद राम-भक्ति तथा रामपूजा का आविर्भाव हुआ है। सर रामकृष्णपुल भण्डारकर का कहना है—यद्यपि ई० सन् के प्रारम्भ से ही राम विष्णु के अवतार माने गये थे, किन्तु उनकी विशेषरूप से प्रतिष्ठा ११ वीं शती के लगभग प्रारम्भ हुई । डाक्टर श्राडर का भी यह निर्णय है कि जिन वैष्णवसंहिताओं में राम अथवा राधा की एकान्तिक पूजा प्रतिपादित की गयी है वे अर्वाचीन हैं और पाञ्चरात्र के प्रामाणिक साहित्य के अनुकरण से उत्पन्न हुई हैं। फिर भी गुप्तकालों में विष्णु के अन्य अवतारों की भाँति राम की भी पूजा प्रचलित थी । धर्मोत्तरपुराण तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता में राममूर्ति के निर्माण के लिए नियम मिलते हैं। ५वीं शती की वाकाटक महारानी राम गिरिखामी की भक्त थी । सम्भवतः वे दाशरथि राम थे । अग्निपुराण में मत्स्यादि-प्रतिमा-लक्षण नामक ४९ वें अध्याय में राम की मूर्ति का उल्लेख है ।” उक्त सभी लेखक पाश्चात्यों के ही प्रभाव से प्रभावित होकर उक्त निष्कर्ष पर पहुँचे हैं । रामायण में राम को परब्रह्म पुरुषोत्तम कहा गया है और फलश्रुति में राम-भक्ति करनेवालों को उत्तम फल की प्राप्ति कही गयी है। श्रीराम के रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध विपत्तियों को पार कर लेता है । उसके सुनने से सब देवता प्रसन्न होते हैं और प्रार्थित वरप्रदान करते हैं। स्त्रियाँ इसके सुनने से उत्तम पुत्र प्राप्त करती हैं। प्राणी सब पापों से मुक्त होता है । रामायण सुनने से ऐश्वर्य एवं पुत्र का लाभ होता है । सम्पूर्ण रामायण के सुनने से और पढ़ने से राम प्रसन्न होते हैं । राम साक्षात् सनातन विष्णु, आदिदेव हरि एवं नारायण हैं—