भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२५० रामायणमीमांसा अष्टम “प्रीयते सततं रामः स हि विष्णुः सनातनः । आदिदेवो महाबाहुर्हरिनारायणः प्रभुः ॥” (वा० रा० ६।१२८।११७) राम की स्तुति करते हुए ब्रह्माजी ने कहा है—राम आपका दर्शन अमोघ है एवं आपका संस्तवन अमोघ है। भूतल में आपकी भक्ति करनेवाले मनुष्य भी अमोघ होंगे। ध्रुव, पुराणपुरुषोत्तमस्वरूप आपको जो भजेंगे वे इस लोक और परलोक के सब अभीष्टों को प्राप्त करेंगे— “अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥” (वा० रा० ६।११९।३०, ३१) जब इस तरह राम के समकाल में ही ब्रह्मादि देवता ही राम की भक्ति और उसका फल वर्णन करते हैं और महाभारत एवं पुराण सभी इसका साक्ष्य दे रहे हैं तब यह कहना कि ११वीं शती से राम की भक्ति चली धृष्टतामात्र है। हरिवंश में राम को विष्णु का स्वरूप बताया है तो सुतरां उनकी भक्ति सिद्ध है। भक्ति का अर्थ मूर्ति-पूजा ही नहीं है; श्रवण, पठन, ध्यान आदि भी भक्ति है। वस्तुतस्तु भगवद्गुणगणश्रवणजनित द्रवीभूत अन्तःकरण की भगवदाकाराकारित वृत्ति ही भक्ति है— “मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (भा० पु० ३।२९।११) जैसे समुद्र की ओर द्रवीभूत निर्मल परम पवित्र गङ्गा का अविच्छिन्न प्रवाह प्रवाहित होता है इसी तरह सर्वगुहाशयी भगवान् की ओर निर्मल द्रवीभूत अन्तःकरण की अविच्छिन्न वृत्ति ही भक्ति है। जो राम का अवतार और राम की भक्ति का वर्णन करने के कारण ही परम प्रामाणिक रामायण के अविभाज्य अङ्ग को प्रक्षिप्त कहने का साहस कर सकता है वह प्रामाणिक से प्रामाणिक ग्रन्थ को प्रक्षिप्त कह सकता है। बुल्के को वाल्मीकिरामायण के पाँच काण्ड प्रामाणिकरूप से मान्य हैं पर उनमें अवतार-बोधक वचनों को वे प्रक्षेप मानते हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन पुराणों में राम की भक्ति का उल्लेख नहीं है। यदि उन प्रामाणिक पुराणों में रामभक्ति का उल्लेख मिल जाय तो बुल्के उनको भी प्रक्षेप कह देंगे। इसकी कोई चिकित्सा ही नहीं है। इस तरह तो ईसाई बुल्के की बाइबिल को भी तो प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। विष्णुधर्मोत्तर और अग्निपुराण भी अर्वाचीन नहीं हैं। भारतीय दृष्टिकोण से पुराण अति प्राचीन हैं, अतएव वेदों तथा उपनिषदों में पुराणों का वर्णन है। उन्हें पांचवे वेद की संज्ञा दी गयी है। यह पीछे कहा जा चुका है। पुराणों के अनुसार राम भी पुराणों का श्रवण करते थे। तुलसीदासजी भी कहते हैं— “वेदपुरान वसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम यद्यपि सब जानहिं ॥” (रा० मा० ७।२५।१) वेद, पुराण सभी अनादि ही हैं। भेद इतना ही है कि वेदों की आनुपूर्वी कभी नहीं बदलती है, अतः वे अपौरुषेय हैं। इतिहास-पुराण पौरुषेय हैं, अतः उनकी आनुपूर्वी विभिन्न कल्पों में बदलती रहती है। परन्तु कथावस्तु और सिद्धान्त ज्यों के त्यों बने रहते हैं। इतिहास पुराण-कार त्रिकालज्ञ ऋषि हैं। अतः उनके ग्रन्थों में अतीत के समान ही अनागत वृत्तान्तों का भी वर्णन हुआ है। यह न समझने के कारण ही बुल्के आदि किसी अर्वाचीन वस्तु को देखकर उसके आधार पर पुराणों के रचना-काल की खोज करते हैं। इन्हीं वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार ही तमिल के प्राचीनतम आल्वारों के स्तोत्रों में राम का उल्लेख हुआ है। कुलशेखर ( नवी शती के ) आल्वार द्वारा कृत रामभक्ति का निरूपण स्वतन्त्र

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