रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अवतार-सामग्री- २६१
नहीं है, किन्तु वह सब वेदादि के आधार पर ही आधारित है। अतएव यह भी कहना निराधार है, "रामभक्ति तथा रामपूजा का शास्त्रीय प्रतिपादन पहले पहल रामानुजसम्प्रदाय में हुआ है।" यह कहना भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है कि 'रामानुज ने भी रामभक्ति पर कुछ नहीं लिखा'; परन्तु अपने श्रीभाष्य में उन्होंने विभवों में राम और कृष्ण का उल्लेख किया है ( श्रीभाष्य २।२।४२ ), क्योंकि उनके सम्प्रदाय में प्रथम अर्चावतार की पूजा होती है, उसके पश्चात् विभव की पूजा होती है। अतः राम और कृष्ण को विभव स्वीकार करने से ही उनकी भक्ति भी स्वीकृत हो जाती है। बुल्के कहते हैं, "रामानुजसम्प्रदाय में अगस्त्यसंहिता, कलिराघव, बृहद्राघव, राघवौयसंहिता तथा तीन रामभक्तिसम्बन्धी उपनिषदें सुरक्षित हैं—रामपूर्वतापनीय, रामोत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् । इनमें रामयन्त्र, राममन्त्र तथा सीतामन्त्र आदि का उल्लेख है।" पर बुल्के का उक्त कथन सर्वथा अशुद्ध और अप्रामाणिक है, क्योंकि अगस्त्यसंहिता ग्रन्थ अतिप्राचीन है। उसका रामानुजसम्प्रदाय में परम आदर अवश्य है। परन्तु वह सम्प्रदाय के किसी आचार्य की कृति है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। बुल्के भी कोई प्रमाण नहीं दे सके । रामतापनीय आदि उपनिषदें तो अनादि अपौरुषेय वेद के अविभाज्य अङ्ग होने से अपौरुषेय वेद ही हैं। राममन्त्र, सीतामन्त्र आदि अनादि परम्परा से ही प्रचलित हैं। किसी सम्प्रदाय में मन्त्र का निर्माण करके उपदेश नहीं होता, किन्तु अनादिपरम्पराप्राप्त मन्त्र का ही उपदेश होता है। इसी कारण इतर सम्प्रदायों में भी राममन्त्र-परम्परा चलती है। राममन्त्र अति प्राचीन स्मार्त सम्प्रदाय में भी प्रचलित है। अतएव रामतापनीय में स्पष्ट कहा गया है कि साक्षात् शङ्कर ने भी राममन्त्र का जप किया था। इसे मिथ्या कहने का साहस करना साहस ही होगा। अपनी बातों की पुष्टि में बुल्के ने भण्डारकर तथा डा० श्राडर के लेखों का स्मरण किया है जो कि स्वयं ही प्रमाणसापेक्ष हैं। बुल्के के अनुसार "उत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् में अद्वैत भक्ति भी प्रतिपादित है— "सदा रामोऽहमस्मीति तत्त्वतः प्रवदन्ति ये । न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः ॥" जो सर्वदा तत्त्व की दृष्टि से अपने को कार्यकारणसङ्घात से भिन्न अखण्डबोध रामरूप ही समझते हैं वे संसारी न होकर राम ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।" यह उद्धरण ही बुल्के के इस कथन को अप्रमाणित सिद्ध करता है कि ये उपनिषदें रामानुजसम्प्रदाय में ही निर्मित हुई हैं। कारण यदि ये किसी रामानुजीय आचार्य से निर्मित होती तो इनमें अद्वैत का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि उस सम्प्रदाय में अपने को राम या विष्णु या ब्रह्म समझना एक प्रकार का अपराध है। वे यह भी कहते हैं कि "रामतापनीय के अनेक स्थलों पर अध्यात्मरामायण के रामहृदय का साम्य पाया जाता है ( ४।७।१९) । इसमें संक्षिप्त रामचरित भी दिया गया है जिसके अनुसार रावण ने मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से सीता का हरण किया था 'स्वनिवृत्त्यर्थम्' । राम और लक्ष्मण (सीता की खोज के व्याज से ) पृथिवी का भ्रमण करते थे तथा सुग्रीव ने सीता को ले आने की आज्ञा दी थी।" वस्तुतः वेद और उपनिषद् ही रामचरित्र रामायणादि ग्रन्थों के भी मूल हैं। यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है, अतः अध्यात्मरामायण आदि रामतापनीय के अनुसार ही हो सकते हैं। उपनिषद् में निवृत्त्यर्थ में निवृत्ति का अर्थ मुक्ति नहीं है, किन्तु नाश ही अर्थ है। यह व्यावहारिक भाषा है। जैसे कहा जाता है पतङ्ग अपने नाश के लिए दीपादि पर हमला करता है। उसी तरह रावण भी अपने नाश के लिए ही