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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 339

सीताहरणरूप कार्य में प्रवृत्त हुआ था। कलिसन्तरण और कृष्णोपनिषद् में भी राम के नाम का माहात्म्य और राम की चर्चा है ही। तारसार, त्रिपादविभूतिमहानारायण, मुक्तिकोपनिषद् आदि में राम की चर्चा है ही। त्रिपादविभूतिमहानारायण में तो भरताग्रज जानकीवल्लभ सम्बन्धित ७ वें अध्याय में 'दाशरथाय विद्महे सीता- वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्' इस रामगायत्री का उल्लेख है। और भी अनेक उपनिषदों में राममाहात्म्य तथा वन्दना वर्णित है। मुक्तिकोपनिषद् में 'राम त्वं परमात्मासि' इत्यादि उक्तियाँ ठीक ही हैं। सीतोपनिषद् भी श्रुति ही है। बुल्के कहते हैं, "उन सब ग्रन्थों की रचना का काल निर्धारित करना असम्भव प्रतीत होता है।" वस्तुतः प्रतीत नहीं असम्भव ही है। कारण, वेद अनादि हैं। उक्त उपनिषदें वेद हैं, अतः अनादि ईश्वर के अनादि निःश्वासभूत हैं। उनका रचनाकाल ढूँढना अनभिज्ञता ही है। संसार में कोई भी व्यक्ति छोटा सा भी लेख लिखता है तो उपाधियों सहित उसमें अपने नाम का उल्लेख करता है। यदि ये उपनिषदें किसी व्यक्तिविशेष की निर्मित होतीं तो इनमें उस लेखक का नाम अवश्य होता। लेखक का नाम न होने से भी इनकी अपौरुषेयता ही व्यक्त होती है। वेबर ने रामतापनीय का प्राचीनतम निर्माणकाल ११वीं शती माना है। उनके अनुसार उस समय से लेकर रामभक्तिविषयक साहित्य का निर्माण होने लगा था। परन्तु वेबर की यह कल्पना अटकल पर ही निर्भर है। रामार्चनसोपान, सर्वसिद्धान्त, रामार्चनपद्धति, रामपूजापद्धति आदि पौरुषेय ग्रन्थों के निर्माणकाल की कल्पना ठीक हो सकती है। इसी प्रकार भगवद्गीता के अनुकरण पर रामगीता नामक ग्रन्थों का उल्लेख मानना भी अशुद्ध है। कारण जिस महाभारत का भगवद्गीता रत्न माना जाता है उसमें उत्तरगीता, अनुगीता आदि अनेक गीताओं का उल्लेख है। इसमें अनुकरण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव अध्यात्मरामायण की रामगीता, स्कन्दपुराणीय निर्वाणखण्ड की रामगीता को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। अध्यात्मरामायण की रामगीता को तो कथमपि अनुकरण नहीं कहा जा सकता। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का विवेचन और श्लोकों का ढङ्ग इसका सर्वथा विलक्षण ही है। गो० तुलसीदासजी का श्रोराचरितमानस किसी सम्प्रदायविशेष पर निर्भर नहीं है, किन्तु उनके ही शब्दों में नानापुराण, निगम, आगम और अपनी परम्परा पर ही निर्भर है। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है, "रामभक्ति के विकास के साथ-साथ रामकथा को भक्ति के ढाँचे में ढालने की आवश्यकता का अनुभव हुआ। फलस्वरूप बहुत से साम्प्रदायिक रामायणों की सृष्टि होने लगी। जिनमें अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा अद्भुतरामायण प्रमुख हैं।" क्योंकि रामभक्ति के विकास के आधार पर भक्तिग्रन्थों का आविर्भाव नहीं हुआ। किन्तु उन वेद, उपनिषद् आदि ग्रन्थों के आधार पर ही भक्ति का आविर्भाव हुआ है। अतः अध्यात्मरामायण आदि को अर्वाचीन बतलाने का साहस करना वृथा ही है। अध्यात्मरामायण का निर्माण शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार नहीं हुआ, किन्तु शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त को ही इसके अनुसार कहा जा सकता है। तभी तो इसका सम्मान अन्य सम्प्रदायों में भी है। यदि यह शङ्कराचार्य के सिद्धान्त के आधार पर निर्मित होता तो निश्चित ही विशिष्टाद्वैती तथा रामानन्दीय सम्प्रदाय में इसका इतना आदर न होता। अद्वैत- बोधक बहुत से वचन जैसे वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में मिलते हैं, वैसे ही अध्यात्मरामायण में भी हैं। अतः इतने से ही किसी अद्वैतसम्प्रदायी द्वारा उसका निर्माण नहीं कहा जा सकता। श्रीमद्भागवतपुराण का भी राम- चरितमानस में आश्रय लिया गया है। रामचरितमानस का भी वह मुख्य आधार पुराणांश होने से ही हुआ है। अतएव वह अध्यात्मरामायण तथा ब्रह्माण्डपुराण का ही अंश माना जाता है। यदि अन्य कोई रचयिता होता तो वह ऐसे ग्रन्थरत्न के रचयिता के रूप में अपने नाम का अवश्य उल्लेख करता। अतएव १७५ वें अनु० की बुल्के की कल्पनाएँ निराधार ही हैं। एकनाथ वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा अध्यात्मरामायण को अर्वाचीन मानते हैं। सो यह तो ठीक ही है। वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ चौबीसवीं चतुर्युगी के त्रेतायुग की कृति है और

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