रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अवतार-सामग्री २६३ अध्यात्मरामायण २८वीं चतुर्युगी के द्वापर में व्यास द्वारा निर्मित है, अतः उसकी प्राचीनता महाभारत के समान ही असन्दिग्ध है। भारतीय लेखक मिथ्या संवाद नहीं लिखते । अतएव सर्वज्ञकल्प व्यास ने ही ब्रह्मानारदसंवाद और पार्वती-शङ्कर संवाद के रूप में अध्यात्मरामायण का आविर्भाव किया है। अवतारवाद की व्यापकता वस्तुस्थिति है। श्रीराम परब्रह्म हैं और सीता मूलप्रकृति है, यह उल्लेख ठीक ही है। बालकाण्ड में भागवत का अनुकरण करके राम का कौशल्या को अपना विष्णुरूप दिखलाया गया है, यह भी अशुद्ध है, क्योंकि पुराणों में अन्यत्र भी वही पद्धति है। वामन भगवान् भी अपनी माता अदिति के सामने चतुर्भुजरूप से ही प्रकट हुए थे। इसी तरह भगवान् व्यास तथा ब्रह्मा, नारद और शिव, पार्वती की परम्परा के राम का कौशल्या में वैसा ही आविर्भाव हुआ है। इसी लिए इस संवाद में वैसा उल्लेख है। अहल्योद्धार, केवट का वृत्तान्त, अभिषेक के पूर्व राम-नारदसंवाद, मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश, वाल्मीकि द्वारा अपनी कथा द्वारा रामनाम का माहात्म्य वर्णन, मायामयी सीता का हरण-वृत्तान्त, लक्ष्मण का १९ वर्ष तक उपवास आदि, सेतुबन्ध के पूर्व रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना आदि सब वृत्तान्त कल्पना नहीं हैं किन्तु वस्तुस्थिति के अनुसार ही उनका उल्लेख है। तदनुसार ही अनेक पुराणों में भी रामेश्वरस्थापना का वर्णन है। इतना ही नहीं आज तक सेतुबन्ध रामेश्वर नाम से ही धनुष्कोटि के समीप रामेश्वर लिङ्ग स्थित है। देश-देशान्तर से लक्ष्यों लक्ष आस्तिक दर्शन करने जाते हैं। 'नह्यमूलं प्ररोहति' बिना मूल के यह सब सम्भव नहीं हो सकता। अद्भुतरामायण को भी अर्वाचीन कहना अशुद्ध ही है। विभिन्न रामायणों और पुराणों में रामकथा की वस्तु के भेद का कारण कल्पभेद ही है। रामचरितमानस में कहा गया है— “कलपभेद हरि चरित सुहाये, भाँति अनेक मुनीसन गाये ।” ( रा० मा० १।३२।४ ) सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं है। अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थ ही प्रमाण होते हैं। अतः अद्भुतरामायण के अनुसार तथावर्णित उस घटना के अभाव में कोई प्रमाण नहीं। आनन्दरामायण भी अद्भुतरामायण आदि के तुल्य वाल्मीकिकृत ही है। पुराणों तथा वाल्मीकिपरम्परा प्राप्त वचनों के आधार पर प्रत्येक आस्तिक यह जानता है कि रामायण ग्रन्थ शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” ( रामरक्षास्तोत्र ) रघुनाथ रामभद्र का चरित्र शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है— “रामायन सतकोटि अपारा” ( रा० मा० १।३२।३ ), “रामचरित सतकोटिमहँ, लिय महेश जिय जानि ।” ( रा० मा० १।२५ ) रामचरित मानस में कवीश्वर और कपीश्वर दोनों को 'सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारी' कहा गया है। “सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥” ( रा० मा० १।मंगलाचरण। ४ ) तुलसीदास जैसे तत्त्वदर्शी सन्त स्वप्न में भी अनृतवादी होना पाप मानते हैं। फिर वे मिथ्या बातों को अपने अमरकाव्य में कैसे स्थान दे सकते थे ? वी. राघवन्, जी. ग्रियर्सन आदि समालोचकों की समालोचना निष्प्रमाण ही है। उन विदेशियों एवं भारतीयसंस्कारशून्य लोगों को इन परम प्रामाणिक आर्षग्रन्थों के सम्बन्ध में