भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२६४ रामायणमीमांसा अष्टम कुछ भी ज्ञात नहीं है। जैसे कुरान, बाइबिल आदि ग्रन्थों के सम्बन्ध में भी उनके रहस्यज्ञ विद्वान् ही कुछ कह सकते हैं, अन्य नहीं वैसे ही रामायण के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये । १५०वें अनु० में बुल्के का कहना है "भारतीय भक्तिमार्ग के इतिहास में कृष्ण तथा बाद में राधा और कृष्ण का स्थान निर्विवाद रूप से प्रधान है और रामभक्ति पर कृष्णभक्ति का प्रभाव पड़ जाना स्वाभाविक था। राम के प्रति दास्यभक्ति के अतिरिक्त माधुर्यभक्ति का भी प्रतिपादन किया गया है। इस माधुर्यभक्ति के आधार पर रसिकसम्प्रदाय का सम्भवतः १६वीं शती ई० के अन्त में प्रवर्तन हुआ ।” यह कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि भारतीय भक्ति का इतिहास अति प्राचीन काल से वेदों में ही वर्णित है। “मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ।” “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।” ( श्वे० उ० ६।२३ ) । के अनुसार प्रपत्ति, भक्ति तथा शरणागति शब्द एक ही वस्तु के बोधक हैं। निर्गुण निराकार ब्रह्म तथा सगुण साकार ब्रह्म की भी भक्ति वेदों में वर्णित है । वेदों और उपनिषदों में उपासना एवं तत्त्वज्ञान का ही प्राधान्येन वर्णन है । ब्रह्मसूत्रों में भी उपासना और तत्त्वज्ञान की दृष्टि से ही ब्रह्म का विचार प्रस्तुत हुआ है। दर्शन, वेदन, ज्ञान आदि शब्दों का उपासना के प्रसङ्ग में उपासना ही अर्थ है। यह शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभ सभी को मान्य है। यह उपासना भी भक्ति है। श्रीरामानुजाचार्य ने ध्रुवा स्मृति को भक्ति माना है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन तथा पूर्णानुरक्ति आदि सभी प्रकार की भक्तियाँ वेदों में वर्णित हैं। “सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ।” “त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।।” ( वा० रा० ६।१८।१६,१७ ) “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।” ( वा० रा० ६।१८।३३ ) सर्वमान्य गीता में भी भक्ति और शरणागति का खूब उल्लेख है। उसमें स्वयं भगवान् द्वारा ईश्वर (शिव) की शरणागति का उल्लेख है— “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिस्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥” ( गीता १८।६२ ) अतः भक्ति का प्रचार आधुनिक नहीं है। उक्त वचनों में शरणागति का वर्णन भक्ति का ही वर्णन है । हनुमान्, विभीषण, भरत तथा लक्ष्मण ये भी उत्कृष्ट कोटि के भक्त थे। आजकल भक्तों एवं परम भागवतों में इन सबकी गणना है । श्रीतुलसीदासजी ने कहा है— “भरत सरिस को रामसनेही । जग जपु राम राम जपु जेही ।” ( वा० रा० २।२१७।४ ) भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति है । वेदों में 'नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे', 'नमो हिरण्य- बाहवे' आदि रूप से भगवान् सगुण साकार शिवजी का स्पष्ट ही वर्णन है। रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना करनेवाले राम शिवभक्त ही थे। उपमन्यु से शिवमन्त्र की दीक्षा लेकर शिवजी की उपासना करते थे। महाभारत में श्रीकृष्ण ने भीष्म और धर्मराज के अनुरोध पर शिवजी की भक्ति का वर्णन किया है। महाभारत में ही श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन ने भगवती की स्तुति की थी। अतः भारतीय भक्ति के इतिहास में अनादिकाल से ही शिव, विष्णु, सीताराम तथा राधाकृष्ण की भक्ति प्रचलित है। अतः ११वीं या १७वीं शती से कृष्ण या राम की भक्ति प्रचलित हुई इत्यादि कल्पनाएँ निर्मूल ही हैं ।