रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अवतार-सामग्री २६५ उत्तररामचरित, जानकीहरण, हनुमन्नाटक आदि ही नहीं वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण में भक्ति-भावना से ही रामचरित्र का वर्णन हुआ है । इसी लिए "प्रीयते सततं रामः" ( वा० रा० ६।१२८।११७ ) इत्यादि वचनों से कहा गया है कि रामायण-श्रवण से राम प्रसन्न होते हैं। इतना ही नहीं भारतीय दर्शनों के अनुसार 'भूतं भव्याय कल्पते' प्रत्येक भूत सिद्ध वस्तु का वर्णन उपासना या कर्म के लिए होता है। इसी लिए 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' ( जै० सू० १।२।१ ) में कहा गया है कि आम्नाय वेदराशि का क्रिया ही प्रयोजन है, अतः क्रिया जिनका अर्थ नहीं है वे अर्थवाद और मन्त्र आदि अनर्थक होंगे । इसी लिए विधि के साथ एकवाक्यता के द्वारा विध्यर्थ की स्तुति करके विधि का अङ्ग बनकर ही अर्थवाद सार्थक होता है। मन्त्र भी विध्यर्थ के अनुष्ठान में अपेक्षित कर्माङ्ग द्रव्य और देवता का स्मरण कराकर विधियोग से ही सार्थक होते हैं । ठीक इसी तरह रामायण आदि में राम और रामचरित्र का वर्णन उपास्यस्वरूप के समर्पण द्वारा उपासना में ही उपयुक्त होकर सार्थक होता है। सगुण ब्रह्म और उसका चरित्र उपास्यरूप में ही वर्णित होता है। निर्गुण ब्रह्म के प्रसङ्ग में सृष्टिकारणत्वादि वर्णन निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान के अङ्गरूप में हुआ है । लाखों करोड़ों श्लोकों में राम और रामचरित्र का वर्णन भक्ति एवं तत्त्वज्ञान के लिए हैं, अतः भक्ति को अर्वाचीन काल का मानना अत्यन्त असङ्गत है । अध्यात्मरामायण की बाललीला पर कृष्ण की बाललीला का प्रभाव सुस्पष्ट है। आनन्दरामायण, सत्यो- पाख्यान आदि में जो राम-सीता की विलासक्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है वह भी कृष्णलीला से प्रभावित है । कृष्णलीला के अनुकरण की परमसीमा यह है कि भुशुण्डिरामायण, हनुमत्संहिता, बृहत्कोसलखण्ड, संगीतरघुनन्दन आदि ग्रन्थों में राम की रासलीला की कल्पना कर ली गयी है। विवाह के पूर्व तथा पश्चात् राम अयोध्या के आस- पास रासलीला करते हैं तथा वनवास के समय चित्रकूट में भी । आगे चलकर मधुराचार्य आदि रसिक-सम्प्रदाय के आचार्यों ने रामकथा में यह परिवर्तन किया है कि वास्तव में न तो मीता का हरण हुआ और न स्वयं ब्रह्मराम ने एक तुच्छ राक्षस के वध के लिए धनुषबाण ही धारण किया है। वनयात्रा के समय राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट के आगे नहीं बढ़े । वे स्वयं अपनी आह्लादिनी शक्ति सीता के साथ चित्रकूट में विहार करते रहे। इस लीला में कैङ्कर्य और व्यवस्था लक्ष्मण, जो जीवतत्त्व के प्रतिनिधि थे, करते रहे। चित्रकूट के आगे लक्ष्मी, नारायण और शेष उनके वेष में गये थे । परात्पर ब्रह्म रामजी ने रावण का वध करके सीता रूपी लक्ष्मी का उद्धार किया था । चित्रकूट लौट आये । कृपानिवासजी ने स्वरचित रामायण में यह कथा विस्तारपूर्वक लिखी है। मधुराचार्य ने राज्याभिषेक के अनन्तर सीता-वनवास की घटना को इसी प्रकार राम की प्रकाशलीला माना है। उपर्युक्त उल्लेखों के आधार पर भी राम की बाललीला और मधुर आदि लीलाओं को अनुकरण नहीं कहा जा सकता है। यह सब तभी कहा जा सकता है जबकि यह मान लिया जाय कि राम और राम की कथाएँ वस्तुस्थितिमूलक नहीं हैं केवल कल्पना- मूलक हैं; पर यह शतशः खण्डित है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि रामलीला कृष्णलीला की अपेक्षा अति प्राचीन है । कहा जा चुका है कि महर्षि वाल्मीकि ने अपौरुषेय वेदों, उपनिषदों तथा श्रीनारद के उपदेशों से राम की कथावस्तु को जानकर और समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्पूर्ण चरित्रों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया है। महर्षि व्यास ने इसी तरह श्रीमद्भागवत का निर्माण किया है। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है । उसका सार २४ हजार श्लोकों का वर्तमान रामायण ग्रन्थ है। इसके अन्य अंश रामचरित का किन्हीं महर्षियों को वाल्मीकि के समान ही साक्षात्कार हो सकता है। वर्तमान रामायण की अधिकांश कथावस्तु तो राम की ४० वर्ष की आयु के भीतर की है। वाल्मीकि के अनुसार ११ हजार वर्ष तक राम धरातल पर राज्य करते रहे हैं। अतः उनके सम्पूर्ण जीवन का वृत्तान्त लिखा जाय तो शतकोटि भी कम ही है । इसके अतिरिक्त यह कहा गया कि अधिकांश वाल्मीकि- रामायण का निर्माण सीताशुद्धि के उद्देश्य से ही हुआ है । इसके अतिरिक्त बहुत से गुप्त चरित्र हो ही सकते हैं ३४