रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ रामायणमीमांसा अष्टम जिनका उल्लेख अन्य रामायणों में या अन्य ऋषियों की कृतियों में हो सकता है । जिनको आर्षविज्ञान नहीं सम्भव है ऐसे कविगण तो रामायण, महाभारत, पुराण, उपपुराण, तन्त्र, आगम आदि प्रामाणिक आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही काव्य-निर्माण करते हैं ! क्योंकि सिद्धान्त ग्रन्थों का ही उन्हें वैसा ही निर्देश है और वैसी ही परम्परा है । आर्ष विज्ञान के आधार पर प्रथम काव्य होने से ही वाल्मीकिरामायण आदि काव्य कहा जाता है। विक्रम २००० पूर्व महाकवि कालिदास ने भी वाल्मीकिरामायण को आदि काव्य कहा है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस से रामायण के रूप में अवतरित हुए— 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।।' (लवकुशप्रोक्त मङ्गलाचरण १३) 'अनन्ता वै वेदाः' ( तै० ब्रा० ३।१०।११।४ ) के अनुसार वेद अनन्त हैं, ईश्वर का ज्ञान अनन्त है । कोई भी ज्ञान बिना शब्दानुवेध के नहीं होता है । सुतरां ईश्वर का अनन्त ज्ञान जिन शब्दों से अनुविद्ध था वे ही वैदिक शब्द हैं । अनन्त वेद का अवतार शतकोटि रामायण के ही रूप में हो सकता है । वर्तमान वाल्मीकिरामायण गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों के आधार पर है । अतः जो वेद या आर्ष ज्ञान राम की लीलाओं के आधार थे वे ही कृष्ण लीलाओं के आधार थे । इसलिए कई अंशों में तुल्यता परिलक्षित होती है । अतः तुल्यता देखकर किसी को किसी का अनुकरण कहना ठीक नहीं । अतएव बुद्ध और ईसा की बहुत अंशों में तुल्यता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ईसा के चरित्रलेखक ने बुद्ध के चरित्र का अनुकरण किया है । श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान् का अवतार केवल धर्म-ग्लानि (अधर्म) की निवृत्ति तथा धर्मसंस्थापना एवं दुष्टदर्पदलन तथा साधुपरित्राण के लिए ही नहीं, किन्तु मुख्यतया अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों को भक्तियोग-विधान के लिए ही होता है— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥” (भा० पु० १।८।२०) श्रीमद्भागवत में यह भी उल्लेख है कि भक्त की मनोवाञ्छा के अनुसार ही भगवान् अपना रूप बनाते हैं— “यद्यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति । तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥” (भा० पु० ३।९।११) वेद में भी उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ) एक ही तत्त्व मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक रूपों से प्रकट होता है, 'तं यथा यथोपासत' ( श० ब्रा० १०।५।२।२० ) । उस परमेश्वर की जिस प्रकार उपासना की जाती है परमेश्वर उन-उन रूपों में ही उपलब्ध होता है । गीता में भगवान् को गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण तथा सुहृद् रूप से उपास्य कहा गया है— “गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृद् ।” (गी० ९।१८) अर्जुन ने भी कहा है कि हे देव, जैसे सखा सखा के अपराधों को एवं प्रिय प्रिया के अपराधों को क्षमा करता है वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये । इन्हीं शास्त्रीय आधारों पर अनादिकाल से ही परमेश्वर के प्रति मधुरभाव की उपासना होती है । ऋग्वेद के अपालासूक्त में अपाला ने इन्द्र की कान्तभाव से उपासना की थी । इन्हीं मूल आधारों पर ही अगस्त्यसंहिता आदि आर्ष ग्रन्थों में वस्तुस्थिति के अनुसार ही श्रीराम की मधुर उपामनाओं का वर्णन हुआ है । भागवत आदि ग्रन्थों में भी उसी के आधार पर मधुर भक्ति का वर्णन है । शिवजी के प्रति भी