भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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ऐसे भावों का वर्णन जगद्धर भट्ट की स्तुतिकुसुमाञ्जलि में हुआ है। निर्गुणवादी कबीर आदि ने अपने इष्ट ब्रह्म को पिया (प्रिय) के रूप में माना है। अतः इन्हीं आधारों पर मधुराचार्य आदि ने अपने ग्रन्थों में मधुर भक्ति का उल्लेख किया है। राम ने रावणवध आदि कार्य नहीं किये। यह तो पारमार्थिक सिद्धान्त का ही उल्लेख है, कोई अजीब नहीं। वेदान्त-मत में आत्मा कर्तृत्व तथा भोक्तृत्व से रहित अकर्ता और अभोक्ता ही है— “अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।” (गी० ३।२७) “न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।” (गी० ५।१४) परमेश्वर वस्तुतः अकर्ता ही है। अनन्त ब्रह्माण्डों का उत्पादकत्व, पालकत्व आदि अनन्तानन्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के सम्बन्ध से ही परमेश्वर में होता है। अध्यात्मरामायण में सीता ने हनुमान् को बतलाया है कि शिवधनुषभंग, रावण-वध आदि सब काम मैंने (मूलप्रकृति ने) किये हैं। राम में तो अज्ञानवश ही कर्तृत्व का आरोप है। वेदान्त की दृष्टि से सोपाधिक ब्रह्म संसार की उत्पत्ति, पालन आदि का काम करता है। निरुपाधिक ब्रह्म सदा ही स्वरूपानन्द में ही प्रतिष्ठित रहता है। रामायण के राम; भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही वस्तु है। तीनों सगुण एवं साकार रूप पृथक् पृथक् हैं। सगुण निराकार रूप तथा निर्गुण रूप तीनों का एक ही है। शिवपुराण के शिव तथा शाक्तागमों की भगवती भी पूर्वोक्त तीन प्रकार की हैं। नृसिंहतापनीय, रामतापनीय आदि उपनिषदों में प्रणव की अ, उ, म् और अर्धमात्रा मानकर अर्धमात्रा का ही रामरूप में अवतार माना गया है। उस दृष्टि से जब तुरीय शुद्ध ब्रह्मरूप राम हैं तब तो उनमें कारणता भी नहीं है। उसी से रावणवध आदि कार्य राम ने नहीं किये, किन्तु मायाविशिष्ट कारणब्रह्मरूप लक्ष्मी नारायण आदि में ही कारणता का वर्णन है। उसी दृष्टि से यह कहना असङ्गत नहीं है कि राम सदा अपनी स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति सीता में क्रीड़ा करते रहते हैं। ईश्वरी शक्ति जगदुत्पत्ति आदि तथा राक्षस-वध आदि कार्य करती है। हितहरिवंश आदि ने भी कहा है कि कार्य-कारणतीत नित्य निकुञ्जाधिपति कृष्ण सृष्टि आदि प्रपञ्च से दूर रहकर निरन्तर राधा को ही जानते हैं और कुछ जानते ही नहीं। “श्रीराधामेव जानन् व्रजपतिरनिशं कुञ्जवीथीमुपास्ते ।” (राधासुधानिधि) जिन वेदादि शास्त्रों के आधार पर सिद्धसिद्धान्तों के अनुसार रामभक्तों ने कार्यकारणातीत राम का प्रतिपादन किया है उन्हीं के अनुसार कृष्णभक्तों ने कृष्ण का निरूपण किया है, अतः दोनों में समता प्रतीत होती है। एतावता किसी को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। राम का बहु विवाह भी कल्पभेद से सङ्गत है। १५१वें अनु० में “हरिवंश का रचनाकाल ४०० ई० के लगभग बताया गया है।” इसमें आर० सी० हाजरा इण्डियन कल्चर भाग २ पृ० २३७ तथा न्यू इण्डियन ऐण्टिक्वेरी भाग १ पृ० ५३२ का प्रमाणरूप से निर्देश किया गया है। जो सर्वथा अशुद्ध है। वस्तुतः हरिवंश के अनुसार वह महाभारत का खिल है तथा भगवान् व्यास की ही कृति है। फलतः जो महाभारत का काल है वही हरिवंश का भी काल है। बुल्के कहते हैं “इसके संक्षिप्त रामचरित में दशरथ के यज्ञ तथा अयोनिजा सीता का ही उल्लेख नहीं है ।” उनका यह कथन निस्सार है। कारण संक्षेप में कुछ घटनाओं का छूट जाना स्वाभाविक ही है। जब हरिवंश के दो स्थलों ( २।९३।६ तथा ३।१३२।९५ ) में रामायण का वर्णन है ही। शेष रामचरित्र वाल्मीकि- रामायण के अनुसार समझा ही जा सकता है। साथ ही हरिवंश ( २।३१।१८ ) में ‘सरस्वती च वाल्मीकेः' के अनुसार वाल्मीकि का ब्रह्मा से प्रेरित सरस्वती का सम्बन्ध भी बोधित होता है। इससे हरिवंश की दृष्टि में वाल्मीकिरामायण परम प्रामाणिक और महर्षि वाल्मीकि की कृति है, यही सिद्ध होता है। साथ ही (.१।१५।२६;