रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४।२६; २।६०।३५ तथा ३।७६।६३) में राम और रामकथा का वर्णन है। राम विष्णु के अवतार हैं, यह भी संक्षिप्त रामचरित्र में वर्णित है, यह पहले स्पष्ट किया जा चुका है। १५३वें अनु० में बुल्के ने राजेन्द्र हाजरा के अनुसार ही "मार्कण्डेयपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, भागवतपुराण तथा कूर्मपुराण को प्राचीनतम महापुराण माना है। बुल्के के अनुसार मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य इन पुराणों में रामचरित का वर्णन नहीं है। अन्य अवतारों के साथ ब्रह्माण्डपुराण तथा मत्स्यपुराण में राम का नाम लिया गया है (दे० मत्स्य अ० ४७, ब्रह्माण्ड ३।७३) । ब्रह्माण्डपुराण के मैथिलवंश के वर्णन में सीता के अलौकिक जन्म का उल्लेख किया गया है (दे० ३।६४।१५) । इसका भी समय चौथी श० ई० है। किन्तु पहले कहा जा चुका है कि पुराणों का वर्णन वेदों में भी मिलता है अतः पुराण अनादि हैं तो भी वेदव्यास के द्वारा उनका आविर्भाव होता है। अतः अन्य पुराणों के समान ही इसका भी समय व्यास का समय है जो कि ई० पू० ३५ सौ वर्ष ठहरता है। सर्वज्ञकल्प महर्षि वर्णित किसी अर्वाचीन व्यक्ति का वर्णन अनागत का ही वर्णन समझना चाहिए। उसके आधार पर किसी भी पुराण को अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता । मार्कण्डेय महर्षि ने वनपर्व में युधिष्ठिर को विस्तृत रामचरित्र सुनाया था। अध्यात्मरामायण ब्रह्माण्डपुराण का ही खिल है। मत्स्यपुराण में अन्य वस्तु न होने पर भी राम का अवतार तो माना ही गया है। एक ही व्यास सब पुराणों के निर्माता हैं। ऐसी स्थिति में किसी में किसी वस्तु का संक्षेप तो किसी में किसी का विस्तार प्रसङ्गानुसार युक्त ही है। विष्णुपुराण का भी समय चौथी शती ई० उचित नहीं है। इसमें अयोनिजा सीता का उल्लेख है (४, अध्याय ५) । ताटका का वध, अयोनिजा सीता का वर्णन, राम आदि चारों भाइयो के पुत्रों का उल्लेख (४, अध्याय ४) तथा १।१२।४ में लवणासुर-वध का वर्णन है। इसी से वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। वायुपुराण का काल हाजरा के अनुसार ही बुल्के ने ५वीं ई० शती माना है। इन पाश्चात्यों तथा उनके शिष्य भारतीय विद्वानों की दृष्टि में सारा विकास ईसा के बाद ही हुआ। इसी संकीर्णता के कारण वे रामायण तथा महाभारत के काल के विषय में ही नहीं वेदों के काल के विषय में भी ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष से आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं। वस्तुतः वायुपुराण का भी समय व्यास का ही समय है। इसमें (अध्याय ८०।१९१- २००) में रामचरित्र का और (८९।२२) में अयोनिजा सीता का वर्णन है। भागवतपुराण का काल ६ठी अथवा ७वीं ई० शती कहना भी निराधार है। श्रीभागवत के अनुसार महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के पश्चात् भी जब वेदव्यासजी का मन प्रसन्न नहीं हुआ तथा उन्होंने अपने आपको अकृतकृत्यसा असन्तुष्ट पाया तब देवर्षि नारद से प्रश्न किया कि मैंने यह सब किया, फिर भी मेरा मन प्रसन्न नहीं है। इसपर नारदजी संक्षिप्त भागवत का उपदेश करके विस्तृतरूप से भगवच्चरित्र-वर्णन का उपदेश करते हैं। साथ ही वे यह भी परामर्श देते हैं कि तुम समाधि द्वारा भगवान् के चरित्रों का अनुस्मरण करो— "समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ।” (भा० पु० १।५।१३) तदनन्तर भगवान् व्यास समाधि द्वारा भगवान् के स्वरूप, गुण एवं लीलाओं का अनुभव कर श्रीमद्भागवत का निर्माण करते हैं एवं अपने पुत्र शुकदेवजी को उसका अध्ययन कराते हैं। देवसहाय त्रिवेदी के अनुसार आद्य- शङ्कराचार्य का समय ई० पू० ७०० वर्ष है। स्वामी दयानन्द ने अपने सत्यार्थप्रकाश में अपने समय से २२ सौ वर्ष पूर्व शङ्कराचार्य का आविर्भाव माना है। शङ्कराचार्य ने अपने गोविन्दाष्टक में कृष्ण की मृत्तिकाभक्षणलीला का उल्लेख किया है। वह एकमात्र श्रीमद्भागवत में ही उपलब्ध है, अन्यत्र नहीं । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य ने अपने उत्तरगीता के भाष्य में भगवान् के 'पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा' (भा० पु० १।३।४) श्लोक का उद्धरण किया है। अतः भागवत को छठी या सातवीं शती का मानना सर्वथा अशुद्ध एवं निरर्गल है।