रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमद्भागवत वैष्णवों का परम धन है और सभी सम्प्रदायों का मान्य एवं परम प्रामाणिक ग्रन्थ है । श्रीवल्लभाचार्य ने उसे व्यास की समाधि-भाषा कहकर वेदों से भी उसका अधिक महत्त्व माना है । इसपर अनेक प्रामाणिक टीकाएँ हैं तथा भारतवर्ष में प्रतिवर्ष श्रीभागवत के हजारों सप्ताह पाठ होते हैं । मृत पितरों तथा मृत प्रिय व्यक्ति की सद्गति एवं कल्याणार्थ इसका सप्ताह कराया जाता है । श्रीभागवत में श्रीराम को परब्रह्म तथा सीता को लक्ष्मी के रूप में प्रतिपादित किया गया है । उसमें सीता-स्वयंवर, धनुष-भङ्ग तथा शूर्पणखा को विरूप करने तथा सीता के त्याग या वनवास का वर्णन है । इससे भी बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है । श्रीभागवत के अनुसार राजा परीक्षित् को शुकदेवजी ने श्रीभागवत सुनाया है । अतः परीक्षित् के ही पहले भागवत का निर्माण मानना अनिवार्य है । श्रीभागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) में कहा गया है कि कृष्ण के परमधाम जाने के तीस वर्ष पश्चात् भाद्रपदशुक्ल नवमी से श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् को भागवत-सप्ताह-कथा सुनायी थी । उसके पश्चात् दो सौ वर्ष बाद शुचि (आषाढ़) मास में आषाढ़शुक्ल नवमी से ही गोकर्ण ने धुन्धुकारी को भागवत-कथा सुनायी थी— “आकृष्णनिर्गमाद् त्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ । नवमीतो नभस्ये च कथारम्भं शुकोऽकरोत् ॥ परीक्षिच्छ्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये । शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत् कथाम् ॥” (भाग० मा० ६।५५-५६) कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय है, ७वीं ई० शती नहीं । उसके पूर्वविभाग १९वें अध्याय में राक्षस-वंश-वर्णन तथा सूर्यवंश-वर्णन के प्रसङ्ग में रामचरित्र वर्णित है । उसमें युद्ध के पश्चात् राम द्वारा शिवलिङ्ग की स्थापना का उल्लेख है । उत्तरविभाग २१वें अध्याय तथा ३४वें अध्याय में सीताहरण का वृत्तान्त है । भारतीय दृष्टिकोण से सभी पुराण व्यासकृत हैं । अतएव जैसे वेदों के विभिन्न शाखावाले ब्राह्मणों तथा उपनिषदों का समन्वय करके ही कर्म, उपासना एवं ब्रह्मज्ञान का रूप निर्धारित किया जाता है । इसी के लिए पूर्वोत्तरमीमांसारूप वाक्य- शास्त्र अपेक्षित है । उसी तरह पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार ही वेदों के आर्ष भाष्यरूप पुराणों का भी समन्वय करके ही राम, कृष्ण आदि अवतारों के चरित्रों तथा व्रतों, उपवासों और पर्वों का निर्धारण किया जाता है । हेमाद्रि, पराशरमाधव, वीरमित्रोदय, धर्मसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थ एवं मिताक्षरा, दायभाग सब इसी मार्ग पर चलते हैं । पाश्चात्यपद्धति से पुराण, रामायण, महाभारत, ब्राह्मण, उपनिषद् एवं वेद कोई भी न तो प्रामाणिक सिद्ध होते हैं और न उनका समन्वय ही होता है । उनकी दृष्टि से ये सब के सब कल्पनाप्रसूत हैं; विकास हैं एवं विभिन्न लेखकों के दिमाग की उपज हैं । उनका परस्पर विरोध है । अतएव सुन्द-उपसुन्द न्याय से सब अप्रमाण ही हैं । पर क्या ऐसा मानना उचित है ? १५७वें अनु० में बुल्के ने शेष महापुराणों को गौण महापुराण बताया है । राजेन्द्र हाजरा के अनुसार इन महापुराणों में कई बार रूपान्तर हुआ है । उनके अनुसार वराहपुराण का रचनाकाल ८वीं शती ई० है । परन्तु उनकी यह कल्पना भी पाश्चात्य संस्कारों का ही दुष्परिणाम है । भारतीय हेमाद्रि आदि निबन्ध-ग्रन्थों में इन पुराणों का उल्लेख है और प्रमाणरूप में इनके वचनों का उल्लेख किया जाता है । वैशम्पायन उवाच— “आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्या चिन्ततो हरिः । गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ॥ कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथातिनाशन ॥