भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२७० रामायणमीमांसा अष्टम कृष्ण कृष्ण महाविष्णो विश्वात्मन् विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।।' (म० भा० २।६८।४१-४३) अर्थात् जब दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र आकर्षण करने लगा तो द्रौपदी ने भगवान् का चिन्तन ( स्मरण ) किया—हे द्वारकावासिन्, कृष्ण, गोपीजनप्रिय ! मैं कौरवों से अभिभूत ( पीड़ित-अपमानित ) हो रही हूँ क्या आप नहीं जान रहे हैं। हे नाथ, हे रमानाथ, हे व्रजनाथ, हे आर्तिहन्, मैं कौरवरूपी समुद्र में डूब रही हूँ; मेरा उद्धार करो । हे विश्वभावन, हे गोविन्द मैं आपकी शरण में हूँ। कुरुओं के मध्य अवसन्न होती हुई मेरी रक्षा करो। इस तरह महाभारत की द्रौपदी ने कृष्ण को गोपीजनप्रिय और व्रजनाथ पदों से सम्बोधित किया था। कृष्ण का गोपीजनप्रियत्व आदि श्रीभागवत से ही विदित होता है। भागवतपुराण के कर्ता ही महाभारत कर्ता थे। तभी उनको कृष्ण का व्रजसम्बन्ध ज्ञात था । महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्ता के रूप से व्यासजी प्रसिद्ध हैं। उसी रूप में विविध निबन्धों और काव्यों में उनका प्रामाण्य मानकर उनका उद्धरण किया जाता है। परन्तु पाश्चात्य विद्वान् उन सबको झूठा बनाकर कहते हैं कि इनके व्यास कर्ता नहीं हैं, किन्तु कोई अन्य लोग ही कर्ता हैं। वे कर्ता कौन हैं और इसमें क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न का उत्तर उनके पास कुछ नहीं है तो भी वे हठधर्मिता पर अड़े रहते हैं। जिन ग्रन्थों में जिनको कर्ता माना गया है। उनको कर्ता न मानकर प्रमाण के बिना ही किन्ही अन्य विभिन्न लोगों को कर्ता मान लेना कितना साहस है ? क्या पाश्चात्य जगत् में या भारत में ही कोई ऐसा किसी को ज्ञात है जो ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का निर्माण करे और अपने नाम तक का उल्लेख न करे। छल-कपट भी तो निःस्वार्थ नहीं होता। आखिर कोई क्यों ऐसे ऐसे ग्रन्थरत्नों का निर्माण करके अपना नाम छिपायेगा ? साथ ही पाश्चात्य लोग इन ग्रन्थों में वर्णित विषयों को वास्तविक एवं प्रामाणिक न मानकर काल्पनिक एवं अप्रामाणिक भी मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि विद्वान् तत्त्वज्ञ ऐसे मिथ्या विषय पर पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ लिखकर प्रचार क्यों करना चाहेगा ? प्रयोजन के बिना संसार में किसी की किञ्चिन्मात्र भी प्रवृत्ति नहीं होती तब फिर सैकड़ों सहस्रों विद्वानों की निरर्थक काल्पनिक मिथ्याग्रन्थों के निर्माण और प्रचार में प्रवृत्ति क्यों हुई ? और इसमें क्या प्रमाण है ? सर्वथापि जिन ग्रन्थों का जो कर्ता उस ग्रन्थ से या प्रामाणिक अन्य ग्रन्थों से सिद्ध होता है उसी को उसका कर्ता मानना चाहिए । उसके कर्ता का काल ही उस ग्रन्थ का काल मानना युक्त है। अतः वराहपुराण का भी वही काल है जो उसके कर्ता व्यास का काल है। ग्रन्थों के विषय की अर्वाचीनता देखकर ही पाश्चात्य लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं। पर यह पद्धति वेदों और आर्षग्रन्थों के लिए उपयुक्त नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्षग्रन्थों के रचयिता योगज सामर्थ्य से अतीत और अनागत विषयों को जानकर ही उनका उल्लेख करते हैं। मिथ्या कल्पना कर उसपर काव्य लिखना तर्कशून्य है। अस्तु, वराहपुराण के अनुसार दशरथ ने रामद्वादशी का व्रत किया उसके फलस्वरूप राम, भरत आदि की प्राप्ति हुई (अ० ४५) । इस पुराण के १६३वें अध्याय का रचनाकाल ८वीं ई० शती से १० वीं शती ई० है, यह कहना भी असङ्गत ही है। कर्ता को भविष्यज्ञानशून्य मानने से ही उस अध्याय को अर्वाचीन कहने का प्रयत्न किया गया है। इसी तरह अग्निपुराण को भी ८वीं शती ई० के पश्चात् का मानना भी निराधार है। अग्निपुराण में वाल्मीकिरामायण के सातों काण्डों का संक्षिप्त रूप है, यह ठीक है—इससे बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। मन्थरा को अपने ऊपर राम के अत्याचार का भ्रम हो सकता था। अग्निपुराण (अध्याय ५।११) में उसी का उल्लेख होगा। माल्यवान् पर्वत पर राम के चातुर्मास्य यज्ञ करने का उल्लेख है। लिङ्गपुराण को दसवीं शती ई० का मानना भी पूर्ववत् भ्रान्ति ही है। इसमें भी अत्यन्त संक्षिप्त राम- चरित्र का वर्णन है (दे० लि० पु० पूर्वार्ध ९६।३५, ३६)। अम्बरीषोपाख्यान में राम तथा उनके भाइयों के अवतारत्व का उल्लेख है। वस्तुतः उन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहने का आधार यह है कि उनमें भरत और शत्रुघ्न को शङ्ख एवं