रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंचक्र का अवतार माना गया है और उनके अवतारत्व का विकास अर्वाचीन है। पर यह तर्क अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। कारण, उनके अवतारत्व को अर्वाचीन तभी कहा जा सकता है जब उनके बोधक ग्रन्थ अर्वाचीन हों और ग्रन्थ अर्वाचीन तभी सिद्ध होंगे जब उक्त अवतारत्व की अर्वाचीनता सिद्ध हो। वस्तुतः प्राचीन उपनिषद् रामरहस्य में भरत, शत्रुघ्न आदि को अवतार माना गया है। अतः उनका अवतारत्व विकास नहीं है। वामनपुराण भी अर्वाचीन नहीं है। अतएव वेदवती का सीता में सायुज्य प्राप्त करके सीतारूप में प्रादुर्भाव युक्त ही है। १५८वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘नारदपुराण अप्राप्य है। प्रचलित नारदीयपुराण दसवीं शती ई० का है। इसमें पीछे से बहुत से प्रक्षेप जोड़े गये हैं।‘’ यह भी अनर्गल कल्पना है। कल्पना के आधार पर किसी प्रामाणिक ग्रन्थ के कुछ अंशों को अप्रामाणिक कहना अक्षम्य अपराध है। इसके पूर्वखण्ड में संक्षिप्त रामचरित बालकाण्ड तक वर्णित है। इससे भी बालकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। ७९ वें अध्याय में द्रविड़ देश के ब्राह्मणों द्वारा बाँधे गये विभीषण की राम द्वारा मुक्ति का वर्णन है तथा उत्तरखण्ड में बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक समस्त वाल्मीकिरामायण की कथा वर्णित है। जिसमें राम, लक्ष्मण आदि नारायण, संकर्षण आदि के अवतार बताये गये हैं। ७५वें अध्याय को वस्तुतः वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्तीकरण मानने की अपेक्षा महर्षि की स्वतन्त्र कृति मानना ही उचित है। १५९वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘‘ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। २१३वें अध्याय का रामचरित्र ज्यों का त्यों हरिवंश के ४१वें अध्याय से उद्धृत है।‘’ बुल्के के उक्त कथन से यही सिद्ध होता है कि दोनों के रचयिता एक ही हैं। अतएव हरिवंश का रामचरित्र ब्रह्मपुराण में उद्धृत किया ही जा सकता है। अस्मदादि के लेखों तथा ग्रन्थों में भी ऐसा होता है। कभी-कभी एक ग्रन्थ की कोई बात ज्यों की त्यों अन्य ग्रन्थ में उद्धृत कर दी जाती है। १७६वें अध्याय में रावण चरित्र के अन्तर्गत रावण की तपस्या के बाद एक संक्षिप्त रामकथा है। उसमें रावण द्वारा अमरावती से चुरायी हुई वासुदेवप्रतिमा का वृत्तान्त है। रावण वध के बाद राम ने वह मूर्ति समुद्र को समर्पित कर दी थी। लेकिन बाद में कृष्ण ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। ‘‘ब्रह्मपुराण की शेष रामकथासम्बन्धी सामग्री गौतमीमाहात्म्य अध्याय ७०-१७५ के अन्तर्गत मिलती है। यह माहात्म्य प्रारम्भ में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ था जिसकी रचना १०वीं शती में अथवा उसके बाद हुई होगी। इसमें भिन्न-भिन्न तीर्थों के माहात्म्य दिखलाने के लिए बहुत सी कथाओं का संकलन किया गया है। रामतीर्थमाहात्म्य में रामकथा का वर्णन मिलता है। इसकी निम्नोक्त विशेषताएँ हैं— कैकेयी द्वारा देव-दानव-युद्ध में तीन वरों की प्राप्ति, श्रवणकुमार-वध के प्रायश्चित्त रूप में दशरथ का अश्वमेध यज्ञ करना तथा उसमें आकाशवाणी द्वारा उन्हें पुत्रोत्पत्ति का आश्वासन दिया जाना। वनवास-काल में गोमती-तट पर राम के पिण्डदान द्वारा नरक से दशरथ की मुक्ति (अध्याय १२३) एवं सहस्रकुण्ड-माहात्म्य (अध्याय १५४) में सीता-त्याग का उल्लेख है। इसके बाद वियोगी राम का गौतमी-तट के सहस्र-कुण्ड पर तपस्या करने का वर्णन है। किष्किन्धा-तीर्थमाहात्म्य १५७वें अध्याय में रावण-वध के बाद अयोध्या की यात्रा करते हुए गौमती-तट पर राम के ५ दिन निवास तथा शिवलिङ्ग-पूजा का उल्लेख किया गया है।‘’ बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। किन्तु इतना ही कहा जा सकता है कि इन इन अंशों में अन्य पुराणों से उसकी समानता है। ऋग्वेद की विभिन्न शाखाओं में बहुत मन्त्रों की समानता प्रतीत होती है तो भी यह नहीं माना जाता है कि एक शाखा ने दूसरी शाखा से उन मन्त्रों का उद्धरण किया है। विभिन्न वेदों की विभिन्न शाखाओं के पुरुषसूक्तों में बहुत समानता है। फिर भी वे सभी