रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 349, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनादि, अपौरुषेय और स्वतन्त्र माने जाते हैं । जैसे सह्याद्रिखण्ड स्कन्दपुराण का अंश होता हुआ भी स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। उसी तरह ब्रह्मपुराण का अंश होता हुआ गौतमीमाहात्म्य भी स्वतन्त्र ग्रन्थ समझा जाता है। वस्तुतः वह ब्रह्मपुराण का अंश ही है। सुप्रसिद्ध 'गीता' जैसा ग्रन्थ भी तो महाभारत का अंश होते हुए भी स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाता है । गौतमीमाहात्म्य दसवीं शती ई० का है इसका भी कोई प्रामाणिक आधार नहीं है। किसी आधुनिक व्यक्ति, तीर्थ या घटना का वर्णन होने के कारण ही पाश्चात्य विचार के लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं । परन्तु यह नियम आर्षग्रन्थों पर लागू नहीं होता, क्योंकि ऋषि योगबल से भविष्यकाल की वस्तुओं को जानकर अपने ग्रन्थ में लिख सकता है। पुण्य तथा पाप अदृष्ट वस्तु है। उनका ज्ञान किसी सामान्य मनुष्य को नहीं होता। अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक धर्मशास्त्रों, महाभारत, पुराण, उपपुराण आदि आर्षग्रन्थों से ही धर्म, अधर्म अथवा पुण्य तथा पाप का ज्ञान हो सकता है। किस तीर्थ से कौन और कितना पाप नष्ट होता है एवं कितना पुण्य होता है। परलोक में किस तीर्थ के दर्शन, स्पर्शन, अभिषेक, श्राद्ध, पूजा और तपस्या से क्या फल होगा ? इसमें आर्षग्रन्थ ही प्रमाण हो सकते हैं। धर्मशास्त्र-निबन्धकार भी तीर्थों तथा व्रतों का विचार आर्ष वचनों के अनुसार ही करते हैं, अतः गौतमीमाहात्म्य को आधुनिक तथा सामान्य मनुष्यकृत मानना भारतीय दृष्टि से सर्वथा भ्रान्त धारणा है। पाश्चात्यों की अनर्गल कल्पनाओं के आधार पर विचार करने से अवतार, तीर्थ, पूजा, पाठ तथा भक्ति सब केवल कल्पनामात्र ठहरते हैं। कल्पना भी क्रम से विकसित हुई। राम, कृष्ण आदि सब मनुष्य थे। कुछ समय बाद उनके प्रभाव से प्रभावित लोग उन्हें ईश्वर समझने लगे, अवतार मानने लगे। उनको विष्णु से अभिन्न मानने लगे । विष्णु में भी महत्त्वबुद्धि बाद में हुई। पहले इन्द्र ही मुख्य एवं प्रधान देवता थे। अवतार भी प्रजापति के माने जाते थे । विष्णु का महत्त्व बढ़ने से वही अवतार विष्णु के माने जाने लगे। राधा तथा सीता में अवतारत्व कल्पना और बाद में हुई । लक्ष्मण, भरत आदि में शङ्ख, चक्र आदि के अवतारत्व की कल्पना और बाद में हुई । इसी तरह तीर्थों की भी कल्पना का विकास हुआ है। फलतः जिन ग्रन्थों में सीता को लक्ष्मी या लक्ष्मण को शेष कहा गया हो, वे सब ग्रन्थ १०वीं या ११वीं शती ई० के ठहरा दिये जाते हैं । वास्तव में ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण हैं। भारतीय दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष तथा अनुमान के समान ही वेदादि आगम भी स्वतन्त्र प्रमाण हैं। शब्द का प्रामाण्य सर्वत्र मान्य है। पार्लियामेण्ट तथा न्यायालयों में शब्द का प्रामाण्य मान्य है। विधान के शब्दों, न्यायाधीशों के निर्णयों तथा साक्षियों की गवाहियों का आदर होता है। वक्ता के दोष से ही शब्द का अप्रामाण्य होता है। यदि कोई अनादि अपौरुषेय शब्द सिद्ध होता हो तो उसमें वक्ता के भ्रम, प्रमाद आदि दोषों से दूषित होने की कल्पना नहीं होती। सुतरां निर्भ्रान्त आप्त वक्ता का वचन होने से उसका ( शब्द का ) अधिक प्रामाण्य माना जाता है। मन्त्र, ब्राह्मण तथा उपनिषद वेद हैं । वे सब अपौरुषेय हैं। सर्वज्ञ- कल्प ऋषि-महर्षियों ने वेदों का परम प्रामाण्य माना है। बड़े-बड़े दार्शनिकों, तार्किकों को पाश्चात्यों की निराधार मिथ्या कल्पनाओं के बल पर ठुकराया नहीं जा सकता । निबन्धकारों ने ऋषियों तथा मीमांसा की दृष्टि से आर्ष वचनों में प्रतीत होनेवाले विरोधों का परिहार कर समन्वय कर रखा है। पुराणों के विरोधाभासों का भी सन्तोष- जनक समाधान सुलभ है। अतः बुल्के तथा उनके अन्य साथियों की आर्ष परम्पराविरुद्ध उक्त सभी कल्पनाएँ सर्वथा उपेक्षणीय ही हैं । अन्य आर्ष ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण की कथाओं से विलक्षण कथाएँ होना भी असम्भव नहीं है, क्योंकि किसी एक पुस्तक में जीवन के प्रतिदिन या प्रत्येक घटना का उल्लेख होना सम्भव नहीं । अतः विभिन्न ऋषियों के कहने के लिए बहुत से विषयों का अवशेष रहना सम्भव ही है, इसलिए राम का गौतमी-तट पर पिण्डदान, सहस्रकुण्ड पर तपस्या, शिवलिङ्ग की स्थापना करना आदि सब ठीक है।