भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 350

अध्याय अवतार-सामग्री २७३ १६०वें अनु० गरुड़पुराण की रचना का समय भी उसके रचयिता व्यास का ही समय मानना उचित है। इसके विपरीत उसका रचना-काल १०वीं शती ई० मानना असङ्गत है। शूर्पणखा को राम स्वयं विरूप करते हैं। कल्पभेद से यह भी सम्भव ही है। राम गया में अपने पिता का श्राद्ध करते हैं, यह तो मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वरूपानुरूप ही है। १६१वें अनु० में बुल्के का कथन है कि "स्कन्दपुराण की अधिकांश सामग्री की सृष्टि आठवीं शती ई० के बाद हुई है। लेकिन इसमें बहुत से प्रक्षेप हैं। जिनका रचनाकाल अज्ञात है।" किन्तु यह कहना असङ्गत है। स्कन्दपुराण को पुराणों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। यह प्रसिद्ध व्यासकृति ई० पू० ३५ सौ वर्षों से कम अर्वाचीन नहीं है। माहेश्वरखण्ड में रावणचरित, रामावतार और राम के द्वारा रावण का वध वर्णित है। वैष्णवखण्ड के अन्तर्गत कार्तिक- माहात्म्य में अवतार के कारणों के वर्णन के प्रसङ्ग में वृन्दा-शाप तथा धर्मदत्त और कलहा की कथा है। धर्मदत्त का ही दशरथरूप में जन्म कहा गया है। वैशाखमासमाहात्म्य में वाल्मीकि की जन्म-कथा तथा अयोध्यामाहात्म्य में राम का स्वधाम-गमन वर्णित है। ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सेतुमाहात्म्य के २ अध्यायों में संक्षिप्त रामकथा वर्णित है। जिसमें सेतुबन्ध का विशेषरूप से वर्णन है। ७ वें अध्याय में समुद्रबन्धन के पूर्व शिवप्रतिष्ठा का वर्णन है। २२ वें अध्याय में सीता की अग्निपरीक्षा तथा अग्नि द्वारा सीता के सतीत्व की प्रशंसा वर्णित है। २३वें अध्याय में रावणवध से हुई ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्तरूप में राम द्वारा कोटितीर्थ पर शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। ३०वें अध्याय में विभीषण द्वारा सेतु तोड़ने के लिए श्रीरामजी से प्रार्थना की गयी है। अध्याय ४४-४७ में रामोपाख्यान पर आधारित संक्षिप्त रामचरित, रावणवध के प्रायश्चित्तरूप में रामेश्वर-लिङ्ग की स्थापना, शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् को कैलाश भेजा जाना तथा मुहूर्त बीत जाने की आशङ्का से राम द्वारा सैकतमय (बालू के) शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३०, ३१ में एक संक्षिप्त कालनिर्णय रामायण का वर्णन है। अध्याय ३२-३५ में राम द्वारा धर्मारण्य की तीर्थ-यात्रा वर्णित है। काशीखण्ड, इसमें रामकथा का अभाव हैं। अवन्तीखण्ड अध्याय २१ में शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् की लङ्का यात्रा, अध्याय २४ में वाल्मीकि-जन्मकथा, अध्याय ७९ में हनुमान् का चरित्र । इसमें हनुमान् रुद्रावतार माने गये हैं। अध्याय ७३ रेवाखण्ड में ब्रह्महत्या दोष-निवारणार्थ हनुमान् की तपस्या एवं अहल्योद्धार की कथा; राम से उद्धृत अहल्या नर्मदा-तीर पर शिव की पूजा करने जाती हैं। अध्याय १६८ में रावणादि की तपस्या तथा शिवजी द्वारा वर-प्रदान वर्णित है। नागरखण्ड अध्याय २० में लक्ष्मण का स्वामिद्रोह और तपस्या। अध्याय ९६-९८ में शनि का दशरथ को वर प्रदान। दशरथ और इन्द्र की मैत्री, कार्तिकेयपुर में पुत्र-प्राप्ति के लिए दशरथ का तपस्या करना तथा ४ पुत्रों एवं एक पुत्री का जन्म। अध्याय ९९-१०२ में राम का स्वर्गारोहण, विभीषण को राम द्वारा धर्मोपदेश तथा राम द्वारा सेतुभङ्ग एवं अनेक तीर्थों में राम द्वारा शिवप्रतिष्ठा। अध्याय १२४ में वाल्मीकि-कथा एवं अध्याय २०८ में अहल्योद्धार । अहल्या की तीर्थयात्रा तथा शिव-पूजा । प्रभासखण्ड अध्याय १११-११३ में रामेश्वरतीर्थ में राम और लक्ष्मण द्वारा शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १२३ में रावण द्वारा रावणेश्वर-तीर्थ में शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १७१ में दशरथेश्वर में दशरथ द्वारा पुत्रार्थ शिव-प्रतिष्ठा तथा अध्याय २७८ में वाल्मीकि-कथा। इन उद्धरणों से विदित होता है कि स्कन्दपुराण द्वारा भगवान् व्यास ने विभिन्न प्रसङ्गों में राम के मर्यादापुरुषोत्तमरूप को व्यक्त किया है। श्रीमद्भागवत में व्यास ने कहा है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मत्यों के शिक्षणार्थ ही है। केवल रावणादि राक्षसों के वधार्थ नहीं— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५) ३५