रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ रामायणमीमांसा अष्टम १६२ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचनाकाल अलग-अलग है। पाताल- खण्ड जिसमें बहुत सी रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, १२वीं शती का माना जाता है। उत्तरखण्ड अपना वर्तमान रूप १५०० ई० के लगभग प्राप्त कर सका। इसमें भी रामचरित का पूरा वर्णन है। पातालखण्ड का एक गौड़ीय पाठ सुरक्षित है, जिसमें प्रारम्भ के २८ अध्यायों में कालिदासकृत रघुवंश से मिलती जुलती कथाएँ मिली हैं। आनन्द- श्रम-संस्करण के पातालखण्ड में रामाश्वमेध का विस्तृत वर्णन है।" उनके इस कथन का आधार भी डा० हाजरा की 'इण्डियन कल्चर' पुस्तक है जो कि अटकलमात्र तथा सब पुराणों से विरुद्ध है। अनेक प्रामाणिक पुराणों में १८ पुराण तथा १४ उपपुराणों का उल्लेख है। उनमें स्कन्द- पुराण, पद्मपुराण आदि पुराण वर्णित हैं। केवल अटकलबाजियों से आर्ष पुराणों की उक्तियों को झुठलाया नहीं जा सकता है। जहाँ जहाँ राम की ब्रह्मरूपता, परमेश्वरता तथा राम की भक्ति का वर्णन है उन उन ग्रन्थों या खण्डों को आधुनिक कहना कोई तर्क-युक्तिसंगत नहीं है। वेदों, उपनिषदों, रामायण, भारत आदि सभी प्रामाणिक ग्रन्थों में अवतारसत्ता, राम की ब्रह्मरूपता और उनकी भक्ति प्रसिद्ध है। अन्यान्य आर्ष ग्रन्थों के विरुद्ध होने के कारण इन ग्रन्थों के काल-निर्णय की उक्त पद्धति ही गलत है। पातालखण्ड में राम-चरित्र की मुख्य घटनाओं की तिथियों के उल्लेख को बुल्के स्कन्दपुराण की नकल मानते हैं। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है। जैसे वैदिक संहिताओं में समान पाठ होने पर भी एक संहिता का दूसरी संहिता में अनुकरण नहीं माना जाता वैसे ही पुराणों में भी तुल्य वर्णन होने पर भी, वेदों के समान ही, एक में दूसरे का अनुकरण नहीं माना जा सकता। ४४वें अध्याय में हनुमान्जी की वीरता का वर्णन, ४४-४६ अध्यायों में राम तथा शिव का अभेद प्रतिपादन, ५५, ५६वें अध्यायों में धोबी के कथन के फलस्वरूप सीता का परित्याग, ५९-६६ अध्यायों में कुश और लव की उत्पत्ति तथा उनका राम की सेना से युद्ध करना, ६७, ६८वें अध्यायों में राम और सीता का पुनर्मिलन। पातालखण्ड के १०० वें अध्याय में बाँधे हुए विभीषण की राम द्वारा मुक्ति तथा १, २ वें अध्याय में पुराकल्पीय रामायण का वर्णन। उनमें दशरथ की कौशल्या, सुमित्रा, सुरूपा तथा सुवेषा चार पत्नियों का उल्लेख है। बाल-लीलाएँ, सीता-स्वयंवर में इन्द्र, रावण आदि के असफल होने पर राम द्वारा धनुर्भङ्ग की कथा तथा शिव के दिये हुए अजगव धनुष पर वानरसेना द्वारा समुद्र पार करने की कथा है एवं कुम्भकर्ण-वध रावण-वध के बाद माना गया है। ११३ वें अध्याय में राम शिव से शिवभक्ति का वरदान माँगते हैं— "भक्तिरस्तु स्थिरा त्वयि।" यह सब मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वाभाविक रूप का ही वर्णन है। शिवमहिम्न आदि अनेक प्रामाणिक ग्रन्थों में यह वर्णन मिलता ही है कि विष्णु भगवान् प्रतिदिन सहस्र कमल अर्पित कर शिव की पूजा करते थे। किसी दिन एक कमल कम होने पर उन्होंने अपना नेत्र ही कमल मानकर शिवजी को चढ़ा दिया। सृष्टिखण्ड में शम्बूक-वध तथा राम और अगस्त्य का संवाद है। बुल्के कहते हैं इसमें वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ७९ से ८३ तक के ५ सर्गों की सामग्री उद्धृत है, उनका यह कथन असङ्गत है। यद्यपि वाल्मीकि- रामायण व्यास से भी अतिप्राचीन है, अतः उसके उक्त अंश का उद्धरण करना असंभव नहीं है तथापि बुल्के तो उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप ही मानते हैं। व्यास भगवान् ने जैसे स्वयं भी आर्ष विज्ञान से रामाश्वमेध आदि का निर्माण किया है वैसे ही वे अगस्त्य-संवाद का भी निर्माण कर ही सकते हैं। सृष्टिखण्ड के ३९ वें अध्याय में राम का विभीषण को उपदेश और मथुरा में वामन की प्रतिष्ठा करना प्रतिपादित है। उत्तरखण्ड में वृन्दा का शाप, रामरक्षास्तोत्र, शम्बूक-वध तथा संक्षिप्त रामसम्बन्धी वृत्तान्त वर्णित हैं।