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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 352

अध्याय अवतार-सामग्री २७५ प्रारम्भ में रामावतार के कारण के वर्णन-प्रसङ्ग में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन है। जिसके फल- स्वरूप वे तीन जन्मों में विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त कर सके थे । इसमें अवतारवाद के अधिक व्यापक होने से ही बुल्के आदि इसे अर्वाचीन मानते हैं। इसी कारण वाल्मीकिरामायण के उन अंशों को भी जिनमें अवतार-सामग्री है, वे आधुनिक प्रक्षेप मानते हैं। यह उनका केवल दुराग्रह ही है। वहाँ राम ने अपनी माता को विष्णुरूप में दर्शन दिया है। राम और सीता विष्णु और लक्ष्मी के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न शेष, सुदर्शन तथा पाञ्चजन्य के अवतार माने जाते हैं। इसमें राम ने ही शूर्पणखा को विरूप किया था। इसी के अनुसार गो० तुलसीदासजी ने भी रामचरितमानस में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन एवं जन्म-काल में राम द्वारा कौशल्या को चतुर्भुजरूप में दर्शन देने का वर्णन किया है । १६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "ब्रह्मवैवर्तपुराण ७०० ई० के पूर्व ही निर्मित हुआ; लेकिन उसका वर्तमान रूप सोलवीं शती का है। इसमें वेदवती के वृत्तान्त के वर्णन के बाद सीताहरण की कथा दी गयी है। अग्नि द्वारा एक मायामयी सीता की सृष्टि करने का उल्लेख है। प्रकृतिखण्ड के १४वें अध्याय की यह कथा श्रीमद्देवीभागवत के वृत्तान्त से अभिन्न है (स्क० ९ अ० १६) । कृष्णजन्मखण्ड (अध्याय ६२) में अहल्योद्धार-वर्णन के प्रसङ्ग में संक्षिप्त रामकथा है जिसमें शूर्पणखा के कुब्जारूप में प्रकट होने का वृत्तान्त है। इसी खण्ड के ५६वें अध्याय में जय और विजय के ३ जन्मों का उल्लेख है।" उपर्युक्त ब्रह्मवैवर्तपुराण का भी कालनिर्णय अशुद्ध है। अन्यान्य पुराणों के समान ही यह भी व्यासकृत ही है। १६ वीं शती में इसका विस्तार हुआ यह कथन भी मान्य नहीं है, क्योंकि अन्यान्य पुराणों के वर्णनप्रसङ्ग में उनके श्लोकों की संख्या भी दी गयी है। तदनुसार ही ब्रह्मवैवर्तपुराण की श्लोक-संख्या है। उपपुराण १६४वें अनु० में बुल्के के अनुसार, "विष्णुधर्मोत्तरपुराण की रचना संभवतः ५वीं शती के लगभग कश्मीर में हुई है। इसमें लवण-वध की कथा के बाद खण्ड १ के अध्याय २०० में गन्धर्वों के विरुद्ध भरत के युद्ध का विस्तृत वर्णन है। अध्याय २०२-२६९ के अन्तर्गत रावण का चरित वर्णित है। उसमें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न क्रमानुसार नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के अवतार बताये गये हैं (दे० अध्याय २१२) ।" उपपुराण भी पुराणों के समय के ही हैं। वे भी आर्ष हैं और प्रामाणिक हैं। पुराणों में उपपुराणों की भी चर्चा है। अतः विष्णुधर्मोत्तर का काल पांचवीं शती न होकर व्यास का काल ही उसका काल है। भारतीय धर्मग्रन्थ परस्पर एक दूसरे से संबद्ध ही हैं। इसलिए अल्पश्रुत के लिए शास्त्रों का अभिप्राय दुरूह ही रहता है। इतिहास, पुराण और उपपुराण का अध्ययन करते समय उनके समन्वय से ही तात्पर्यार्थ निर्धारित होता है। चतुर्व्यूह नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में राम आदि का अवतार ठीक ही है। जिनको ईश्वर एवं उसके अवतार में विश्वास नहीं है, जो राम का अवतार नहीं मानते हैं एवं जिन्होंने यह निर्णय कर रखा है कि राम की भक्ति और उनके अवतारत्व की कल्पना अर्वाचीन है, उनकी दृष्टि में जिन ग्रन्थों में अवतार-सामग्री उपलब्ध हो वे ग्रन्थ ही अर्वाचीन प्रतीत होंगे, परन्तु उक्त धारणा ठीक नहीं है, यह कहा जा चुका है। नृसिंहपुराण १६५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "यह चौथी या पाँचवीं शती ई० का है। इसमें छः अध्याय (४७ से ५२ तक) मिलते हैं जिनमें वाल्मीकिरामायण के प्रथम छः काण्डों की कथा का किंचित्-परिवर्तन के साथ वर्णन है। अवतारवाद को अधिक महत्त्व दिये जाने के कारण राम नारायण के पूर्णावतार तथा लक्ष्मण शेष के अवतार बताये