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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय अवतार-सामग्री २७५ प्रारम्भ में रामावतार के कारण के वर्णन-प्रसङ्ग में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन है। जिसके फल- स्वरूप वे तीन जन्मों में विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त कर सके थे । इसमें अवतारवाद के अधिक व्यापक होने से ही बुल्के आदि इसे अर्वाचीन मानते हैं। इसी कारण वाल्मीकिरामायण के उन अंशों को भी जिनमें अवतार-सामग्री है, वे आधुनिक प्रक्षेप मानते हैं। यह उनका केवल दुराग्रह ही है। वहाँ राम ने अपनी माता को विष्णुरूप में दर्शन दिया है। राम और सीता विष्णु और लक्ष्मी के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न शेष, सुदर्शन तथा पाञ्चजन्य के अवतार माने जाते हैं। इसमें राम ने ही शूर्पणखा को विरूप किया था। इसी के अनुसार गो० तुलसीदासजी ने भी रामचरितमानस में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन एवं जन्म-काल में राम द्वारा कौशल्या को चतुर्भुजरूप में दर्शन देने का वर्णन किया है । १६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "ब्रह्मवैवर्तपुराण ७०० ई० के पूर्व ही निर्मित हुआ; लेकिन उसका वर्तमान रूप सोलवीं शती का है। इसमें वेदवती के वृत्तान्त के वर्णन के बाद सीताहरण की कथा दी गयी है। अग्नि द्वारा एक मायामयी सीता की सृष्टि करने का उल्लेख है। प्रकृतिखण्ड के १४वें अध्याय की यह कथा श्रीमद्देवीभागवत के वृत्तान्त से अभिन्न है (स्क० ९ अ० १६) । कृष्णजन्मखण्ड (अध्याय ६२) में अहल्योद्धार-वर्णन के प्रसङ्ग में संक्षिप्त रामकथा है जिसमें शूर्पणखा के कुब्जारूप में प्रकट होने का वृत्तान्त है। इसी खण्ड के ५६वें अध्याय में जय और विजय के ३ जन्मों का उल्लेख है।" उपर्युक्त ब्रह्मवैवर्तपुराण का भी कालनिर्णय अशुद्ध है। अन्यान्य पुराणों के समान ही यह भी व्यासकृत ही है। १६ वीं शती में इसका विस्तार हुआ यह कथन भी मान्य नहीं है, क्योंकि अन्यान्य पुराणों के वर्णनप्रसङ्ग में उनके श्लोकों की संख्या भी दी गयी है। तदनुसार ही ब्रह्मवैवर्तपुराण की श्लोक-संख्या है। उपपुराण १६४वें अनु० में बुल्के के अनुसार, "विष्णुधर्मोत्तरपुराण की रचना संभवतः ५वीं शती के लगभग कश्मीर में हुई है। इसमें लवण-वध की कथा के बाद खण्ड १ के अध्याय २०० में गन्धर्वों के विरुद्ध भरत के युद्ध का विस्तृत वर्णन है। अध्याय २०२-२६९ के अन्तर्गत रावण का चरित वर्णित है। उसमें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न क्रमानुसार नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के अवतार बताये गये हैं (दे० अध्याय २१२) ।" उपपुराण भी पुराणों के समय के ही हैं। वे भी आर्ष हैं और प्रामाणिक हैं। पुराणों में उपपुराणों की भी चर्चा है। अतः विष्णुधर्मोत्तर का काल पांचवीं शती न होकर व्यास का काल ही उसका काल है। भारतीय धर्मग्रन्थ परस्पर एक दूसरे से संबद्ध ही हैं। इसलिए अल्पश्रुत के लिए शास्त्रों का अभिप्राय दुरूह ही रहता है। इतिहास, पुराण और उपपुराण का अध्ययन करते समय उनके समन्वय से ही तात्पर्यार्थ निर्धारित होता है। चतुर्व्यूह नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में राम आदि का अवतार ठीक ही है। जिनको ईश्वर एवं उसके अवतार में विश्वास नहीं है, जो राम का अवतार नहीं मानते हैं एवं जिन्होंने यह निर्णय कर रखा है कि राम की भक्ति और उनके अवतारत्व की कल्पना अर्वाचीन है, उनकी दृष्टि में जिन ग्रन्थों में अवतार-सामग्री उपलब्ध हो वे ग्रन्थ ही अर्वाचीन प्रतीत होंगे, परन्तु उक्त धारणा ठीक नहीं है, यह कहा जा चुका है। नृसिंहपुराण १६५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "यह चौथी या पाँचवीं शती ई० का है। इसमें छः अध्याय (४७ से ५२ तक) मिलते हैं जिनमें वाल्मीकिरामायण के प्रथम छः काण्डों की कथा का किंचित्-परिवर्तन के साथ वर्णन है। अवतारवाद को अधिक महत्त्व दिये जाने के कारण राम नारायण के पूर्णावतार तथा लक्ष्मण शेष के अवतार बताये

२७६ रामायणमीमांसा अष्टम गये हैं। अहल्या अपने पति के शाप से पाषाणभूता कही गयी है। सीता के स्वयंवर के बाद अन्य क्षत्रिय राजाओं का राम पर आक्रमण करने का वर्णन है। सीताहरण का ऐसा रूप प्रस्तुत किया गया है जिसमें रावण सीता का स्पर्श नहीं करता। रावण-वध के पश्चात् राम के यज्ञों तथा स्वर्गारोहण का वर्णन है। इसमें सीता-त्याग का वृत्तान्त नहीं है।" काल-निर्णय यहाँ भी अशुद्ध ही है। गो० तुलसीदास ने भी स्वयंवर के बाद दुर्वृत्त राजाओं के राम पर आक्रमण के इरादे का वर्णन किया है, परन्तु परशुराम के आ जाने से वे ठण्डे पड़ गये थे । वह्निपुराण १६६ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "इसकी सन् १६४६ ई० की एक हस्तलिपि लन्दन में सुरक्षित है। उसमें एक अत्यन्त विस्तृत रामकथा है, जिसमें बालकाण्ड से युद्धकाण्ड तक समस्त रामायण की कथा का वर्णन है । आरम्भ में उसमें रामावतार तथा सीता हरण का कारण भृगुशाप बताया गया है। रावण ओर कुम्भकर्ण को जन्मकथा, मधु और कैटभ एवं हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का उल्लेख है। हनुमान् का मूषिका के रूप में लङ्काप्रवेश कहा गया है।" लन्दन की हस्तलिपि का इतना ही अर्थ है कि वह १६वीं शती से पहले का है। परन्तु उसका निर्माणकाल वही है यह उससे सिद्ध नहीं हो सकता है । १६७वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "शैवपुराण तथा स्कन्दपुराण को छोड़कर उपर्युक्त पुराणों और उपपुराणों की रामकथाओं में साम्प्रदायिकता का प्रभाव कम पड़ा है। अन्य शैव और शाक्त उपपुराणों में साम्प्रदायिकता की गहरी छाप है। उनमें राम शिव अथवा देवी के भक्त रूप में दिखाये गये हैं।" यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि राम परब्रह्म होते हुए भी मर्त्यशिक्षण की दृष्टि से मर्यादापुरुषोत्तम हैं। अतः जैसे वर्णाश्रमी शिव एवं भगवती के भक्त होते हैं वैसे ही राम भी शिव, देवी आदि देवताओं के भक्त थे। इसमें साम्प्रदायिकता की कोई बात नहीं है। वाल्मीकिरामायण से भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि राम के पिता दशरथ तथा राम और उनके सभी पूर्वज वैदिक थे। मर्यादाओं तथा यज्ञ, याग आदि के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा थी। अनादि अविच्छिन्न ज्ञान, भक्ति तथा कर्म की परम्परा ही सम्प्रदाय है। साम्प्रदायिक होने के कारण ही "तुल्यं साम्प्रदायिकम्" (जै० सू० १।२।८) में भी मन्त्र के तुल्य ही ब्राह्मणभाग को वेद कहा गया है। अतः वैदिक भी साम्प्रदायिक ही होते हैं। परन्तु आजकल तो दुर्भाग्यवश फिरकापरस्ती अर्थ में सम्प्रदायशब्द का प्रयोग होने लगा है। बुल्के शिवपुराण को १४वीं शती का मानते हैं। इस सबका आधार डा० हाजरा का निर्णय ही है जो कथमपि प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है। शिवपुराण की शतरुद्रसंहिता के सृष्टिखण्ड में नारदमोह की कथा तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में है। सतीखण्ड में सती द्वारा राम की परीक्षा वर्णित है। राम सती से कहते हैं कि शङ्कर की आज्ञा से मैंने अवतार लिया है (अध्याय २४-२६)। युद्धखण्ड में वृन्दा का शाप (अध्याय २३) तथा शतरुद्रसंहिता (अध्याय २०) में शिवजी के वीर्य से हनुमान् का जन्म वर्णित है। आधुनिक विवेचकों द्वारा इस संहिता का रचना-काल १४वीं शती माना जाता है। इसका भी कोई आधार नहीं है। तुलसीदासजी ने इसी के आधार पर नारदमोह, सतीमोह आदि का वर्णन किया है। वे इन पुराणों को परम प्रमाण मानते थे। उमासंहिता (अध्याय ३) में राम द्वारा शिवपूजा तथा वरप्राप्ति का वर्णन है। गणपति कृष्णजी प्रेस के शिवपुराण-संस्करण में धर्मसंहिता (अध्याय १३, १४) में संक्षिप्त रामकथा उद्धृत है। ज्ञानसंहिता (अध्याय ३०) में वनवास के समय सीता द्वारा दशरथ के लिए पिण्डदान का वर्णन है और

अध्याय अवतार-सामग्री २७७ (अध्याय ५७) में सागर को पार करने के लिए राम द्वारा सहायता के लिए शिव की प्रार्थना की गयी है। शिवपुराणोक्त रामसम्बन्धी आख्यान भी राम के परमेश्वरत्व और मर्यादापुरुषोत्तमत्व का ही पोषक है। १६८ अनु० में बुल्के कहते हैं, "श्रीमद्देवीभागवतपुराण के नवरात्रमाहात्म्य में वर्णित रामकथा के अनुसार राम ने शूर्पणखा को विरूप किया। शेष कथा रामायणीय कथा से मिलती जुलती है। इसमें सीताहरण के बाद नारद के उपदेश से राम रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए नवरात्रोपवास करते हैं। इसके अन्त में सिंहासनारूढा देवी भगवती राम को दर्शन देकर रावण पर विजय का आश्वासन देती हैं। अनन्तर राम विजया-पूजा कर वानरसेना के साथ समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं (देवीभा० ३।२८-३०)। नवें स्कन्ध में वेदवती-वृत्तान्त तथा छायासीता की कथा भी मिलती है।" बुल्के इन प्रामाणिक आदरणीय सभी धर्मग्रन्थों को अपनी कल्पना के आधार पर मिथ्या सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। पर सभी प्रामाणिक ऋषि एवं उनके ग्रन्थ एक स्वर से राम को ब्रह्म और मर्यादापुरुषोत्तम ही प्रमाणित करते हैं। गुणोपसंहारन्याय से वाल्मीकिरामायण या अन्य ग्रन्थों में अनुक्त होने पर प्रामाणिक ग्रन्थों की कथाओं को मिलाकर ही रामकथा की पूर्णता का निर्णय किया जाता है। इस तरह मर्यादापुरुषोत्तम राम के द्वारा शिवपूजा और देवीपूजा, सूर्यपूजा आदि सभी सम्भव हैं, क्योंकि अपने आचरण से मनुष्यों को धर्म, कर्म, व्यवहार आदि की शिक्षा देना ही राम के अवतार का मुख्य उद्देश्य है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५ ) १६९ अनु० में बुल्के कहते हैं, "हाजरा के अनुसार महाभागवतपुराण गुजराती प्रिंटिंग प्रेस बम्बई सन् १९१३ के संस्करण का निर्माण ११वीं शती ई० के लगभग पूर्व बङ्गाल में अथवा कामरूप में हुआ था। इसमें एक रामोपाख्यान मिलता है, जिसकी कथावस्तु रामायण से बहुत भिन्न है। इसके अनुसार देवता रावण का वध करने के लिए विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं। विष्णु उनसे कहते हैं जब तक देवी लङ्का में निवास करती हैं, मैं रावण को पराजित नहीं कर सकता। अनन्तर सब मिलकर कैलाश पर्वत पर देवी के पास जाते हैं। देवी सीताहरण के कारण लङ्का छोड़ देने की प्रतिज्ञा करती हैं तथा शिव हनुमान् का रूप धारण कर राम की सहायता करने का वचन देते हैं। अन्त में राम देवी से अमोघ अस्त्र ग्रहण कर रावण को मारने में समर्थ होते हैं (अ० ४७, ६६)। ब्रह्मा भी राम की विजय के लिए देवी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते हैं। इस वृत्तान्त में सीता मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न मानी गयी हैं (अ० ४२।६४)। इस पुराण में अन्यत्र माया सीता का हरण तथा नारदशाप दोनों का उल्लेख है (अध्याय ११।१०७-११२) ।” हाजरा महाभागवतपुराण की कथावस्तु वर्णन के आधार पर ही ११वीं शती का अनुमान करते हैं। उनके पास और कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यह भी देवीभागवत का ही परिवर्तित रूप है। लोकोत्तर माहात्म्य तो प्रसिद्ध ही है। देवी की कृपा से राम रावण को मारने में समर्थ हैं, यह उनके मर्यादापुरुषोत्तम रूप के अनुरूप ही है। राम की ब्रह्मरूपता इस पुराण से भी सिद्ध ही है। १७० वें अनु० में बुल्के के अनुसार "बृहद्धर्मपुराण १३वीं शती ई० के महाभागवतपुराण की कथा से बहुत भिन्न नहीं है। उसमें सीताहरण का वृत्तान्त नृसिंहपुराण की कथा से मिलता-जुलता है। तथा हनुमान् विडालका का रूप धारण कर लङ्का में प्रवेश करते हैं (दे० पूर्वखण्ड अ० १८-२२)। रामकथा के वर्णन के बाद रामायणोत्पत्ति का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें श्लोकोत्पत्ति आदि के बाद रामायण के उत्कर्ष-वर्णन के प्रसङ्ग में रामायण के महाभारत तथा पुराणों का बीज होने का उल्लेख है (पू० ख० अध्याय २५-३०) ।" यह भी १३ वीं शती की रचना है। यह कल्पना पूर्ववत् निराधार ही है। आर्ष सभी पुराण ऋषिकाल के ही हैं। रामायण आदिकाव्य है। अन्य

महाभारत, पुराण आदि का वही बीज है, यह सिद्धान्त ठीक ही है। भारतीय अन्य साहित्यों से भी यही सिद्ध है। कालिदास, हर्षवर्धन आदि भी यही मानते हैं। बौद्ध अश्वघोष भी वाल्मीकि की कृति को अपूर्व मानते हैं। १७१ वें अनु० में सौरपुराण का रचना-काल सन् ९५०-१०५० ई० बताया गया है। प्रायः काल-निर्णय सबका अशुद्ध है। इसमें सूर्य-वंश वर्णन के प्रसङ्ग से जो रामकथा है उसमें राम को महादेवपरायण कहा गया है। शङ्कर के प्रसादस्वरूप राम अपने पद को प्राप्त करते हैं। जनक ने गौरी को सन्तुष्ट करके सीता को प्राप्त किया था (अध्याय ३०)। सौरपुराण भी सनातनधर्ममान्य उपपुराण है। इसका वृत्त-वर्णन भी युक्त ही है। १७२ वें अनु० में कालिकापुराण को भी ११ वीं शती का कहा गया है; जो सर्वथा अशुद्ध है। इसमें ब्रह्मा द्वारा राम की विजय के लिए दुर्गा की पूजा का उल्लेख (अध्याय ६२।२०-३८) एवं ३८ वें अध्याय में जनक के हल जोतते समय सीता को तथा अन्य पुत्रों को प्राप्त करने की कथा वर्णित है। इनकी कथाओं से भी रामायण की कथा का समर्थन होता है। १७३ अनु० में बुल्के कहते हैं दो अर्वाचीन पुराणों में रामकथा की सामग्री मिलती है। वस्तुतः बुल्के की दृष्टि में सभी पुराण अर्वाचीन ही हैं। वैदिक सनातनसिद्धान्तनिष्ठों के अनुसार तथावर्णित सभी ग्रन्थों की दृष्टि से बुल्के और उनके मान्य हाजरा का मत सर्वथा अमान्य है। हाँ, आदिपुराण में वसुदेव-विवाह से यमलार्जुन कथातक कृष्ण-चरित वर्णित है। नन्ददृष्ट स्वप्न वर्णन नामक १६वें अध्याय में संक्षिप्त रामकथा के अतिरिक्त इसका भी उल्लेख है कि नन्द ने पूर्वजन्म में भक्तिपूर्वक भगवान् से प्रार्थना की थी जिसके फलस्वरूप रामावतार में तथा कृष्णावतार में उनको भगवान् के पिता होने का वरदान प्राप्त हुआ था। आदिपुराण का रामचरित वाल्मीकिरामायण के अनुसार है। यहाँ कनकमुग को देखकर राम स्वयं कहते हैं कि अवश्य ही कोई मायावी राक्षस है। वस्तुतः अन्य पुराणों की भाँति यह भी रामायणीय रामकथा का पोषक है। कल्किपुराण की संक्षिप्त रामकथा (अंश ३।६।२६-५८) की यह विशेषता है कि इसमें राम-सीता के पूर्वानुराग की झलक मिलती है तथा सीता ने अशोकवन में रुक्मिणीव्रत किया था जिसके फलस्वरूप वह राम से पुनः मिल सकीं (३।१७।४०)। बुल्के को इसमें आश्चर्य प्रतीत हो सकता है। परन्तु पुराणों के सिद्धान्तानुसार कृष्ण तथा राम का बराबर विभिन्न कल्पों में अवतार होता रहता है। तदनुसार इस वाराह कल्प के पहले सारस्वत कल्प में भी कृष्ण का अवतार हुआ था, अतः २४वें त्रेता में रामायण के राम की सीता रुक्मिणी-व्रत करे तो इसमें विरोध की कोई बात नहीं है। कल्किपुराण को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह भी आर्ष है। पुराणों के लक्षण तथा उनके नाम और संख्या तथा उनकी श्लोक-संख्या भी पुराणों में मिलती है। पुराणों में ही उपपुराण तथा औपपुराणों का भी वर्णन है। उससे उनका भी आर्षत्व और प्रमाणत्व सिद्ध होता है। अतः उनके अनुसार हाजरा या अन्य विद्वानों की तत्सम्बन्धी काल-कल्पना सर्वथा अप्रमाण ही है। जैसा कि कूर्मपुराण में कहा गया है— सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं पाद्मं वैष्णवमेव च। शैवं भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम् ॥ मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च। लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च ॥

अध्याय अवतार-सामग्री २७९ कौर्मं मात्स्यं गारुडञ्च वायवीयमनन्तरम् । अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् ॥ अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु । अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः ॥ आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम् । तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥ चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम् । दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदीयमतः परम् ॥ कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् । ब्रह्माण्डं वारुणं चैव कालिकाद्वयमेव च ॥ माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसञ्चयम् । पराशरोक्तं मारीचं तथैव भार्गवाह्वयम् ॥ ( कू० पु० पूर्वार्ध १।१२-२० ) सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित ये पाँच लक्षण जिसमें हों वही पञ्चलक्षण पुराण है । इस सूची में ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, भविष्य, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, ब्रह्मवैवर्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुड़ और ब्रह्माण्ड ये १८ पुराण वर्णित है । सनत्कुमार, नारसिंह, स्कान्द, ( यह पूर्वोक्त स्कान्द से भिन्न है ), शिवधर्म, दुर्वासाप्रोक्त आश्चर्यपुराण, नारदीय ( यह भी पूर्वोक्त से अन्य है ), कापिल, मानव, औशनस, ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब और पराशरोक्त मारीचपुराण तथा भार्गव ये उपपुराण भी आर्ष हैं । अतः इनको आधुनिक कहना सर्वथा असङ्गत है । धर्मकल्पद्रुम में ज्ञानानन्दजी ने अष्टादश औपपुराणों ( जो पुराणों एवं उपपुराणों से पृथक् हैं ) की चर्चा की है और बृहद्विवेकग्रन्थ में इनका निरूपण बताया है । ब्रह्माण्डविवेक के तीसरे अध्याय में भी औपपुराणों की चर्चा है । वहाँ के श्लोक उद्धृत किये जा रहे हैं— आद्यं सनत्कुमारं च नारदीयं बृहच्च यत् । आदित्यं मानवं प्रोक्तं नन्दिकेश्वरमेव च ॥ कौर्मं भागवतं ज्ञेयं वासिष्ठं भार्गवं तथा । मुद्गलं कल्किदेव्यौ च महाभागवतं ततः ॥ बृहद्धर्मं परानन्दं वह्नि पशुपतिं तथा । हरिवंशं ततो ज्ञेयमिदमौपपुराणकम् ॥ उन पुराणों के श्लोकों की संख्या भी निम्नोक्त है । स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे-- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ब्राह्मं पुराणं तत्राद्यं संहितानां विभूषितम् । श्लोकानां दशासाहस्रं नानापुण्यकथायुतम् !। ( १ ब्रह्मपुराण में १०००० श्लोक )

२८० रामायणमीमांसा अष्टम पाद्मं च पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणि निगद्यते । ( २ पाद्म में ५५००० श्लोक ) तृतीयं वैष्णवं नाम त्रयोविंशतिसंख्यया । ( ३ वैष्णव में २३००० श्लोक ) चतुर्थं वायुना प्रोक्तं वायवीयमिति स्मृतम् । शिवभक्तिसमायोगाच्छैवं तच्चापराख्यया ॥ चतुर्विंशतिसंख्यातं सहस्राणि तु शौनक । ( ४ वायुपुराण में २४००० श्लोक ) चतुर्भिः पर्वभिः प्रोक्तं भविष्यं पञ्चमं तथा । चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च ॥ ( ५ भविष्य १४५०० श्लोक ) मार्कण्डं नवसाहस्रं षष्ठं तत्परिकीर्तितम् ॥ ( ६ठा मार्कण्डेय ९००० श्लोक ) आग्नेयं सप्तमं प्रोक्तं सहस्राणि तु षोडश । ( ७वां आग्नेय १६००० श्लोक ) अष्टमं नारदीयं तु प्रोक्तं वै पञ्चविंशतिः । ( ८ वां नारदीय २५००० श्लोक ) नवमं भागवतं नाम भागद्वयविभूषितम् । तत्राष्टादश साहस्रं प्रोच्यते ग्रन्थसंख्यया । ( ९वां भागवत १८००० श्लोक ) दशमं ब्रह्मवैवर्तं तावत्संख्यमिहोच्यते । ( १०वां ब्रह्मवैवर्त १८००० श्लोक ) लैङ्गमेकादशं ज्ञेयं तथैकादशसंख्यया । भागद्वयविरचितं तल्लिङ्गमृषिपुङ्गव ॥ ( ११ वां लैङ्ग ११००० श्लोक ) चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं द्वादशं विदुः ॥ ( १२ वां वाराह २४००० श्लोकं ) विभक्तं सप्तभिः खण्डैः स्कान्दं भाग्यवतांवर । तदेकाशीतिसाहस्रं संख्यया वै निरूपितम् ॥ ( १३ वां स्कान्द ८१००० श्लोक ) ततस्तु वामनं नाम चतुर्दशतमं स्मृतम् । संख्यया दशासाहस्रं प्रोक्तं कुलपते पुरा ॥ ( १४ वां वामन पुराण १०००० श्लोक ) कौर्मं पञ्चदशं प्राहुर्भागद्वयविभूषितम् । दशसप्तसहस्राणि पुरा संख्यायते कलौ ॥ ( १५ वां कौर्म १७००० श्लोक ) मात्स्यं मत्स्येन यत्प्रोक्तं मनवे षोडशं क्रमात् । तच्चतुर्दशसाहस्रं संख्यया वदतांवर ॥ ( १६ वां मत्स्य १४००० श्लोक ) गारुडं सप्तदशमं स्मृतं चैकोनविंशतिः । ( १७ वां गारुड १९००० श्लोक ) अष्टादशं तु ब्रह्माण्डं भागद्वयविभूषितम् । तच्च द्वादशसाहस्रं शतमष्टसमन्वितम् ॥ ( १८ वां ब्रह्माण्ड १२८०० श्लोक ) यहाँ पुराणों को ब्रह्मप्रोक्त कहा गया है । इदं ब्रह्मपुराणस्य सुलभं सौरमुत्तमम् । संहिंताद्वयसंयुक्तं पुण्यं शिवकथाश्रयम् ॥ आद्या सनत्कुमारोक्ता द्वितीया सूर्यभाषिता । सनत्कुमारनाम्ना हि तद्विख्यातं महामुने ॥ द्वितीयं नारसिंहं च पुराणे पाद्मसंज्ञिते । शौनकेयं हि तृतीयं पुराणे वैष्णवे मतम् ॥ बार्हस्पत्यं चतुर्थं च वायव्यं सम्मतं सदा । दौर्वाससं पञ्चमं च स्मृतं भागवते सदा ॥

भविष्ये नारदोक्तं च सूरिभिः कथितं पुरा । कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् ॥ ब्रह्माण्डं वारुणं चाथ कालिकाद्वयमेव च । माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसञ्चयम् ॥ पराशरं भागवतं कौर्मं चाष्टादशं क्रमात् । एतान्युपपुराणानि मयोक्तानि यथाक्रमम् ॥ ( स्कन्दपुराण रेवाखण्ड उत्तरार्ध १ ) “पुराणमेकमेवासीत् सर्वकालेषु मानद । चतुर्वर्गस्य बीजं च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ॥ हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥ तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ अस्त्येव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च वायवीयं तथैव च ॥ भागवतं नारदीयं मार्कण्डेयं च कीर्तितम् । आग्नेयं च भविष्यं च ब्रह्मवैवर्तलिङ्गके ॥ वाराहं च तथा स्कान्दं वामनं कूर्मसंज्ञकम् । मात्स्यं च गारुडं तद्वद् ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट् ॥” ( बृह० ना० पु० पूर्वभाग ९२।२२-२८ ) ऊपर के वचनों में कहा गया है कि चतुर्वर्ग का बीज शतकोटिप्रविस्तर पुराण पहले एक ही था । उसी से सब शास्त्रों की प्रवृत्ति हुई है । युगह्रास से सामान्य मेधावाले पुरुषों के लिए उनका ग्रहण करना असंभव जानकर भगवान् हरि व्यासरूप में प्रकट होकर प्रति द्वापर में चतुर्लक्ष श्लोकात्मक १८ पुराणों को भूलोक में प्रकट करते हैं । देवलोक में अब भी पुराण शतकोटिप्रविस्तर ही है । उसका सार ही १८ पुराणों में वर्णित है । “ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते । तृतीयं वैष्णवं चैव चतुर्थं शैवमुच्यते ॥ अथ भागवतं प्रोक्तं पञ्चमं षष्ठमुच्यते । भविष्यं नारदीयं च सप्तमं परिकीर्तितम् ॥ मार्कण्डेयमिति प्रोक्तमष्टमं नवमं तथा । आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं दशमं परिकीर्तितम् ॥ लैङ्गं च वामनं चैव स्कान्दं मात्स्यमथैव च । कौर्मं वाराहमुदितं गारुडं वाथ कीर्तितम् ॥ ब्रह्माण्डमित्यष्टादश पुराणानि विदुर्बुधाः ।

तथा चोपपुराणानि कथयिष्याम्यतः परम् ।। आद्यं सनत्कुमाराख्यं नारसिंहमतः परम् । तृतीयमाण्डमुद्दिष्टं दौर्वासमेव च ।। नारदीयमथान्यच्च कापिलं मानवं तथा । तद्वदौशनसं प्रोक्तं ब्रह्माण्डं च ततः परम् ।। वारुणं कौलिकाव्हानं माहेशं साम्बमेव च । सौरं पाराशरं चैव मारीचं भार्गवाह्वयम् ।। कौमारं च पुराणानि कीर्तितान्यष्ट वै दश ।” ( पद्मपु० पातालखण्ड ११५।८९-९७ ) ऊपर के श्लोकों में पुराणों के क्रम दिये गये हैं। कल्पभेद से क्रम में भेद भी हो जाता है, अतः श्रीमद्भागवत के अनुसार श्रीभागवत १८वां पुराण है। परन्तु ऊपर भागवत को पाँचवाँ कहा गया है। “अष्टादश पुराणानि यो वेत्ति हरिरेव हि ।। सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।। ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा । भविष्यं नारदीयं च स्कान्दं लैङ्गं वराहकम् ।। मार्कण्डेयं तथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च । कौमं मात्स्यं गारुडञ्च वायवीयमनन्तरम् ।। अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् । अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु । आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमथापरम् ।। तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् । चतुर्थं शिवधर्माख्यं स्यान्नन्दीश्वरभाषितम् ।। दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदोक्तमतः परम् । कापिलं वामनं चैव तथैवोशनसेरितम् ।। ब्रह्माण्डं वारुणञ्चाथ कालिकाव्हयमेव च । माहेश्वरं तथा साम्बमेवं सर्वार्थसञ्चयम् ।। पराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम् ।” ( ग० पु० २१५।१३-२१ ) उपर्युक्त वचनों में भी पुराणों और उपपुराणों की गणना की गयी है। ऐसे ही अन्य पुराणों में भी पुराणों की गणना की गयी है । कहीं कहीं नामों और पुराणत्व, उपपुराणत्व आदि में परिलक्षित भेद कल्पभेद से समाहित होते हैं। इसी तरह देवीभागवत में भी पुराणों का वर्णन है। शृण्वन्तु संप्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः । यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात् सत्यवतीसुतात् ॥ मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् । अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक् ॥

ध्याय अवतार-सामग्री २८३ चतुर्दशसहस्रं च मात्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम् । तथा ग्रहसहस्रंतु मार्कण्डेयं महाद्भुतम् ॥ चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४ ॥ अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल । तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्राह्मसंज्ञकम् ॥ द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम् । तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥ अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च । चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक ॥ त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम् । चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम् ॥ षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम् ॥ ९

तस्माद्भूतं भविष्यच्च वर्तमानमपि द्विजाः। वदन्ति सूक्ष्मं शास्त्राणि तेषु शङ्कां न कारयेत् ॥ (का० के० मा० १५।९-१०) काशीकेदारमाहात्म्य में कहा गया है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी युगों के अनुसार अनादि हैं, भगवान् के श्वासस्वरूप हैं। कभी वे मलिन कभी विशद होते हैं और वे भगवान् की प्रपञ्च-लीला का वर्णन करते हैं। उनमें भूत, भविष्य तथा वर्तमान का वर्णन होता है, अतः उनमें शङ्का नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य पुराणों और उपपुराणों में भी पुराणों तथा उपपुराणों के नाम एवं उनकी श्लोकसंख्या तथा कहीं कहीं अनुक्रमणिका भी निर्दिष्ट है। इससे पुराणों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। यदि कोई पुराण किसी आधुनिक वञ्चक द्वारा रचित होता तो अन्य पुराणों में उसका उल्लेख कैसे होता ? सभी को वञ्चक कहना तो किसी वञ्चक के लिए ही सम्भव है। प्रमाणरूप से आदृत इन अनेक ग्रन्थों में विभक्त अष्टलक्षाधिक श्लोकों का निर्माण करनेवाले लोग निर्माता के रूप में नाम न देते यह सर्वथा असम्भव ही है। अतः पाश्चात्यों तथा उनके अनुयायी भारतीयों की पुराणसम्बन्धी कालकल्पना सर्वथा अप्रामाणिक ही है। योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण को बुल्के १७४ वें अनुच्छेद में साम्प्रदायिक रामायण कहते हैं। इनका भी रचनाकाल एम्. विंटरनित्स तथा एस. एन्. दास गुप्ता ८वीं शती मानते हैं। डाक्टर वी. राघवन् ११वीं शती इनका रचनाकाल मानते हैं। यह कम से कम योगवासिष्ठ के तो सर्वथा विरुद्ध ही हैं। जिस ग्रन्थ के काल का विचार किया जाय यदि उसके कथन की उपेक्षा कर मनमाने ढङ्ग से काल का निर्णय किया जाने लगे तो किसी भी ग्रन्थ का मनमाना काल निर्धारित किया जा सकता है। योगवासिष्ठ के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ही उक्त ग्रन्थ के रचयिता हैं। ऐसी स्थिति में जो काल उन महर्षि का है वही योगवासिष्ठ का भी काल है। विंटरनित्स के अनुसार योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य के अनुयायियों की कृति है। भीखनलाल आत्रेय के अनुसार ७वीं से ८वीं शती में उसकी उत्पत्ति हुई है। भर्तृहरि के वाक्यपदीय के एवं योगवासिष्ठ के कुछ श्लोक परस्पर मिलते जुलते हैं। भर्तृहरि का काल ७वीं शती माना जाता है। इस दृष्टि से भी कम से कम ई० सन् ६०० योगवासिष्ठ का रचनाकाल है। परन्तु यह सब वस्तुतः पाश्चात्य प्रभाव हैं। पाश्चात्य लोग संसार भर के सभी ग्रन्थों को हजार पन्द्रह सौ वर्ष के भीतर लाने का प्रयास करते हैं। योगवासिष्ठ के टीकाकार आनन्दबोधेन्द्रसरस्वती तथा अन्वयारण्य आत्मसुख, गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती आदि भी १६वीं शती के आसपास के हैं। मुकुन्द्यति के शिष्य रामवनस्वामी की व्याख्या योगवासिष्ठ पर है, वे १४वीं शती से पहले के हैं। उनकी रामार्चनचन्द्रिका का उल्लेख निर्णयसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थों में किया गया है। मधुसूदनसरस्वती १६वीं शती के आचार्य हैं। उनके सिद्धान्तबिन्दु तथा संक्षेपशारीरकव्याख्या में तथा गीताव्याख्या में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण है। गीता के ६-३२ तथा ३६वें श्लोकों की व्याख्या में योगवा- सिष्ठ के बहुत श्लोकों का उल्लेख हुआ है। 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की टीका में “वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु रुसिष्ठ- पराशरादिभिर्बहुधा गीतम् ।” श्रीधरस्वामो ने गीता की सुबोधिनी टीका में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण किया है। काश्मीरी विद्वान् गौड़ अभिनन्दी ने, जो ९वीं शती के थे, योगवासिष्ठसार नाम का ग्रन्थ लिखा है। आद्य श्रीशङ्कराचार्य ने श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्य में लिखा है— “तथा च—वासिष्ठयोगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम् । तथात्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥” इत्यादि चार श्लोक उन्होंने उद्धृत किये हैं। सनत्सुजातीयभाष्य में भी १।१५ से आद्यशङ्कराचार्य कहते हैं—“तथा चाह भगवान् वसिष्ठः—

अध्याय अवतार-सामग्री २८५ चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति । वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥” ३१ वें श्लोक में “तथा चाह भगवान् वासिष्ठः— यन्न सन्तं न चासन्तम् ॥” श्वेताश्वतर उपनिषद् शङ्कराचार्य का प्रधान ग्रन्थ है। शङ्करदिग्विजय में माधवाचार्य ने कहा है— “सन्तत्सुजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ॥” विवेकचूडामणि, लघुवाक्यादि में भी योगवासिष्ठ के भाव हैं । भारतीय परम्परा के अनुसार आद्यशङ्करा- चार्य का काल विक्रम से कई शती पूर्व है । फिर योगवासिष्ठ उनसे भी पहले का है ही । इसके अनुसार वसिष्ठ रामचन्द्र को मोक्षप्राप्ति पर विस्तृत उपदेश करते हैं । इस संवाद को वाल्मीकि अरिष्टनेमि को सुनाते हैं । अगस्त्य ने उसी का उपदेश सुतीक्ष्ण के लिए दिया है । योगवासिष्ठ में भी राम विष्णु के अवतार बताये गये हैं । वस्तुतः रामायण में वेद के पूर्वकाण्ड का ही उपबृंहण हं । वेद के उत्तरकाण्ड वेदशीर्ष वेदान्त का उपबृंहण योगवासिष्ठ या महारामायण में किया गया है। मर्यादापुरुषोत्तम राम ने जैसे वेद के पूर्वकाण्ड का स्वयं आचरण कर आदर्श उपस्थित करके लोकशिक्षा दी उसी तरह तीर्थयात्रा, परमवैराग्य एवं उत्तम मुमुक्षा से युक्त होकर उत्तम जिज्ञासु हो गुरुपसदनपूर्वक वेदान्तों के श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तत्त्वसाक्षात्कार के सम्पादन का भी आदर्श उपस्थित कर लोकशिक्षा दी थी । इसी प्रकार अध्यात्मरामायण को भी साम्प्रदायिक एवं आधुनिक कहना वास्तविकता का अपलाप है, यह पीछे कहा जा चुका है। अध्यात्मरामायण और श्रीमद्भागवत ये दोनों ग्रन्थ रामचरितमानस के प्रमुख आधार हैं। अध्यात्मरामायण में राम को परब्रह्म, सीता को लक्ष्मी तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। उसमें राम को विष्णु का अवतार भागवत का अनुकरण कर नहीं कहा गया है, किन्तु जन्म-समय में राम ने कौशल्या को विष्णुरूप में जो दर्शन दिया था उस वस्तुस्थिति के अनुसार ही कहा गया है। अहिल्योद्धार के अनन्तर केवट का वृत्तान्त दिया गया है। यौवराज्य अभिषेक के पूर्व राम-नारद-संवाद तथा मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश बताया गया है। रामनाम- महिमा के वर्णन प्रसङ्ग में वाल्मीकि की आत्मकथा, मायामयी सीता के हरण का वृत्तान्त, लक्ष्मण का द्वादशवर्ष तक उपवास, सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, कालनेमि का वृत्तान्त, रावण का शुक्र के परामर्श से यज्ञानुष्ठान करना और अङ्गद के द्वारा उसका भङ्ग किया जाना, रावण की नाभि में अमृत का होना, भगवत्पदप्राप्ति के उद्देश्य से रावण के द्वारा सीताहरण आदि इसकी विशेष कथाएँ हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में राम के माधुर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। भक्ति-सिद्धान्त में माधुर्य- प्रधान रूप का बड़ा महत्त्व है। उसमें लौकिक रूप का ही अधिकांश प्राकट्य होता है। रागानुगा स्वारसिकी प्रीति होती है । ऐश्वर्यप्रधान रूप में वह भक्ति नहीं हो पाती । एक माता अपने बालक में स्वाभाविक जितना स्नेह या प्यार कर सकती है उतना ईश्वर में नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐश्वर्य में भय, संकोच आदि के कारण उद्दाम ममता और स्नेह नहीं बन पाता । यदि यशोदा कृष्ण को ब्रह्म या परमेश्वर समझती तो मृत्तिका-भक्षण के प्रसङ्ग से कृष्ण को उलूखल में बाँधने की हिम्मत कदापि नहीं कर सकती । इसी लिए मृद्भक्षण के प्रसङ्ग में मैंने मिट्टी नहीं खायी । ग्वालबाल सब मिथ्या बोलते हैं। तुझे विश्वास नहीं है तो मेरा मुंह देख ले, कृष्ण के यह कहने पर जब यशोदा ने मुख खोलने को कहा, तब श्रीकृष्ण ने माँ के भय से मुँह खोल दिया । उसके भीतर सूर्य, चन्द्र, भूधर, सागर आदि सारे विश्व को देखकर उसने निश्चय कर लिया कि यह तो साक्षात् परब्रह्म है। यह मेरा पुत्र है, मैं माँ हूँ यह कल्पना मोहमूलक है। भगवान् ने फिर से अपनी मोहनी वैष्णवी माया फैलाकर माता यशोदा के ज्ञान को आवृत कर दिया,

२८६ रामायणमीमांसा अष्टम क्योंकि ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप में तादृक् स्नेहसम्बन्ध नहीं बन सकता था । अतः वाल्मीकिरामायण में लौकिक स्वरूप का आधिक्येन वर्णन है, ऐश्वर्य का अल्प वर्णन है । किन्तु अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान मार्गीय भक्ति का ही वर्णन है । माधुर्य में ही ऐश्वर्य के वर्णन के बिना कोई लौकिकता का भान होने से प्राकृत साधारणता आ सकती है । अतः वाल्मीकिरामायण में भी तत्र-तत्र स्थलों में ईश्वरता का वर्णन है । सनातन सिद्धान्त के अनुसार गुणोपसंहार- न्याय से साङ्गोपाङ्ग रामचरित जानने के लिए सभी रामायणों, महाभारत, पुराणों, उपनिषदों संहिताओं तथा आगमों का समन्वय ही मान्य है । अद्भुतरामायण के सम्बन्ध में अनु० १७६ में बुल्के का कहना है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि अद्भुत- रामायण या अद्भुतोत्तरकाण्ड की रचना अध्यात्मरामायण के कुछ काल बाद हुई ।” इस तरह उनकी दृष्टि में वह अत्यन्त अर्वाचीन है, परन्तु यह ठीक नहीं है । उलटे यही कहा जा सकता है कि अद्भुतरामायण में अध्यात्मरामायण के अंशों का उल्लेख होने से शिवपार्वतीसंवादरूप अध्यात्मरामायण अति प्राचीन है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण के ही दोनों अंश हैं। अन्यथा ऋषिव्यतिरिक्त कोई लेखक वाल्मीकि और भरद्वाज के संवाद को कैसे जान सकता है ? सर्ग १ में नारद एवं पर्वत के द्वारा विष्णु को दिये जानेवाले शाप के कारण रामरूप में विष्णु के अवतार का ज्ञान भी अर्वाचीन समाधिशून्य को कैसे हो सकता था । अम्बरीष की पुत्री श्रीमती का शापवशात् जानकी बनकर रावण द्वारा अपहृत होना (सर्ग २-४), नारद के शाप से लक्ष्मी का सीतारूप में मन्दोदरी की पुत्री बनना आदि सबको काल्पनिक एवं मिथ्या ही मानना पड़ेगा क्या ? किन्तु कोई भी भारतीय सभ्य विद्वान् निराधार निरर्थक मिथ्या प्रलाप करना उचित नहीं समझता; अतः अद्भुतरामायण भी महर्षि वाल्मीकि के आर्षविज्ञान के आधार पर ही निर्मित है । सहस्रमुख रावण का वध (सर्ग १७-२७) देवीमाहात्म्य का अनुकरण नहीं है, किन्तु घटनामूलक है। सत्य घटना में तो उक्त रामायण ही प्रमाण है । परन्तु उक्त घटना के अभाव में बुल्के के पास कुछ भी प्रमाण नहीं है। क्योंकि अतीत विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती । अतीत से सम्बन्धित कोई लिङ्ग गृहीत नहीं है, अतः अनुमान की प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । १७७वें अनु० में आनन्दरामायण के सम्बन्ध में भी बुल्के का यह कहना कि इसकी रचना १५वीं शती ई० की है, सङ्गत नहीं है। आनन्दरामायण के विषय वाल्मीकिरामायण से कुछ भिन्न हों यह उसकी मौलिकता का ही साधक है । दशरथ और कौशल्या का विवाह तथा रावण द्वारा कौशल्या का हरण, देवदानव-युद्ध में कैकेयी की वरप्राप्ति, श्रवणकुमार का वध, दशरथयज्ञ तथा कैकेयी के पायस का काक द्वारा अपहरण और उसका अञ्जनी के पर्वत पर फेंका जाना ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण की विशिष्ट कथाएँ—बाललीला वर्णन ( सर्ग २ ), अहिल्योद्धार तथा तदनन्तर नाविकवृत्तान्त ( सर्ग ३।२४-२८ ) ये दोनों वृत्तान्त अध्यात्मरामायण के तुल्य हों यह ठीक है, परन्तु ये उसी के अंश के उद्धरण हैं, यह नहीं कहा जा सकता है। सीतास्वयंवर में रावण की उपस्थिति ( सर्ग ३ ), अग्निजा सीता की जन्मकथा ( ३।१८८ आदि ), वृन्दा का शाप, कलहा और धर्मदत्त का कैकेयी तथा दशरथ के रूप में जन्म लेना ( सर्ग ४ ), सीताहरण के बाद सीता का रूप धारण कर उमा का रामपरीक्षा करना ( सर्ग ७ ), रावण का शिव से आत्मलिङ्ग तथा पार्वती को प्राप्त करने तथा दोनों को खो बैठने की कथा ( सर्ग ९ ), मैरावण का राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाना, हनुमान् द्वारा राम और लक्ष्मण को वापस लाना ( सर्ग ११ ), सुलोचना की कथा ( सर्ग १।१२०५ आदि ) एवं आत्ममुक्ति के उद्देश्य से रावण द्वारा सीताहरण करने का उल्लेख ( सर्ग १३। ११९ आदि ) । यात्राकाण्ड में वाल्मीकिरामायण की उत्पत्ति ( सर्ग १।२-१२ ) तथा वाल्मीकि द्वारा शतकोटि- प्रविस्तर रामायण की रचना का उल्लेख ( सर्ग १, २) । इसके बाद चारों दिशाओं में राम की तीर्थयात्रा का वर्णन मिलता है । पूर्वोक्त सभी विषय रामचरित्र के ही अनिवार्य अङ्ग हैं। यागकाण्ड में राम के अश्वमेध का वर्णन है । विलासकाण्ड में शङ्करकृत रघुवीर-स्तव ( सर्ग १ ), सीता का नख-शिखवर्णन, सीतालङ्कार, जलक्रीड़ा तथा सीता-

अध्याय अवतार-सामग्री २८७ राम की दिनचर्या (सर्ग २-६)। एकपत्नीव्रत के कारण कृष्णावतार में बहुत पत्नियों की प्राप्ति का राम को वरदान (सर्ग ७।१-२८)। कामपीड़ित देवपत्नियों को राम द्वारा गोपिकाएँ बनने का आश्वासन (सर्ग ७।२९ आदि), कृष्णावतार में गुणवती तथा पिंगला को सत्यभामा तथा कुब्जा बनने का आश्वासन देना वर्णित है (सर्ग ८)। इसी में सीता-सहित राम की कुरुक्षेत्र यात्रा का वर्णन है (सर्ग ९)। जन्मकाण्ड में राम द्वारा सीता-त्याग (सर्ग १-३), कुशजन्म तथा वाल्मीकि द्वारा लव की सृष्टि (सर्ग ४)। कुश और लव का राम की सेना से युद्ध करना, सीता की शपथ से पृथ्वी का प्रकट होना तथा राम से भयभीत होकर सीता को लौटा देना। उर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति के दो दो पुत्रों का होना वर्णित है (सर्ग ६-९)। विवाहकाण्ड में राम आदि के आठों पुत्रों के विवाह वर्णित हैं। राज्यकाण्ड में राम के राज्य-शासन का विस्तृत वर्णन है। इसमें रामका स्वरूप-सौन्दर्य देखकर बहुत सी नारियाँ मोहित हुई हैं। कृष्णावतार में उनकी लालसा-पूर्ति का आश्वासन दिया गया है। इसे कृष्णावतार का प्रभाव कहना निष्प्रमाण कल्पनामात्र है। कृष्णोपनिषत् से ही राम का लोकोत्तर सौन्दर्य प्रसिद्ध है। उसके अनुसार स्त्रियों की कौन कहे ऋषि-महर्षि लोग भी उनके सौन्दर्य से मोहित हुए हैं और उन्हें भी गोपी बनने का भगवान् ने वरदान दिया है। मनोहरकाण्ड में रामोपासना का विधान वर्णित है। पूर्णकाण्ड में सोमवंशी राजाओं से युद्ध तथा सन्धि, कुश का अभिषेक और रामादि का वैकुण्ठा- रोहण वर्णित है। इस तरह यह रामायण भी रामचरित के वर्णन में पर्यवसित है। यह भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अङ्ग एवं प्रामाणिक है। 🕮

नवम अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव और महत्त्व का वर्णन भारतीय राजाओं का स्वरूप, स्वभाव एवं महत्त्व का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने कहा है— “सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् । यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् । यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥” ( रघुवं० १।५-८ ) जन्मप्रभृति निषेकादि संस्कारों से शुद्ध तथा फलसिद्धिपर्यन्त कर्म करनेवाले, समुद्रपर्यन्त भूमि के एकमात्र स्वामी अर्थात् सार्वभौम, स्वर्ग तक रथ से यात्रा करनेवाले अर्थात् इन्द्र के सहचारी, विधिवत् अग्निहोत्र करनेवाले, कामना के अनुसार याचकों का आदरपूर्वक मनोरथ पूर्ण करनेवाले, अपराध के अनुसार दण्डविधान करनेवाले, समय पर जागनेवाले, त्याग के लिए अर्थसंग्रह करनेवाले, सत्य के लिए मित भाषण करनेवाले, यश के लिए विजय की इच्छावाले, सन्तति के लिए दारसंग्रह करनेवाले, बालकपन में विद्याभ्यास करनेवाले, युवावस्था में भोग की इच्छा- वाले, वृद्धावस्था में मुनिवृत्तिवाले और अन्त में योग से शरीर-त्याग करनेवाले रघुवंशी राजा होते थे । “आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः । आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥” ( रघुवं० १।१५ ) महाराज दिलीप की आकार के सदृश बुद्धि थी, बुद्धि के समान ही शास्त्र का परिश्रम था, शास्त्र के समान ही कर्म और कर्म के समान ही फल होता था । “प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥” ( रघुवं० १।१८ ) महाराज दिलीप प्रजा की वृद्धि के लिए ही प्रजा से कर ग्रहण करते थे । भगवान् भास्कर हजारों गुना वर्षा करने के लिए ही गर्मी में जल का शोषण करते हैं । महाराज दिलीप स्वयं ही बलवान् थे— “सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् । शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिमौर्वी धनुषि चातता ॥” ( रघुवं० १।१९ ) सेना उनकी छत्र, चामर के समान उपकरणमात्र थी । शास्त्रों में अकुण्ठित बुद्धि और धनुष पर चढ़ी हुई डोरी ये ही दो उनके कार्यसाधक थे ।

अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २८९ “तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च। फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव ॥” ( रघुवं० १।२० ) महाराज दिलीप का मन्त्र गुप्त रहता था और आकार तथा चेष्टा भी गुप्त रहती थी, इसलिए उनके द्वारा प्रयुक्त साम आदि उपायों का पता फल होने पर ही लगता था । जैसे कि फलों के द्वारा ही पूर्वजन्म के संस्कारों का पता लगता है । “जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः । अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥” ( रघुवं० १।२१ ) महाराज दिलीप अपनी रक्षा करते थे, किन्तु उन्हें डर नहीं था, बिना विपत्ति के ही धर्म का पालन करते थे । अर्थसंग्रह करते हुए भी लोभी नहीं थे । सुख भोगते थे, किन्तु उसमें आसक्ति नहीं थी । “ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः । गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ॥” ( रघुवं० १।२२ ) महाराज दिलीप दूसरे की बात जानते हुए भी मौन रहते थे । प्रतीकार की सामर्थ्य रहने पर भी दूसरे का अपकार सहते थे । दान करके अपनी प्रशंसा नहीं करते थे । इस तरह परस्पर विरोधी भी गुण उनमें ऐसे एक साथ रहते थे जैसे कि सभी सहोदर हों । प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि । स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ॥” ( रघुवं० १।२४ ) सन्मार्ग में लगाने, विपत्ति दूर करने और अन्न, पान आदि द्वारा पोषण करने से प्रजाओं के मुख्य पिता महाराज दिलीप ही थे । उनके अपने पिता केवल जन्ममात्र देनेवाले थे । इस प्रकार राजा लोकस्थिति बनाये रखने के लिए ही दण्ड्यों को दण्ड देता था । सन्तानोत्पत्ति के लिए ही विवाह करता था । इस तरह दण्ड और विवाह जो कि अर्थ एवं काम के साधन थे वे भी लोकस्थिति और प्रजोत्पादन के लिए ही थे, सुतरां उनका पर्यवसान भी धर्म में हो गया था । अर्थात् उनके अर्थ और काम भी धर्मरूप ही थे— “स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यान् परिणेतुः प्रसूतये । तस्यार्थकामावप्यास्तां धर्म एव मनीषिणः ॥” ( रघुवं० १।२५ ) “दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् । सम्पद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥” ( रघुवं० १।२६ ) महाराज दिलीप यज्ञ करने के लिए पृथ्वी से कर ग्रहण करते थे और देवराज इन्द्र धान्यवृद्धि के लिए वर्षा करते थे । इस तरह दोनों परस्पर आदान-प्रदान से दोनों लोकों का धारण ( पोषण ) करते थे । “न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षिणो यशः । व्यावॄत्ता यत्परस्वेभ्यः श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥” ( रघुवं० १।२७ ) अन्य राजाओं के लिए प्रजा-रक्षण में चौकस राजा दिलीप के यश का अनुकरण असम्भव था, क्योंकि उनके राज्य में परस्वापहरण से सभी के डरने के कारण तस्करता ( चोरी ) पराये धन से हटकर शब्दरूप से कान में ही रह गयी थी । '३७

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२९० रामायणमीमांसा नवम द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्त्तस्य यथौषधम् । त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥" ( रघुवं० १।२८ ) शिष्ट जन (सज्जन) द्वेषी होने पर भी महाराज दिलीप को प्रिय था जैसे रोगी को औषध प्रिय होता है । यदि अपना प्रिय भी दुष्ट होता तो महाराज दिलीप को वैसे ही त्याज्य होता जैसे सर्पदष्ट अङ्गुलि । "स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् । अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव ॥" ( रघुवं० १।३० ) समुद्र का तट जिसकी चहार दीवारी और समुद्र ही जिसकी खाई है उस अखण्ड भूमण्डल के एकमात्र शासक महाराज दिलीप अखण्डभूमण्डल का शासन ऐसे अनायास करते थे जैसे कि एक नगरी का शासन हो । "पुरुषायुषजीविन्यो निरातङ्का निरीतयः । यन्मदीयाः प्रजास्तस्य हेतुस्त्वद्ब्रह्मवर्चसम् ॥" ( रघुवं० १।६३ ) मेरी प्रजा अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियों से रहित होकर निर्भय रह कर पुरुषायुष पर्यन्त जीवित रहती है उसका एकमात्र कारण आपका ब्रह्मतेज है । श्रीकालिदास के अनुसार ब्राह्मबल एवं क्षात्रबल के प्रभाव से राजा रघु की जल, स्थल, पर्वत और आकाश सर्वत्र अव्याहत गति थी । "वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात् प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु । मरुत्सखस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने नहि तद्रथस्य ॥" ( रघुवं० ५।२७ ) जैसे वायु की सहायता से मेघ की सर्वत्र अव्याहत गति होती है वैसे ही वसिष्ठजी के मन्त्र के प्रभाव से महाराज रघु के रथ की गति समुद्र, आकाश तथा पर्वत सर्वत्र ही अव्याहत थी । आजकल के संशयित विमानों की अपेक्षा श्रीरघु का रथ कहीं अधिक शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण था । अध्यात्मवाद पर आधारित धर्मनियन्त्रित शासन- तन्त्र का सञ्चालक सम्राट् दिलीप गुरु के आज्ञानुसार काया की छाया बनकर नन्दनी गौ की सेवा में तत्पर हो गया । एतावता गौ तथा ब्राह्मण की सेवापरायणता ऐसे शासकों का स्वाभाविक धर्म था । "स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः । जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥" ( रघुवं० २।६ ) महाराज दिलीप नन्दिनी गौ जब खड़ी होती थी तब खड़े हो जाते थे, जब चलती थी तब चलते थे, जब बैठती थी तब बैठते थे, जब वह जल पीती थी तब जल पीते थे इस तरह छाया के समान उसका अनुसरण कर रहे थे । "आस्वादवद्भिः कवलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च । अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥ ( रघुवं २।५ ) सम्राट् महाराज दिलीप स्वादिष्ट तृणों के कवलों, कण्डूयनों, दंशों के निवारणों और अव्याहत स्वच्छन्द- गमनों के द्वारा नन्दिनी गौ की आराधना में लगे थे । प्रचण्ड शौर्य के साथ ही दयालुता भी उनमें अनिवार्यरूप से विद्यमान थी । "धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तःकरणैरविशङ्कैः । विलोकयन्त्यो वपुषापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥" ( रघुवं० २।११ )

अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २९१ महाराज दिलीप को धनुर्धर देखते हुए भी हरिणियों के मन में आशङ्का नहीं हुई । इसी लिए समझना चाहिये कि उनका हृदय दया से भरपूर था । दयार्द्र महाराज दिलीप का शरीर देखते हुए हरिणियों ने अपनी आँखों के विस्तार का फल प्राप्त किया । प्रजा के ऊपर आये हुए भौतिक एवं आधिदैविक सङ्कटों को भी धर्मनिष्ठ राजा अपने प्रभाव से दूर कर सकता है । आज हजारों लौकिक प्रयत्नों से भी अन्नसङ्कट नहीं कट रहा है, काम होने पर भी धार्मिकता के बिना बरकत या समृद्धि नहीं हो रही है, परन्तु महाराज दिलीप के आगमनमात्र से वन के सब सङ्कट दूर हो गये थे । “शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥” ( रघुवं० २।१४ ) महाराज दिलीप के वन में प्रवेश करते ही वृष्टि के बिना भी जंगल में लगी हुई अग्नि शान्त हो गयी । जंगल में फलों और पुष्पों की विशेष वृद्धि हो गयी । जानवरों में बलवान् जन्तुओं ने दुर्बलों को सताना छोड़ दिया । यह सब सेना, पुलिस या कोर्ट का प्रभाव नहीं, किन्तु धर्मनिष्ठा का ही लोकोत्तर प्रभाव था । धर्मनियन्त्रित शासक दिलीप धर्मपालन के सामने राज्य एवं प्राणों को भी तुच्छ समझते थे । “क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥” ( रघुवं० २।३५ ) क्षत ( विनाश ) से रक्षा करने ( बचाने ) के कारण क्षत्रिय जाति का वाचक क्षत्रशब्द विश्वविख्यात है । इसके विपरीत यदि हम एक नन्दिनी गौ को न बचा सके तो राज्य से ही हमारा क्या लाभ ? अथवा निन्दा से मलिन प्राणों को ढोने से ही क्या फल ? अर्थात् धर्मविमुख निन्दित पुरुष का सब कुछ व्यर्थ है । धर्मनियन्त्रित शासक धर्म के प्रभाव से न केवल स्थूल शरीर पर ही शासन करता है, अपितु मनपर भी नियन्त्रण करके प्रजा के मन को बुरे कामों से निवृत्त करता है; अपराध रोकने के लिए दण्ड-विधान ही नहीं, किन्तु शासक की विशेष शक्ति भी अपेक्षित होती है । “अकार्यचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् । अन्तःशरीरेष्वपि यः प्रजानां प्रत्यादिदेशाविनयं विनेता ॥” ( रघुवं० ६।३९ ) महाराज कार्तवीर्य असत्कार्य का विचार प्रजा में आते ही धनुष-बाण धारण कर उनके सामने प्रकट हो जाते थे । इस तरह से उन्होंने प्रजा के मन से भी अपराधसृष्टि रोक दी थी । धर्म एवं योग के बल से वह प्रजा के मन के दुर्विचारों को जान लेते थे और तत्काल योगबल से ही प्रकट होकर आतंकित करके बुरे विचारों को रोक देते थे । इस तरह शरीर से अपराध की बात कौन कहे मन से भी पाप करने में प्रजा सदः ही डरती रहती थी । “यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्धपथे गतानाम् । वातोऽपि नासंस्रयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम् ॥” ( रघुवं० ६।७५ ) महाराज दिलीप के शासनकाल में उद्यान में घूमने के लिए गयी हुई मत्ताङ्गनाओं के उद्यान में सो जाने पर उनके देहपर से कपड़ा हटा देने की क्षमता वायु में भी नहीं थी । फिर, दूषित वृत्ति से चोरी करने के लिए कोई हाथ कैसे बढ़ा सकता था ? आज की चोरी, डकैती तथा अनुशासनहीनता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ।

२९२ रामायणमीमांसा नवम सीता-वनवास से क्षुब्ध महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं :— “उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि । त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे ॥' (रघुवं० १४।७३) यद्यपि राम ने रावण को मारकर सबके के मार्ग का काँटा दूर किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। सबका उपकार करके भी अपनी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं। इतने गुणगण राम में विद्यमान होने से वे मुझे प्रिय होने चाहिए तथापि तुम्हारे साथ उन्होंने अकस्मात् ऐसा व्यवहार किया है इसलिए हमारी नाराजगी उनपर है ही। अर्थात् सीता के साथ उन्होंने वनवास देकर अन्याय क्यों किया ? यद्यपि यह भी आपात दृष्टि से ही अन्याय प्रतीत होता है। वस्तुतः भगवान् राम तो कभी शत्रु का भी अहित नहीं कर सकते थे 'अरिहुँक अनभल कीन न रामा'' फिर अपनी ही प्राणेश्वरी सीता का अहित कैसे कर सकते थे ? धर्मनियन्त्रित शासकों पर सर्वदा धर्मनिष्ठ महर्षियों का नियन्त्रण रहता था। इसी लिए वसिष्ठ, वाल्मीकि महर्षि भगवान् राम के गुणों और दोषों का विचार कर गुणों की प्रशंसा एवं यत्किञ्चित् दोषों से भी अवगत रहते थे।

नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम

वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को मात्र राम ही जानते थे, अन्य कोई नहीं । यथा— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोऊ न राम सम जान जथारथ ॥” (रा० मा० २५।३।३) भगवती सीता के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थ सामञ्जस्य हुआ है। नीति, लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गति-विधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई भतीजों के स्वार्थ वश, शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नही ठुकरा सकता, इस दृष्टि से शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित मानी जाती है। धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं । राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था— “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥” स्नेह, दया, सुख आदि किं बहुना मेरी हृदयेश्वरी जनकनन्दिनी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागना पड़ेगा तो भी मुझे व्यथा न होगी । आत्मा या आत्मीयों के स्वार्थवश नासमझ शासक जनता की भावनाओं की उपेक्षा करते हुए अर्थदण्ड अथवा कारागार-दण्ड का विधान करते हैं। अस्त्र-शस्त्र एवं तोप-बन्दूक आदि के बल पर जनता का मुख बन्द करने का असफल प्रयत्न करते हैं, परन्तु समझदार शासक जानता है कि मात्र दण्डविधान से जनता का मुंह बन्द नहीं किया जा सकता और यदि जबरदस्ती मुंह बन्द करने का प्रयत्न किया भी गया तो फिर हजारों हजारों मुखों से ही विरोधी आवाजें निकलेंगी । अपनी दुर्नीति बदलने से ही जनता का मुंह बन्द किया जा सकता है। दण्ड- भय से नहीं । यद्यपि श्रीजनकनन्दिनी महाराज्ञी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था; कुछ ही लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख लिया। इस प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियां भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा अवश्य ही भङ्ग हो

अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९३ जायगी। उनको यह नहीं विदित था कि श्रीसीता अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी, आनन्दसिन्धु रामचन्द्र के माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति थीं। उन्होंने लङ्का का अन्न-जल-फल ग्रहण किये बिना ही, इन्द्रप्रदत्त विशिष्ट चरु को एक ही बार ग्रहण कर, लङ्का में काल यापन किया था। वे भानु की प्रभा, चन्द्र की चन्द्रिका एवं गङ्गा की पवित्रता के तुल्य आनन्दसिन्धु भगवान् राम की माधुर्यसार-सर्वस्वरूपा ही थीं। पुनश्च देवताओं, ऋषियों, वानरों एवं राक्षसों के सामने श्रीसीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया और सबके समक्ष साक्षात् वैश्वानर अग्नि ने उनके पावित्र्य को प्रमाणित किया था। श्रीब्रह्मा एवं श्रीशिव ने उनके पावित्र्य को परिपुष्ट किया था, तथापि उसका वर्णन श्रीराम के पक्ष की ओर से होने में शासकीय प्रचारमात्र समझा जा सकता था। अतः श्रीराम ने बहुमत। नहीं, वरन् अल्पमत का भी आदर करते हुए श्रीसीता को अरण्यवास दिया और निष्पक्ष वीतराग महर्षियों को अवसर दिया कि वे दूध का दूध और पानी का पानी के समान अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रजा के सम्मुख सत्य वस्तुस्थिति रखें, और हुआ भी ऐसा ही। जिस वन में सीता को निर्वासित किया था वहीं कुछ दूर पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। उनके कुछ ब्रह्मचारी छात्र समिधा, कुश आदि लेने के प्रसङ्ग से उधर पहुँच गये और उन्होंने ही उस अलौकिक दिव्य महाशक्ति के दर्शन एवं रोदन की सूचना महर्षि को दी। महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि ने अपने ध्यानयोग से वस्तुस्थिति को समझ कर सीता से कहा- "पुत्रि ! तुम्हारे पिता जनक मेरे मित्र हैं, तुम्हारे श्वसुर चक्रवर्ती दशरथ भी मेरे शिष्य थे, अतः पितृगृहसुलभ मेरे आश्रम में चलकर रहो।" श्रीसीता महर्षि के पीछे पीछे चलकर आश्रम में आयीं, महर्षि ने आश्रम की ऋषि-पत्नियों को, उनकी देख-रेख, रक्षण-पोषण आदि के लिए नियुक्त किया। वहीं उनके लव और कुश नामक दो पुत्ररत्नों का जन्म हुआ, जिनका संस्कार, शिक्षण-रक्षण सब महर्षियों की ही देख-रेख में हुआ। धर्मधुरन्धर चक्रवर्ती नरेन्द्र राघवेन्द्र रामचन्द्र द्वारा निर्वासिता सीता को अपने आश्रम में प्रश्रय देते हुए ही महर्षि ने अपने उत्तरदायित्व को खूब समझ लिया था और उस मिथ्याभिशाप को समूलोन्मूलन कर देने के लिए वे कृतसंकल्प थे। विश्वविधाता ब्रह्मा भी यह सब महर्षि वाल्मीकि के द्वारा ही कराना चाहते थे। तमसा के तटपर विहरणपरायण क्रौञ्च-युग्म में से एक क्रौञ्च के व्याध द्वारा मारे जाने पर क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर महान् क्लेशानुभूति करनेवाले महर्षि के सामने सीता के करुण-क्रन्दन का दृश्य आ गया। पहले से ही करुणरस पूरित वाल्मीकि का हृदय इस दृश्य से आहत होकर छलक पड़ा और वही शोक करुणरस श्लोक बन महर्षि के मुखारविन्द से विश्वकल्याण के लिए प्रस्फुटित हो आया। "शोकः श्लोकत्वमागतः ।" (वा० रा० १।१।४०) शोक श्लोक बन गया। श्लोक था- "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” (वा० रा० १।२।१५) भरद्वाज आदि शिष्यों ने आदि काव्य के इस प्रथम श्लोक को सुनकर धारण कर लिया। यह श्लोक, लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा की इच्छा से, ब्राह्मी महाशक्ति सरस्वती की कृपा से व्यक्त हुआ था। श्लोक के ऊपरी अर्थ में तो निषाद (व्याध) के लिए एक प्रकार का शाप ही है, यथा- हे निषाद ! तुम पुरुषापुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा न प्राप्त कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्च-युग्म में से एक को मार दिया है, परन्तु अन्तरङ्ग अर्थ यह कि रावण- मन्दोदरीरूप युग्म ही वे क्रौञ्च-युग्म थे। रामरूप लक्ष्मीपति ने ही रावण को मारा था। इस दृष्टि से यह श्लोक आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण ही है यथा-

२९४ रामायणमीमांसा नवम 'हे मानिषाद मायां लक्ष्म्यां निषीदतीति मानिषादस्तत्सम्बुद्धो हे मानिषाद लक्ष्मीपते ! तुम शाश्वतीः समाः अनन्त काल तक प्रतिष्ठित रहो, क्योंकि तुमने रावण-मन्दोदरी रूप युगल के एक रावण को मारकर वेद, धर्म, संस्कृति सब का ही रक्षण किया है।" अस्तु, महर्षि के हृदय में उक्त दृश्य के कारण नितान्त क्षोभ था ही आश्रम में लौट आने पर भी वे उसी चिन्ता में निमग्न थे कि इतने में ही लोकपितामह ब्रह्माजी आश्रम में पधारे । महर्षि ने पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क से उनका पूजन किया और फिर रामवियुक्ता सीता के चिन्तन में ही निमग्न हो गये । ब्रह्मा ने बतलाया कि मेरी ही प्रेरणा से आदि काव्य रामायण का यह प्रथम श्लोक आप के मुख से प्रगट हुआ है । आप समाधि द्वारा राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, दशरथ, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा आदि सभी के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर इसी प्रकार के श्लोकों द्वारा राम-सीता के परम पवित्र चरित्रों का वर्णन करो । मेरे प्रसाद से तुम्हारे इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत न होगी— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” इस प्रकार ब्रह्मा की प्रेरणा से महर्षि ने समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण सीता एवं राम के चरित्र का पूर्ण एवं यथार्थ अनुभव कर दिव्य श्लोकों में शतकोटिप्रविस्तर रामायण का वर्णन किया । वह वर्णन निःसंकोच एवं परम सत्य था । संवाददाताओं एवं टेलीप्रिंटरों द्वारा भेजी गयी अथवा आँखों देखी घटनाओं में भी भ्रान्ति हो सकती है, परन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा तो सर्वथा ऋत (सत्य) का ही दर्शन होता है । और जगह तो काव्य सोष्ठव आदि की दृष्टि से कुछ औपचारिक बातें भी लायी जाती हैं, परन्तु यहाँ तो सीता-चरित्र-वर्णन की दृष्टि से शुद्ध सत्य का वर्णन अपेक्षित था । महर्षि ने, सीता-पुत्र लव और कुश का यथावत् संस्कार किया और वेदों; धनुर्वेद, गान्धर्ववेद आदि उपवेदों का भी साङ्गोपाङ्ग उन्हें शिक्षण दिया । तत्पश्चात् वेदों के उपबृंहण के लिए ही रामायण का अध्यापन किया और तन्त्री ( वीणा ) के तालस्वर के साथ संगीतरूप में रामायण का अभ्यास कराया । वे दोनों ही बालक दीप से उद्भूत दो दीपों के समान ही सर्वथा श्रीराम के ही अनुरूप थे । सीता-राममय दिव्य दम्पती की दिव्य दीप्ति एवं प्रभाव से युक्त थे । अश्विनीकुमारद्वय से भी अत्यधिक सुन्दर वे दोनों बालक जब स्वरसम्पदा से युक्त वीणा-वादन-पूर्वक रामायण का गायन करते थे तो सभी मोहित हो जाते थे । अनेक बार उनका रामायण गान सुनकर ऋषिगण मन्त्रमुग्ध हो जाते थे एवं प्रेमविह्वल होकर कोई ऋषि अपना कमण्डलु, कोई मेखला, कोई वृषी आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे । श्रीराम के अश्वमेधयज्ञ में निमन्त्रित होकर महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि एवं उनके सब आश्रम- वासी नैमिषारण्य पधारे हुए थे । महर्षि दोनों बालकों ( लव और कुश ) को फल-मूलभोजन कराकर कुछ साथ के लिए भी दे देते थे और कहते कि जाकर अवधवासियों को रामायण सुनाओ और भूख लगने पर अपना ही फल खाना, प्यास लगने पर अपने आप ही नदी या कूप से जल निकालकर पीना एवं किसी के कुछ देने पर भी लेना नहीं । परन्तु जो श्रद्धा से सुने उसे रामायण सुनाना । महर्षि के आदेशानुसार दोनों बालकों ने अयोध्याकाण्ड का ही प्रसङ्ग अवधवासियों को सुनाना प्रारम्भ किया : जो भी इस प्रसङ्ग को सुनता मन्त्रमुग्ध हो जाता । आखों देखी पुरानी घटनाओं का प्रत्यक्ष चित्र उनके सामने उपस्थित हो जाता था । कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्रचित्रण । उसे सुनकर सबको आश्चर्य होता था । लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे कुछ लेते न थे । यह समाचार राम-दरबार में भी गया । वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक चरित्र-चित्रण के श्रवण द्वारा रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीता-पुत्रों ने ऋषिकुमार के रूप में, वहाँ भी अपने स्वर,