रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २८९ “तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च। फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव ॥” ( रघुवं० १।२० ) महाराज दिलीप का मन्त्र गुप्त रहता था और आकार तथा चेष्टा भी गुप्त रहती थी, इसलिए उनके द्वारा प्रयुक्त साम आदि उपायों का पता फल होने पर ही लगता था । जैसे कि फलों के द्वारा ही पूर्वजन्म के संस्कारों का पता लगता है । “जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः । अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥” ( रघुवं० १।२१ ) महाराज दिलीप अपनी रक्षा करते थे, किन्तु उन्हें डर नहीं था, बिना विपत्ति के ही धर्म का पालन करते थे । अर्थसंग्रह करते हुए भी लोभी नहीं थे । सुख भोगते थे, किन्तु उसमें आसक्ति नहीं थी । “ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः । गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ॥” ( रघुवं० १।२२ ) महाराज दिलीप दूसरे की बात जानते हुए भी मौन रहते थे । प्रतीकार की सामर्थ्य रहने पर भी दूसरे का अपकार सहते थे । दान करके अपनी प्रशंसा नहीं करते थे । इस तरह परस्पर विरोधी भी गुण उनमें ऐसे एक साथ रहते थे जैसे कि सभी सहोदर हों । प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि । स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ॥” ( रघुवं० १।२४ ) सन्मार्ग में लगाने, विपत्ति दूर करने और अन्न, पान आदि द्वारा पोषण करने से प्रजाओं के मुख्य पिता महाराज दिलीप ही थे । उनके अपने पिता केवल जन्ममात्र देनेवाले थे । इस प्रकार राजा लोकस्थिति बनाये रखने के लिए ही दण्ड्यों को दण्ड देता था । सन्तानोत्पत्ति के लिए ही विवाह करता था । इस तरह दण्ड और विवाह जो कि अर्थ एवं काम के साधन थे वे भी लोकस्थिति और प्रजोत्पादन के लिए ही थे, सुतरां उनका पर्यवसान भी धर्म में हो गया था । अर्थात् उनके अर्थ और काम भी धर्मरूप ही थे— “स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यान् परिणेतुः प्रसूतये । तस्यार्थकामावप्यास्तां धर्म एव मनीषिणः ॥” ( रघुवं० १।२५ ) “दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् । सम्पद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥” ( रघुवं० १।२६ ) महाराज दिलीप यज्ञ करने के लिए पृथ्वी से कर ग्रहण करते थे और देवराज इन्द्र धान्यवृद्धि के लिए वर्षा करते थे । इस तरह दोनों परस्पर आदान-प्रदान से दोनों लोकों का धारण ( पोषण ) करते थे । “न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षिणो यशः । व्यावॄत्ता यत्परस्वेभ्यः श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥” ( रघुवं० १।२७ ) अन्य राजाओं के लिए प्रजा-रक्षण में चौकस राजा दिलीप के यश का अनुकरण असम्भव था, क्योंकि उनके राज्य में परस्वापहरण से सभी के डरने के कारण तस्करता ( चोरी ) पराये धन से हटकर शब्दरूप से कान में ही रह गयी थी । '३७