भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 365, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 365

नवम अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव और महत्त्व का वर्णन भारतीय राजाओं का स्वरूप, स्वभाव एवं महत्त्व का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने कहा है— “सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् । यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् । यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥” ( रघुवं० १।५-८ ) जन्मप्रभृति निषेकादि संस्कारों से शुद्ध तथा फलसिद्धिपर्यन्त कर्म करनेवाले, समुद्रपर्यन्त भूमि के एकमात्र स्वामी अर्थात् सार्वभौम, स्वर्ग तक रथ से यात्रा करनेवाले अर्थात् इन्द्र के सहचारी, विधिवत् अग्निहोत्र करनेवाले, कामना के अनुसार याचकों का आदरपूर्वक मनोरथ पूर्ण करनेवाले, अपराध के अनुसार दण्डविधान करनेवाले, समय पर जागनेवाले, त्याग के लिए अर्थसंग्रह करनेवाले, सत्य के लिए मित भाषण करनेवाले, यश के लिए विजय की इच्छावाले, सन्तति के लिए दारसंग्रह करनेवाले, बालकपन में विद्याभ्यास करनेवाले, युवावस्था में भोग की इच्छा- वाले, वृद्धावस्था में मुनिवृत्तिवाले और अन्त में योग से शरीर-त्याग करनेवाले रघुवंशी राजा होते थे । “आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः । आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥” ( रघुवं० १।१५ ) महाराज दिलीप की आकार के सदृश बुद्धि थी, बुद्धि के समान ही शास्त्र का परिश्रम था, शास्त्र के समान ही कर्म और कर्म के समान ही फल होता था । “प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥” ( रघुवं० १।१८ ) महाराज दिलीप प्रजा की वृद्धि के लिए ही प्रजा से कर ग्रहण करते थे । भगवान् भास्कर हजारों गुना वर्षा करने के लिए ही गर्मी में जल का शोषण करते हैं । महाराज दिलीप स्वयं ही बलवान् थे— “सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् । शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिमौर्वी धनुषि चातता ॥” ( रघुवं० १।१९ ) सेना उनकी छत्र, चामर के समान उपकरणमात्र थी । शास्त्रों में अकुण्ठित बुद्धि और धनुष पर चढ़ी हुई डोरी ये ही दो उनके कार्यसाधक थे ।

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