भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 367

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२९० रामायणमीमांसा नवम द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्त्तस्य यथौषधम् । त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥" ( रघुवं० १।२८ ) शिष्ट जन (सज्जन) द्वेषी होने पर भी महाराज दिलीप को प्रिय था जैसे रोगी को औषध प्रिय होता है । यदि अपना प्रिय भी दुष्ट होता तो महाराज दिलीप को वैसे ही त्याज्य होता जैसे सर्पदष्ट अङ्गुलि । "स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् । अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव ॥" ( रघुवं० १।३० ) समुद्र का तट जिसकी चहार दीवारी और समुद्र ही जिसकी खाई है उस अखण्ड भूमण्डल के एकमात्र शासक महाराज दिलीप अखण्डभूमण्डल का शासन ऐसे अनायास करते थे जैसे कि एक नगरी का शासन हो । "पुरुषायुषजीविन्यो निरातङ्का निरीतयः । यन्मदीयाः प्रजास्तस्य हेतुस्त्वद्ब्रह्मवर्चसम् ॥" ( रघुवं० १।६३ ) मेरी प्रजा अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियों से रहित होकर निर्भय रह कर पुरुषायुष पर्यन्त जीवित रहती है उसका एकमात्र कारण आपका ब्रह्मतेज है । श्रीकालिदास के अनुसार ब्राह्मबल एवं क्षात्रबल के प्रभाव से राजा रघु की जल, स्थल, पर्वत और आकाश सर्वत्र अव्याहत गति थी । "वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात् प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु । मरुत्सखस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने नहि तद्रथस्य ॥" ( रघुवं० ५।२७ ) जैसे वायु की सहायता से मेघ की सर्वत्र अव्याहत गति होती है वैसे ही वसिष्ठजी के मन्त्र के प्रभाव से महाराज रघु के रथ की गति समुद्र, आकाश तथा पर्वत सर्वत्र ही अव्याहत थी । आजकल के संशयित विमानों की अपेक्षा श्रीरघु का रथ कहीं अधिक शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण था । अध्यात्मवाद पर आधारित धर्मनियन्त्रित शासन- तन्त्र का सञ्चालक सम्राट् दिलीप गुरु के आज्ञानुसार काया की छाया बनकर नन्दनी गौ की सेवा में तत्पर हो गया । एतावता गौ तथा ब्राह्मण की सेवापरायणता ऐसे शासकों का स्वाभाविक धर्म था । "स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः । जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥" ( रघुवं० २।६ ) महाराज दिलीप नन्दिनी गौ जब खड़ी होती थी तब खड़े हो जाते थे, जब चलती थी तब चलते थे, जब बैठती थी तब बैठते थे, जब वह जल पीती थी तब जल पीते थे इस तरह छाया के समान उसका अनुसरण कर रहे थे । "आस्वादवद्भिः कवलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च । अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥ ( रघुवं २।५ ) सम्राट् महाराज दिलीप स्वादिष्ट तृणों के कवलों, कण्डूयनों, दंशों के निवारणों और अव्याहत स्वच्छन्द- गमनों के द्वारा नन्दिनी गौ की आराधना में लगे थे । प्रचण्ड शौर्य के साथ ही दयालुता भी उनमें अनिवार्यरूप से विद्यमान थी । "धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तःकरणैरविशङ्कैः । विलोकयन्त्यो वपुषापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥" ( रघुवं० २।११ )