भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 368

अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २९१ महाराज दिलीप को धनुर्धर देखते हुए भी हरिणियों के मन में आशङ्का नहीं हुई । इसी लिए समझना चाहिये कि उनका हृदय दया से भरपूर था । दयार्द्र महाराज दिलीप का शरीर देखते हुए हरिणियों ने अपनी आँखों के विस्तार का फल प्राप्त किया । प्रजा के ऊपर आये हुए भौतिक एवं आधिदैविक सङ्कटों को भी धर्मनिष्ठ राजा अपने प्रभाव से दूर कर सकता है । आज हजारों लौकिक प्रयत्नों से भी अन्नसङ्कट नहीं कट रहा है, काम होने पर भी धार्मिकता के बिना बरकत या समृद्धि नहीं हो रही है, परन्तु महाराज दिलीप के आगमनमात्र से वन के सब सङ्कट दूर हो गये थे । “शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥” ( रघुवं० २।१४ ) महाराज दिलीप के वन में प्रवेश करते ही वृष्टि के बिना भी जंगल में लगी हुई अग्नि शान्त हो गयी । जंगल में फलों और पुष्पों की विशेष वृद्धि हो गयी । जानवरों में बलवान् जन्तुओं ने दुर्बलों को सताना छोड़ दिया । यह सब सेना, पुलिस या कोर्ट का प्रभाव नहीं, किन्तु धर्मनिष्ठा का ही लोकोत्तर प्रभाव था । धर्मनियन्त्रित शासक दिलीप धर्मपालन के सामने राज्य एवं प्राणों को भी तुच्छ समझते थे । “क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥” ( रघुवं० २।३५ ) क्षत ( विनाश ) से रक्षा करने ( बचाने ) के कारण क्षत्रिय जाति का वाचक क्षत्रशब्द विश्वविख्यात है । इसके विपरीत यदि हम एक नन्दिनी गौ को न बचा सके तो राज्य से ही हमारा क्या लाभ ? अथवा निन्दा से मलिन प्राणों को ढोने से ही क्या फल ? अर्थात् धर्मविमुख निन्दित पुरुष का सब कुछ व्यर्थ है । धर्मनियन्त्रित शासक धर्म के प्रभाव से न केवल स्थूल शरीर पर ही शासन करता है, अपितु मनपर भी नियन्त्रण करके प्रजा के मन को बुरे कामों से निवृत्त करता है; अपराध रोकने के लिए दण्ड-विधान ही नहीं, किन्तु शासक की विशेष शक्ति भी अपेक्षित होती है । “अकार्यचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् । अन्तःशरीरेष्वपि यः प्रजानां प्रत्यादिदेशाविनयं विनेता ॥” ( रघुवं० ६।३९ ) महाराज कार्तवीर्य असत्कार्य का विचार प्रजा में आते ही धनुष-बाण धारण कर उनके सामने प्रकट हो जाते थे । इस तरह से उन्होंने प्रजा के मन से भी अपराधसृष्टि रोक दी थी । धर्म एवं योग के बल से वह प्रजा के मन के दुर्विचारों को जान लेते थे और तत्काल योगबल से ही प्रकट होकर आतंकित करके बुरे विचारों को रोक देते थे । इस तरह शरीर से अपराध की बात कौन कहे मन से भी पाप करने में प्रजा सदः ही डरती रहती थी । “यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्धपथे गतानाम् । वातोऽपि नासंस्रयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम् ॥” ( रघुवं० ६।७५ ) महाराज दिलीप के शासनकाल में उद्यान में घूमने के लिए गयी हुई मत्ताङ्गनाओं के उद्यान में सो जाने पर उनके देहपर से कपड़ा हटा देने की क्षमता वायु में भी नहीं थी । फिर, दूषित वृत्ति से चोरी करने के लिए कोई हाथ कैसे बढ़ा सकता था ? आज की चोरी, डकैती तथा अनुशासनहीनता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ।