भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 369

२९२ रामायणमीमांसा नवम सीता-वनवास से क्षुब्ध महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं :— “उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि । त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे ॥' (रघुवं० १४।७३) यद्यपि राम ने रावण को मारकर सबके के मार्ग का काँटा दूर किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। सबका उपकार करके भी अपनी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं। इतने गुणगण राम में विद्यमान होने से वे मुझे प्रिय होने चाहिए तथापि तुम्हारे साथ उन्होंने अकस्मात् ऐसा व्यवहार किया है इसलिए हमारी नाराजगी उनपर है ही। अर्थात् सीता के साथ उन्होंने वनवास देकर अन्याय क्यों किया ? यद्यपि यह भी आपात दृष्टि से ही अन्याय प्रतीत होता है। वस्तुतः भगवान् राम तो कभी शत्रु का भी अहित नहीं कर सकते थे 'अरिहुँक अनभल कीन न रामा'' फिर अपनी ही प्राणेश्वरी सीता का अहित कैसे कर सकते थे ? धर्मनियन्त्रित शासकों पर सर्वदा धर्मनिष्ठ महर्षियों का नियन्त्रण रहता था। इसी लिए वसिष्ठ, वाल्मीकि महर्षि भगवान् राम के गुणों और दोषों का विचार कर गुणों की प्रशंसा एवं यत्किञ्चित् दोषों से भी अवगत रहते थे।

नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम

वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को मात्र राम ही जानते थे, अन्य कोई नहीं । यथा— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोऊ न राम सम जान जथारथ ॥” (रा० मा० २५।३।३) भगवती सीता के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थ सामञ्जस्य हुआ है। नीति, लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गति-विधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई भतीजों के स्वार्थ वश, शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नही ठुकरा सकता, इस दृष्टि से शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित मानी जाती है। धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं । राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था— “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥” स्नेह, दया, सुख आदि किं बहुना मेरी हृदयेश्वरी जनकनन्दिनी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागना पड़ेगा तो भी मुझे व्यथा न होगी । आत्मा या आत्मीयों के स्वार्थवश नासमझ शासक जनता की भावनाओं की उपेक्षा करते हुए अर्थदण्ड अथवा कारागार-दण्ड का विधान करते हैं। अस्त्र-शस्त्र एवं तोप-बन्दूक आदि के बल पर जनता का मुख बन्द करने का असफल प्रयत्न करते हैं, परन्तु समझदार शासक जानता है कि मात्र दण्डविधान से जनता का मुंह बन्द नहीं किया जा सकता और यदि जबरदस्ती मुंह बन्द करने का प्रयत्न किया भी गया तो फिर हजारों हजारों मुखों से ही विरोधी आवाजें निकलेंगी । अपनी दुर्नीति बदलने से ही जनता का मुंह बन्द किया जा सकता है। दण्ड- भय से नहीं । यद्यपि श्रीजनकनन्दिनी महाराज्ञी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था; कुछ ही लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख लिया। इस प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियां भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा अवश्य ही भङ्ग हो