भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 370

अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९३ जायगी। उनको यह नहीं विदित था कि श्रीसीता अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी, आनन्दसिन्धु रामचन्द्र के माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति थीं। उन्होंने लङ्का का अन्न-जल-फल ग्रहण किये बिना ही, इन्द्रप्रदत्त विशिष्ट चरु को एक ही बार ग्रहण कर, लङ्का में काल यापन किया था। वे भानु की प्रभा, चन्द्र की चन्द्रिका एवं गङ्गा की पवित्रता के तुल्य आनन्दसिन्धु भगवान् राम की माधुर्यसार-सर्वस्वरूपा ही थीं। पुनश्च देवताओं, ऋषियों, वानरों एवं राक्षसों के सामने श्रीसीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया और सबके समक्ष साक्षात् वैश्वानर अग्नि ने उनके पावित्र्य को प्रमाणित किया था। श्रीब्रह्मा एवं श्रीशिव ने उनके पावित्र्य को परिपुष्ट किया था, तथापि उसका वर्णन श्रीराम के पक्ष की ओर से होने में शासकीय प्रचारमात्र समझा जा सकता था। अतः श्रीराम ने बहुमत। नहीं, वरन् अल्पमत का भी आदर करते हुए श्रीसीता को अरण्यवास दिया और निष्पक्ष वीतराग महर्षियों को अवसर दिया कि वे दूध का दूध और पानी का पानी के समान अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रजा के सम्मुख सत्य वस्तुस्थिति रखें, और हुआ भी ऐसा ही। जिस वन में सीता को निर्वासित किया था वहीं कुछ दूर पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। उनके कुछ ब्रह्मचारी छात्र समिधा, कुश आदि लेने के प्रसङ्ग से उधर पहुँच गये और उन्होंने ही उस अलौकिक दिव्य महाशक्ति के दर्शन एवं रोदन की सूचना महर्षि को दी। महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि ने अपने ध्यानयोग से वस्तुस्थिति को समझ कर सीता से कहा- "पुत्रि ! तुम्हारे पिता जनक मेरे मित्र हैं, तुम्हारे श्वसुर चक्रवर्ती दशरथ भी मेरे शिष्य थे, अतः पितृगृहसुलभ मेरे आश्रम में चलकर रहो।" श्रीसीता महर्षि के पीछे पीछे चलकर आश्रम में आयीं, महर्षि ने आश्रम की ऋषि-पत्नियों को, उनकी देख-रेख, रक्षण-पोषण आदि के लिए नियुक्त किया। वहीं उनके लव और कुश नामक दो पुत्ररत्नों का जन्म हुआ, जिनका संस्कार, शिक्षण-रक्षण सब महर्षियों की ही देख-रेख में हुआ। धर्मधुरन्धर चक्रवर्ती नरेन्द्र राघवेन्द्र रामचन्द्र द्वारा निर्वासिता सीता को अपने आश्रम में प्रश्रय देते हुए ही महर्षि ने अपने उत्तरदायित्व को खूब समझ लिया था और उस मिथ्याभिशाप को समूलोन्मूलन कर देने के लिए वे कृतसंकल्प थे। विश्वविधाता ब्रह्मा भी यह सब महर्षि वाल्मीकि के द्वारा ही कराना चाहते थे। तमसा के तटपर विहरणपरायण क्रौञ्च-युग्म में से एक क्रौञ्च के व्याध द्वारा मारे जाने पर क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर महान् क्लेशानुभूति करनेवाले महर्षि के सामने सीता के करुण-क्रन्दन का दृश्य आ गया। पहले से ही करुणरस पूरित वाल्मीकि का हृदय इस दृश्य से आहत होकर छलक पड़ा और वही शोक करुणरस श्लोक बन महर्षि के मुखारविन्द से विश्वकल्याण के लिए प्रस्फुटित हो आया। "शोकः श्लोकत्वमागतः ।" (वा० रा० १।१।४०) शोक श्लोक बन गया। श्लोक था- "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” (वा० रा० १।२।१५) भरद्वाज आदि शिष्यों ने आदि काव्य के इस प्रथम श्लोक को सुनकर धारण कर लिया। यह श्लोक, लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा की इच्छा से, ब्राह्मी महाशक्ति सरस्वती की कृपा से व्यक्त हुआ था। श्लोक के ऊपरी अर्थ में तो निषाद (व्याध) के लिए एक प्रकार का शाप ही है, यथा- हे निषाद ! तुम पुरुषापुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा न प्राप्त कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्च-युग्म में से एक को मार दिया है, परन्तु अन्तरङ्ग अर्थ यह कि रावण- मन्दोदरीरूप युग्म ही वे क्रौञ्च-युग्म थे। रामरूप लक्ष्मीपति ने ही रावण को मारा था। इस दृष्टि से यह श्लोक आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण ही है यथा-