भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 371

२९४ रामायणमीमांसा नवम 'हे मानिषाद मायां लक्ष्म्यां निषीदतीति मानिषादस्तत्सम्बुद्धो हे मानिषाद लक्ष्मीपते ! तुम शाश्वतीः समाः अनन्त काल तक प्रतिष्ठित रहो, क्योंकि तुमने रावण-मन्दोदरी रूप युगल के एक रावण को मारकर वेद, धर्म, संस्कृति सब का ही रक्षण किया है।" अस्तु, महर्षि के हृदय में उक्त दृश्य के कारण नितान्त क्षोभ था ही आश्रम में लौट आने पर भी वे उसी चिन्ता में निमग्न थे कि इतने में ही लोकपितामह ब्रह्माजी आश्रम में पधारे । महर्षि ने पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क से उनका पूजन किया और फिर रामवियुक्ता सीता के चिन्तन में ही निमग्न हो गये । ब्रह्मा ने बतलाया कि मेरी ही प्रेरणा से आदि काव्य रामायण का यह प्रथम श्लोक आप के मुख से प्रगट हुआ है । आप समाधि द्वारा राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, दशरथ, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा आदि सभी के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर इसी प्रकार के श्लोकों द्वारा राम-सीता के परम पवित्र चरित्रों का वर्णन करो । मेरे प्रसाद से तुम्हारे इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत न होगी— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” इस प्रकार ब्रह्मा की प्रेरणा से महर्षि ने समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण सीता एवं राम के चरित्र का पूर्ण एवं यथार्थ अनुभव कर दिव्य श्लोकों में शतकोटिप्रविस्तर रामायण का वर्णन किया । वह वर्णन निःसंकोच एवं परम सत्य था । संवाददाताओं एवं टेलीप्रिंटरों द्वारा भेजी गयी अथवा आँखों देखी घटनाओं में भी भ्रान्ति हो सकती है, परन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा तो सर्वथा ऋत (सत्य) का ही दर्शन होता है । और जगह तो काव्य सोष्ठव आदि की दृष्टि से कुछ औपचारिक बातें भी लायी जाती हैं, परन्तु यहाँ तो सीता-चरित्र-वर्णन की दृष्टि से शुद्ध सत्य का वर्णन अपेक्षित था । महर्षि ने, सीता-पुत्र लव और कुश का यथावत् संस्कार किया और वेदों; धनुर्वेद, गान्धर्ववेद आदि उपवेदों का भी साङ्गोपाङ्ग उन्हें शिक्षण दिया । तत्पश्चात् वेदों के उपबृंहण के लिए ही रामायण का अध्यापन किया और तन्त्री ( वीणा ) के तालस्वर के साथ संगीतरूप में रामायण का अभ्यास कराया । वे दोनों ही बालक दीप से उद्भूत दो दीपों के समान ही सर्वथा श्रीराम के ही अनुरूप थे । सीता-राममय दिव्य दम्पती की दिव्य दीप्ति एवं प्रभाव से युक्त थे । अश्विनीकुमारद्वय से भी अत्यधिक सुन्दर वे दोनों बालक जब स्वरसम्पदा से युक्त वीणा-वादन-पूर्वक रामायण का गायन करते थे तो सभी मोहित हो जाते थे । अनेक बार उनका रामायण गान सुनकर ऋषिगण मन्त्रमुग्ध हो जाते थे एवं प्रेमविह्वल होकर कोई ऋषि अपना कमण्डलु, कोई मेखला, कोई वृषी आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे । श्रीराम के अश्वमेधयज्ञ में निमन्त्रित होकर महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि एवं उनके सब आश्रम- वासी नैमिषारण्य पधारे हुए थे । महर्षि दोनों बालकों ( लव और कुश ) को फल-मूलभोजन कराकर कुछ साथ के लिए भी दे देते थे और कहते कि जाकर अवधवासियों को रामायण सुनाओ और भूख लगने पर अपना ही फल खाना, प्यास लगने पर अपने आप ही नदी या कूप से जल निकालकर पीना एवं किसी के कुछ देने पर भी लेना नहीं । परन्तु जो श्रद्धा से सुने उसे रामायण सुनाना । महर्षि के आदेशानुसार दोनों बालकों ने अयोध्याकाण्ड का ही प्रसङ्ग अवधवासियों को सुनाना प्रारम्भ किया : जो भी इस प्रसङ्ग को सुनता मन्त्रमुग्ध हो जाता । आखों देखी पुरानी घटनाओं का प्रत्यक्ष चित्र उनके सामने उपस्थित हो जाता था । कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्रचित्रण । उसे सुनकर सबको आश्चर्य होता था । लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे कुछ लेते न थे । यह समाचार राम-दरबार में भी गया । वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक चरित्र-चित्रण के श्रवण द्वारा रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीता-पुत्रों ने ऋषिकुमार के रूप में, वहाँ भी अपने स्वर,