रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९५ संगीतसौष्ठव तथा सौम्य सुन्दर दिव्य आकृति से सबको प्रभावित किया। उनके रामायण गान से राम, भरत, लक्ष्मण शत्रुघ्न, वसिष्ठादि महर्षि एवं अमात्यवर्ग आदि सभी मोहित हो उठे । श्रीरामचन्द्र ने रामायण गान के अन्त में लक्ष्मण को आदेश दिया कि इन बालकों को शतभार सुवर्ण एवं रत्न प्रदान किया जाय, परन्तु उन्होंने तो परमनिःस्पृहरूप से स्पष्ट कहा कि हम लोग कन्द-मूलफलाशी, वल्कलवसनधारी आश्रमवासी हैं, हमें आपके सुवर्ण-रत्नों की अपेक्षा नहीं है । पुनश्च यदि आप लोगों की इच्छा हो तो हम लोग रामायण-श्रवण करा सकते हैं । विशेषरूप से रामायण-श्रवण का प्रबन्ध किया गया । संसार के सभी गण्यमान ऋषि, महर्षि, राजर्षि, चातुर्वर्ण्य प्रजा के विशेष प्रतिनिधि, देव, असुर, गन्धर्व सभी वहाँ उपस्थित हुए । उन्होंने लोकोत्तर सौन्दर्य, अद्भुत वेदवेदाङ्ग-पाण्डित्य, दिव्य वीणावादन और मनोहर स्वर, परम निःस्पृहता एवं अद्भुत त्याग से सब के मन को वश में कर लिया । ऊँचे से ऊँचे गुण भी सस्पृहता से फीके पड़ जाते हैं। सस्पृह की अच्छी से अच्छी सच्ची बातों पर लोगों को आदर एवं विश्वास नहीं होता, परन्तु जो निःस्पृह एवं त्यागी होता है उसी वक्ता का जनता पर समुचित प्रभाव पड़ता है। फिर भी यहाँ तो कहना क्या ? निःस्पृह परमविरक्त महर्षि की ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' रामायण महाकाव्य का निःस्पृह ऋषिकुमारों द्वारा गायन सुनकर सबको वर्णित घटना के सम्बन्ध में पूर्णविश्वास हो गया । स्थाली-पुलाकन्याय से सम्पूर्ण चरित्र की सत्यता में सबका विश्वास हो गया। अयोध्याकाण्ड की सत्यता में सबका विश्वास हो गया । अयोध्याकाण्ड की सत्यघटनाओं को सुनकर अरण्य, किष्किन्धा एवं लङ्काकाण्ड के चरित्र-श्रवण की सबको उत्कट उत्कण्ठा हुई । सीता-चरित्र की जिज्ञासा भी जागरूक थी ही । सबने सत्य घटनाओं को मन्त्रमुग्ध की भाँति सुना और श्रद्धा तथा विश्वास से भगवती सीता के परम-पवित्र चरित्र की प्रशंसा की । कुटिलों की भी अपनी दुर्भावना पर पश्चात्ताप हुआ । "सीतायाश्चरितं महत्" (वा० रा० १।४।७) के अनुसार उसमें प्रधानरूप से सीता-चरित्र का वर्णन था, परन्तु पतिव्रता सीता का चरित्र जब तक उसके पति भगवान् के चरित्र का वर्णन न होता तब तक वह अपूर्ण ही रहता। अतः उसमें राम-चरित्र का वर्णन भी किया गया । यह वर्णन राजकीय प्रचारमात्र (प्रोपेगण्डा) न था, किसी राजकीय कवि की काव्यकल्पना न थी, किन्तु यह थी राजाश्रय से दूर रहकर, राजान्न से बच कर, कन्दमूल, फल तथा वल्कलवसन पर निर्भर, तपोनिष्ठ, समाधिसम्पन्न महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि की समाधि भाषा, जिसका गान कर रहे थे, उन महर्षि के ही परम प्रिय शिष्य, परम विद्वान्, परम त्यागी, वनवासी देवी के पुत्र लव और कुश । ऐसी स्थिति में जनता का सुस्थिर विश्वास क्यों न होता और कुटिल हृदयों के भी काले कल्मष उससे क्यों न धुल जाते ? सभी के हृदय पिघल गये, कण्ठ गद्गद हो गये, अङ्ग रोमाञ्चकण्टकित हो उठे, आँखों से आनन्दाश्रु एवं शोकाश्रु की धारा वह निकली । राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, माताएँ एवं परिवार के अन्य लोग भी प्रेम-समुद्र में निमग्न हो गये । वसिष्ठादि ऋषिगण भी प्रेमोद्रेक में अधीर हो उठे । महाशक्ति भगवती चिदानन्दस्वरूपा सीता के उज्ज्वल चरित्र ने सब के अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा को उद्योतित कर दिया । महर्षि वाल्मीकि के रामायण महाकाव्य से सबको स्पष्ट विदित हुआ कि सीता के असाधारण तेज के सामने रावण का प्रभाव सर्वथा नगण्य था । श्रीसीता अपने अखण्ड पातिव्रत्य तेज के प्रभाव से रावण की सत्ता में रहती हुई भी रावण को तृणतुल्य समझती थी । और सिंही के तुल्य श्रीसीता ने कहा था—दुष्ट रावण, सावधान, मेरे भगवान् राम का सन्देश एवं आदेश न होने और अपनी तपस्या-पालन करने के अभिप्राय से मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही हूँ । अन्यथा मैं क्षण भर में तुम्हें अपने भस्मार्ह तेज से भस्म कर सकती हूँ— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" (वा० रा० ५।२२।२०)