रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे अवसरों पर रावण में श्रीसीता के सामने स्थिर रहने की हिम्मत नहीं रहती थी। यह कोई कवि- कल्पना नहीं अपितु महर्षि की समाधि-भाषा की सत्य वाणी है। वहीं कुछ क्षणों के पश्चात् जब राक्षसियों ने सीता को यह समाचार सुनाया कि सीते, जो वानर आपके पास आया था, वह पकड़ लिया गया और उसकी पूंछ में घृत-तैलसने वस्त्र लपेट कर आग लगा दी गयी। जब सीता ने यह समाचार सुना तो उन्होंने अग्नि से कहा, अग्ने ! यदि मैंने समुचितरूप से गुरुशुश्रूषा की है और मैंने ठीक तपस्या तथा पातिव्रत धर्म का परिपालन किया है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ— “यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः । यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ॥” ( वा० रा० ५।५३।२६ ) सीता के आदेशानुसार दहनशील अग्निदेव शीतल हो गये । श्रीहनुमान् को आश्चर्य हो रहा था कि मेरी पुच्छाग्नि से सम्पूर्ण लङ्का भस्मीभूत हो रही है, परन्तु मेरी पूंछ में तो उष्णता का लेश भी नहीं प्रतीत हो रहा है। हनुमान् ने यह निश्चय किया था कि यह महाशक्ति सीता के तप एवं त्याग तथा पातिव्रत का ही प्रभाव है। जो सीता अपने प्रभाव से अग्नि को ठण्डा कर सकती थी वह अवश्य ही अपने तेज से रावण को भस्म कर सकती थी, यह बात सरलता से समझी जा सकती है। श्रीसीता के विरोधी कुटिल समाज ने भी उनका भक्त होकर पश्चात्ताप की अश्रुधाराओं से अपने कल्मषों को धो डाला। यह थी महर्षि वाल्मीकि की लोकोत्तर सुमधुर कृति की कुशलता। वे अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल हुए और यह थी श्रीराघवेन्द्र की नीति जिसके फलस्वरूप ये घटनाएँ घटित हुईं। जो काम किसी दण्डविधान से या प्रोपेगण्डा से कभी सम्भव नहीं था वह उनकी नीति से अनायास सुसम्पन्न हुआ। फिर तो वसिष्ठ ने भी अपनी तपस्या एवं योगबल के प्रभाव से सत्य वस्तु का साक्षात्कार करके जनता को सीताचरित्र की निर्मलता का ज्ञान कराया। त्रिजटा एवं विभीषण-पत्नी ने भी सीता के परमपवित्र चरित्र का बखान किया। अन्त में परमानन्द सच्चिन्दमयी पराम्बा सीता का अपने परम दिव्य रूप से महामहिम वैभवशालिनी माधवी देवी के अङ्क में प्रत्यक्ष प्राकट्य भी सब की भ्रान्तियों को मिटाकर उनकी परम उपास्यता का प्रमाण बना। श्रीसीता रामचन्द्र की छाया की छाया थीं । राम-रूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चन्द्रिका थीं, रामरूप ईश्वर की महाशक्तिरूपा प्रकृति थीं एवं आनन्दसिन्धु श्रीराम की माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थीं। बहिरङ्ग दृष्टि से ही राम-सीता का विप्रयोग सम्भव था, अन्तरङ्ग दृष्टि से तो यह विप्रयोग सम्भव ही न था। इसी लिए जैसे लंका में सीता की छाया ही रह सकती थी वैसे वनवास में भी छाया ही थी। वस्तुतः अमृत से जैसे उसकी मधुरिमा का पार्थक्य असम्भव है वैसे ही राघवेन्द्र श्रीराम से सीता का पार्थक्य असम्भव ही था। परन्तु वह काल्पनिक विप्रयोग भी राम के लिए असह्य वेदना का विषय था। अपने हाथों को राम निष्करुण कहते थे— “निर्भरगर्भखिन्नसीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते । हे हस्त ! तुम आसन्नप्रसवा सीता के निर्वासन में दक्ष राम के हस्त हो, अतः तुम में करुणा कैसे हो सकती है ? परन्तु स्नेह एवं प्रेम के उद्रेक में राम ने कर्तव्य से विचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी। वे किसी भी स्नेह, दया या सुख के मोह में पड़ कर लोकाराधन, प्रजारञ्जन के कार्य से कैसे विमुख हो सकते थे और उन्होंने सीता का भी इसी में हित समझा था और वह हुआ भी। इस कठोरता का आश्रयण किये बिना महर्षि वाल्मीकि