रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९७ का समागम नहीं हो सकता था, उनके द्वारा विश्वपावन रामायण महाकाव्य का निर्माण सम्पन्न न हो पाता और सीता के सुपुत्र लव-कुश इस प्रकार के संस्कारी विद्वान्, बलवान्, धनुष्मान्, कीर्तिमान् तथा प्रतिभावान् नहीं बन सकते थे । सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था । स्वयं राम ने ही सीता को वनवास देकर स्वयं को कष्ट में डालकर सीता के निर्मल, निष्कलङ्क, परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र को संसार के सामने उपस्थित किया था । परम सानुक्रोश होते हुए भी राम निरनुक्रोश से बन गये थे । श्रीराम ने लव-कुश से पूछा था "तुम्हारी माता का क्या नाम है ?" उन्होंने कहा "हमारी माँ का नाम वनदेवी है।" पिता का नाम पूछने पर कुश ने कहा "हम लोगों को मालूम नहीं।" परन्तु लव ने कहा मैं जानता हूँ मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माता ने कहा था "निरनुक्रोशतनयौ ।" श्रीराम के नेत्रों में अश्रु आ गये थे । वस्तुतः जगज्जननी सीता राम के हृदय को पहचानती थीं। पहले उन्होंने वन में छोड़कर लौटते हुए लक्ष्मण से कहा था- 'वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकावादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत् सदृशं कुलस्य ।।' ( रघुवं० १४।६१ ) अर्थात् लक्ष्मण, मेरी तरफ से उन राजा से यह कहना कि आप के सामने ही मेरी अग्निपरीक्षा एवं अग्निशुद्धि हुई थी, फिर भी आपने लोकवाद-श्रवण के कारण जो मेरा परित्याग किया है क्या यह आप के कुल एवं श्रुत के सदृश है ? परन्तु दूसरे ही क्षण सीता ने फिर कहा- "नहीं, प्रभो ! आप तो प्राणिमात्र के हितैषी एवं कल्याण की कामना करनेवाले हैं, फिर मेरे सम्बन्ध में आपकी अन्यथाबुद्धि कैसे हो सकती है । वज्रोपम असह्य श्रीचरणविप्रयोगरूप दुःख तो मेरे ही पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है"- 'कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ।।' ( रघुवं० १४।६२ ) पतिव्रतामुकुटशिरोमणि सीताजी ने आगे कहा कि "मैं प्रसव के पश्चात् सूर्य में दृष्टि लगाकर ऐसी तपस्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और फिर कभी ऐसा विप्रयोग न हो"- "साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ।।' ( रघुवं० १४।६९ ) श्रीराम ने सीता को वन भेजकर स्वयं तपस्या करते हुए ग्यारह हजार वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए यागादि के लिए विहित होने पर भी दूसरा परिणय नहीं किया । सुवर्णमयी सीता को ही अपने दक्षिणाङ्क में बैठाकर अश्वमेधादि बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था । श्रीराम का स्मरण कर विह्वल होने पर श्रीसीता की सखी वासन्ती कहती थी कि सखी ! तुम ऐसे निष्ठुर राम का स्मरण करके क्यों दीर्घ एवं उष्ण उच्छ्वास लेती हो । सीता ने कहा; "सखि ! राम निष्ठुर नहीं हैं। मैं बहिरङ्ग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ, वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ। सखि, श्रीराम के हृदय को अन्य किन्हीं स्त्रियों का श्वास कभी स्पर्श नहीं कर सका।" इस प्रकार श्रीराम ने नीति के साथ ही पूर्णरूप से प्रीति का भी परिपालन किया था । श्रीराम ने अनन्त अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर, सीता को भी अवसर दिया कि वे महर्षियों के मुखारविन्द से अध्यात्मचर्चा श्रवण कर सकें और समाधि-निष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च स्थिति की परमार्थ साधना में प्रतिष्ठित हों । स्वयं भी राम विषयविरक्त होकर ब्रह्मनिष्ठा का सम्पादन कर सके । इस प्रकार प्रजारञ्जन के साथ साथ परमार्थ-साधन भी सम्पन्न हो । ३८