भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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किसी भी मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् के लिए मातृपवित्रता-ख्याति अत्यावश्यक है। अतः अपने उत्तराधिकारी लव-कुश की उच्च स्थिति के लिए सीता-चरित्र का उज्ज्वल निष्कलङ्क होना अत्यावश्यक है। राज- महलों में पालन, पोषण एवं संस्कारों की अपेक्षा, आरण्यक ऋषियों के आश्रमों का पालन, पोषण एवं संस्कार बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। इसी लिए अपने उत्तराधिकारी पुत्रों का उत्कृष्ट संस्कार एवं उत्कृष्ट शक्तिशाली चरित्र निर्माण हो सके, इस कार्य में सीता का वनवास अधिक उपयोगी था । महर्षि श्रीवाल्मीकिजी ने स्वयं ही वेदवेदाङ्गों की शिक्षा के समान ही, धनुर्वेद एवं गन्धर्ववेदादि की भी शिक्षा दी थी। इसी लिए लव-कुश धनुर्वेद के भी प्रतिष्ठित रहस्यज्ञ हुए थे। अयोध्या, किष्किन्धा, लङ्का एवं संसार के सभी शूरवीरों ने उनका लोहा माना था। रामाश्वमेध के अश्व को अवरुद्ध कर लव-कुश ने श्रीराम सहित उनके सभी शूर-वीरों के साथ युद्ध में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। इस तरह सीता-निर्वासनरूप एक कार्य में भी नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ सब का सामञ्जस्य राम ने सम्पादित किया था। नीतिज्ञों ने नीतिनिष्ठा में राम को ही सर्वोत्कृष्ट आदर्श माना है— “यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानन्तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥” (अनर्घराघव १।४) न्याय पर चलनेवाले के साथी वानर, भालू, गृध्र आदि पशु-पक्षी भी बन जाते हैं। न्याय का पथ छोड़कर चलनेवाले का भाई भी साथ छोड़ देता है। दृष्टान्तरूप में श्रीराम एवं रावण को देखा जा सकता है। कुछ पाश्चात्य अज्ञ कुप्रचारक दुःसंस्कारों से दूषित मस्तिष्कवाले अपने अधकचरे रामायण-ज्ञान का दुष्प्रचार में दुरुपयोग करते हैं। वे सीता के लङ्का-निवास एवं वनवास दोनों के रामायणवर्णित स्वरूप को विकृत करके उससे श्रीसीता के दुश्चरित्र होने तथा दण्डित होने की कल्पना करते हैं। श्रीसीता के निर्वाण को, सीता को राम के द्वारा जीवित धरती में गड़वा देने के रूप में वर्णन करते हैं और इसे राम की क्रूरता और पिछड़े हुए जङ्गलियों के उदाहरण के रूप में उपस्थित करते हैं। परन्तु यह उनका उपहासास्पद अर्धकुक्कुटीन्याय का उदाहरणमात्र है। जैसे कोई आधी मुर्गी का भक्षण करके आधी को अण्डा देने के लिए रखना चाहता है उसी प्रकार ऐसे लोग रामायण के ही आधार पर श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व मानकर रामायण के द्वारा ही वर्णित श्रीसीता-राम के परमेश्वरत्व तथा उनके दिव्य अलौकिक चरित्रों को अस्वीकार कर देते हैं । वस्तुतः रामायण आदि भारतीय आर्ष-ग्रन्थों का प्रामाण्य अस्वीकार करने से श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व किसी भी आधुनिक इतिहास एवं प्रत्यक्ष तथा अनुमान से नहीं सिद्ध हो सकता । अतः यदि रामायण आदि का प्रामाण्य मान्य है तब तो रामायण में वर्णित श्रीसीता और राम के दिव्य चरित्रों को मानना भी अनिवार्य ही है। यदि रामायण का प्रामाण्य नहीं मान्य है तो फिर सीता और राम का अस्तित्व तथा विरोधियों द्वारा कल्पित घटनाओं की भी सिद्धि नहीं हो सकती । अन्यथा ईसा आदि सम्बन्धी इतिहासों में भी उनके विरुद्ध बहुत सी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, परन्तु यह शिष्टता, सभ्यता न होकर असभ्यता की पराकाष्ठा ही होगी। रामायण के अनुसार श्रीसीता के निर्मल निष्कलङ्क परमपवित्र चरित्र की प्रामाणिकता राक्षसों तथा वानरों के समक्ष साक्षात् अग्नि ने, ब्रह्मा ने, इन्द्र ने तथा सभी देवताओं ने सिद्ध कर दी है। सीतावनीवास का पवित्र उद्देश्य भी पूर्ववर्णित प्रकार से श्रीराम का नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का सामञ्जस्य सम्पादन करना ही है। श्रीसीता का निर्णय तो रामायणवर्णित दिव्य चरित्र है, जिससे सर्वसाधारण को भी सीता के साक्षात् दिव्य परमेश्वरी होने का विश्वास हो जाता है। श्रीसीता ने धरती देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं पवित्र तथा निष्कलङ्क हूँ तो कृपा