भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता २९९ करके आप स्वयं प्रकट होकर मुझे अपने अङ्क में स्थान दें। यह कहते ही तत्क्षण धरती फटती है, उसमें से एक दिव्य परमतेजोमय प्रकाशमय सिंहासन प्रकट होता है। उसपर विराजमान विष्णु-पत्नी माधवी मूर्तिमती भगवती धरती श्री- सीता को प्यार से अपने अङ्क में बैठा लेती हैं और सबके देखते देखते अन्तर्धान हो जाती हैं। प्रजा में जय-जयकार होने लगता है। भारत में आज भी कितनी सतियां जनसमूह के समक्ष ही अपने शरीर से दिव्य अग्नि प्रकट कर पति-सह- गमन करती हैं। श्रीसीता का तो, रामायण के अनुसार, जन्म भी पृथ्वी से ही हुआ था। ये सब बातें जड़वादियों की समझ में भले ही न आयें, परन्तु आध्यात्मिक तथा आधिदैविक तत्त्वों में विश्वास करनेवालों के लिए ऐश्वर्य तथा माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी तथा श्रीगङ्गा की अधिष्ठात्री दिव्यसुरेश्वरी के समान ही अखण्ड भूमण्डल की अधिष्ठात्री विष्णुपत्नी माधवी सर्वमान्य तत्त्व है। अतः उससे श्रीसीता का आविर्भाव तथा उसके अङ्क में निवेश असम्भव नहीं है। साथ ही देवता विग्रहवान् होते हैं। देवता स्वेच्छानुसार दिव्य लीलाविग्रह धारण कर सकते हैं। केन उपनिषद् में ब्रह्म का दिव्य अप्रधृष्य तेजोमय यक्षरूप में आविर्भाव श्रुत है। छान्दोग्य में आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष का हिरण्यश्मश्रु, हिरण्यकेश, पुण्डरीक- नेत्र तथा ज्योतिर्मय स्वरूप स्पष्टरूप से वर्णित है। मन्त्रसंहिताओं में भी नीलग्रीव शिव तथा त्रिविक्रम विष्णु का श्रीविग्रह वर्णित है। इसी दृष्टि से सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् विष्णु या ब्रह्मा का रामस्वरूप में एवं साधिष्ठान दिव्य-शक्ति का श्रीसीतारूप में आविर्भाव शास्त्र एवं युक्तितर्कसङ्गत है। श्रीकामिल बुल्के ने भी अपनी रामकथा में राम के लौकिक रूप का ही वर्णन किया है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि वेदों में कहीं भी श्रीराम का वर्णन नहीं है। यद्यपि दशरथ का वर्णन वेदों में है, यह वह स्वयं मानते हैं, परन्तु वे वेदशब्द से केवल मन्त्र-संहिता ही समझते हैं, जब कि पूर्वोत्तरमीमांसक, कल्पसूत्रकार तथा सभी मिताक्षरा प्रभृति निबन्धकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को ही वेद मानते हैं। उपनिषदों में पूर्णरूप से श्रीराम, श्रीसीता तथा श्रीकृष्ण, श्रीराधा, श्रीनृसिंह आदि का शुद्ध सच्चिदानन्दघन परब्रह्म होना अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस विषय में रामतापनीय, रामरहस्य, रामतारसार, गोपालतापनीय, नृसिंह- तापनीय आदि उपनिषदें द्रष्टव्य हैं। मन्त्र भाग में भी रामादि दिखाये जा चुके हैं। जो ईसाई श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य चरित्रों पर विश्वास नहीं करते उन्हें बाइबिल में वर्णित ईसा के दिव्य चरित्रों को भी मिथ्या मानना पड़ेगा। फिर कुमारी के उदर से ईसा का आविर्भाव भी कैसे सिद्ध होगा ? कुमारीगर्भसंभूत ईसा ईश्वरपुत्र है ? या किसी नारकादि विशेष के सम्बन्ध से विवाह के पूर्व ही किसी कुमारी से ईसा की उत्पत्ति हुई, इसका निर्णय कैसे हो सकेगा ? रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता “यदुवाच न तन्मिथ्या यद्ददौ न जहार तत् । सोऽभूद् भग्नव्रतः शत्रूनुद्धृत्य प्रतिरोपयन् ॥” ( रघुवं० १७।४२ ) महाराज अतिथि ने दान और रक्षा के विषय में जो कुछ कहा वह मिथ्या नहीं हुआ, जो उन्होंने दान दे दिया उसका अपहरण नहीं किया। हाँ, एक ही विषय में उनका व्रत टूटा जो उन्होंने शत्रुओं को उजाड़कर पुनः बसाया। “वयोरूपविभूतीनामेकैकं मदकारणम् । तानि तस्मिन् समस्तानि न तस्योत्सिषिचे मनः ॥” ( रघुवं० १७।४३ )