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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २९१ महाराज दिलीप को धनुर्धर देखते हुए भी हरिणियों के मन में आशङ्का नहीं हुई । इसी लिए समझना चाहिये कि उनका हृदय दया से भरपूर था । दयार्द्र महाराज दिलीप का शरीर देखते हुए हरिणियों ने अपनी आँखों के विस्तार का फल प्राप्त किया । प्रजा के ऊपर आये हुए भौतिक एवं आधिदैविक सङ्कटों को भी धर्मनिष्ठ राजा अपने प्रभाव से दूर कर सकता है । आज हजारों लौकिक प्रयत्नों से भी अन्नसङ्कट नहीं कट रहा है, काम होने पर भी धार्मिकता के बिना बरकत या समृद्धि नहीं हो रही है, परन्तु महाराज दिलीप के आगमनमात्र से वन के सब सङ्कट दूर हो गये थे । “शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥” ( रघुवं० २।१४ ) महाराज दिलीप के वन में प्रवेश करते ही वृष्टि के बिना भी जंगल में लगी हुई अग्नि शान्त हो गयी । जंगल में फलों और पुष्पों की विशेष वृद्धि हो गयी । जानवरों में बलवान् जन्तुओं ने दुर्बलों को सताना छोड़ दिया । यह सब सेना, पुलिस या कोर्ट का प्रभाव नहीं, किन्तु धर्मनिष्ठा का ही लोकोत्तर प्रभाव था । धर्मनियन्त्रित शासक दिलीप धर्मपालन के सामने राज्य एवं प्राणों को भी तुच्छ समझते थे । “क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥” ( रघुवं० २।३५ ) क्षत ( विनाश ) से रक्षा करने ( बचाने ) के कारण क्षत्रिय जाति का वाचक क्षत्रशब्द विश्वविख्यात है । इसके विपरीत यदि हम एक नन्दिनी गौ को न बचा सके तो राज्य से ही हमारा क्या लाभ ? अथवा निन्दा से मलिन प्राणों को ढोने से ही क्या फल ? अर्थात् धर्मविमुख निन्दित पुरुष का सब कुछ व्यर्थ है । धर्मनियन्त्रित शासक धर्म के प्रभाव से न केवल स्थूल शरीर पर ही शासन करता है, अपितु मनपर भी नियन्त्रण करके प्रजा के मन को बुरे कामों से निवृत्त करता है; अपराध रोकने के लिए दण्ड-विधान ही नहीं, किन्तु शासक की विशेष शक्ति भी अपेक्षित होती है । “अकार्यचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् । अन्तःशरीरेष्वपि यः प्रजानां प्रत्यादिदेशाविनयं विनेता ॥” ( रघुवं० ६।३९ ) महाराज कार्तवीर्य असत्कार्य का विचार प्रजा में आते ही धनुष-बाण धारण कर उनके सामने प्रकट हो जाते थे । इस तरह से उन्होंने प्रजा के मन से भी अपराधसृष्टि रोक दी थी । धर्म एवं योग के बल से वह प्रजा के मन के दुर्विचारों को जान लेते थे और तत्काल योगबल से ही प्रकट होकर आतंकित करके बुरे विचारों को रोक देते थे । इस तरह शरीर से अपराध की बात कौन कहे मन से भी पाप करने में प्रजा सदः ही डरती रहती थी । “यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्धपथे गतानाम् । वातोऽपि नासंस्रयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम् ॥” ( रघुवं० ६।७५ ) महाराज दिलीप के शासनकाल में उद्यान में घूमने के लिए गयी हुई मत्ताङ्गनाओं के उद्यान में सो जाने पर उनके देहपर से कपड़ा हटा देने की क्षमता वायु में भी नहीं थी । फिर, दूषित वृत्ति से चोरी करने के लिए कोई हाथ कैसे बढ़ा सकता था ? आज की चोरी, डकैती तथा अनुशासनहीनता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ।

२९२ रामायणमीमांसा नवम सीता-वनवास से क्षुब्ध महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं :— “उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि । त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे ॥' (रघुवं० १४।७३) यद्यपि राम ने रावण को मारकर सबके के मार्ग का काँटा दूर किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। सबका उपकार करके भी अपनी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं। इतने गुणगण राम में विद्यमान होने से वे मुझे प्रिय होने चाहिए तथापि तुम्हारे साथ उन्होंने अकस्मात् ऐसा व्यवहार किया है इसलिए हमारी नाराजगी उनपर है ही। अर्थात् सीता के साथ उन्होंने वनवास देकर अन्याय क्यों किया ? यद्यपि यह भी आपात दृष्टि से ही अन्याय प्रतीत होता है। वस्तुतः भगवान् राम तो कभी शत्रु का भी अहित नहीं कर सकते थे 'अरिहुँक अनभल कीन न रामा'' फिर अपनी ही प्राणेश्वरी सीता का अहित कैसे कर सकते थे ? धर्मनियन्त्रित शासकों पर सर्वदा धर्मनिष्ठ महर्षियों का नियन्त्रण रहता था। इसी लिए वसिष्ठ, वाल्मीकि महर्षि भगवान् राम के गुणों और दोषों का विचार कर गुणों की प्रशंसा एवं यत्किञ्चित् दोषों से भी अवगत रहते थे।

नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम

वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को मात्र राम ही जानते थे, अन्य कोई नहीं । यथा— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोऊ न राम सम जान जथारथ ॥” (रा० मा० २५।३।३) भगवती सीता के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थ सामञ्जस्य हुआ है। नीति, लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गति-विधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई भतीजों के स्वार्थ वश, शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नही ठुकरा सकता, इस दृष्टि से शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित मानी जाती है। धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं । राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था— “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥” स्नेह, दया, सुख आदि किं बहुना मेरी हृदयेश्वरी जनकनन्दिनी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागना पड़ेगा तो भी मुझे व्यथा न होगी । आत्मा या आत्मीयों के स्वार्थवश नासमझ शासक जनता की भावनाओं की उपेक्षा करते हुए अर्थदण्ड अथवा कारागार-दण्ड का विधान करते हैं। अस्त्र-शस्त्र एवं तोप-बन्दूक आदि के बल पर जनता का मुख बन्द करने का असफल प्रयत्न करते हैं, परन्तु समझदार शासक जानता है कि मात्र दण्डविधान से जनता का मुंह बन्द नहीं किया जा सकता और यदि जबरदस्ती मुंह बन्द करने का प्रयत्न किया भी गया तो फिर हजारों हजारों मुखों से ही विरोधी आवाजें निकलेंगी । अपनी दुर्नीति बदलने से ही जनता का मुंह बन्द किया जा सकता है। दण्ड- भय से नहीं । यद्यपि श्रीजनकनन्दिनी महाराज्ञी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था; कुछ ही लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख लिया। इस प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियां भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा अवश्य ही भङ्ग हो

अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९३ जायगी। उनको यह नहीं विदित था कि श्रीसीता अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी, आनन्दसिन्धु रामचन्द्र के माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति थीं। उन्होंने लङ्का का अन्न-जल-फल ग्रहण किये बिना ही, इन्द्रप्रदत्त विशिष्ट चरु को एक ही बार ग्रहण कर, लङ्का में काल यापन किया था। वे भानु की प्रभा, चन्द्र की चन्द्रिका एवं गङ्गा की पवित्रता के तुल्य आनन्दसिन्धु भगवान् राम की माधुर्यसार-सर्वस्वरूपा ही थीं। पुनश्च देवताओं, ऋषियों, वानरों एवं राक्षसों के सामने श्रीसीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया और सबके समक्ष साक्षात् वैश्वानर अग्नि ने उनके पावित्र्य को प्रमाणित किया था। श्रीब्रह्मा एवं श्रीशिव ने उनके पावित्र्य को परिपुष्ट किया था, तथापि उसका वर्णन श्रीराम के पक्ष की ओर से होने में शासकीय प्रचारमात्र समझा जा सकता था। अतः श्रीराम ने बहुमत। नहीं, वरन् अल्पमत का भी आदर करते हुए श्रीसीता को अरण्यवास दिया और निष्पक्ष वीतराग महर्षियों को अवसर दिया कि वे दूध का दूध और पानी का पानी के समान अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रजा के सम्मुख सत्य वस्तुस्थिति रखें, और हुआ भी ऐसा ही। जिस वन में सीता को निर्वासित किया था वहीं कुछ दूर पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। उनके कुछ ब्रह्मचारी छात्र समिधा, कुश आदि लेने के प्रसङ्ग से उधर पहुँच गये और उन्होंने ही उस अलौकिक दिव्य महाशक्ति के दर्शन एवं रोदन की सूचना महर्षि को दी। महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि ने अपने ध्यानयोग से वस्तुस्थिति को समझ कर सीता से कहा- "पुत्रि ! तुम्हारे पिता जनक मेरे मित्र हैं, तुम्हारे श्वसुर चक्रवर्ती दशरथ भी मेरे शिष्य थे, अतः पितृगृहसुलभ मेरे आश्रम में चलकर रहो।" श्रीसीता महर्षि के पीछे पीछे चलकर आश्रम में आयीं, महर्षि ने आश्रम की ऋषि-पत्नियों को, उनकी देख-रेख, रक्षण-पोषण आदि के लिए नियुक्त किया। वहीं उनके लव और कुश नामक दो पुत्ररत्नों का जन्म हुआ, जिनका संस्कार, शिक्षण-रक्षण सब महर्षियों की ही देख-रेख में हुआ। धर्मधुरन्धर चक्रवर्ती नरेन्द्र राघवेन्द्र रामचन्द्र द्वारा निर्वासिता सीता को अपने आश्रम में प्रश्रय देते हुए ही महर्षि ने अपने उत्तरदायित्व को खूब समझ लिया था और उस मिथ्याभिशाप को समूलोन्मूलन कर देने के लिए वे कृतसंकल्प थे। विश्वविधाता ब्रह्मा भी यह सब महर्षि वाल्मीकि के द्वारा ही कराना चाहते थे। तमसा के तटपर विहरणपरायण क्रौञ्च-युग्म में से एक क्रौञ्च के व्याध द्वारा मारे जाने पर क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर महान् क्लेशानुभूति करनेवाले महर्षि के सामने सीता के करुण-क्रन्दन का दृश्य आ गया। पहले से ही करुणरस पूरित वाल्मीकि का हृदय इस दृश्य से आहत होकर छलक पड़ा और वही शोक करुणरस श्लोक बन महर्षि के मुखारविन्द से विश्वकल्याण के लिए प्रस्फुटित हो आया। "शोकः श्लोकत्वमागतः ।" (वा० रा० १।१।४०) शोक श्लोक बन गया। श्लोक था- "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” (वा० रा० १।२।१५) भरद्वाज आदि शिष्यों ने आदि काव्य के इस प्रथम श्लोक को सुनकर धारण कर लिया। यह श्लोक, लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा की इच्छा से, ब्राह्मी महाशक्ति सरस्वती की कृपा से व्यक्त हुआ था। श्लोक के ऊपरी अर्थ में तो निषाद (व्याध) के लिए एक प्रकार का शाप ही है, यथा- हे निषाद ! तुम पुरुषापुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा न प्राप्त कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्च-युग्म में से एक को मार दिया है, परन्तु अन्तरङ्ग अर्थ यह कि रावण- मन्दोदरीरूप युग्म ही वे क्रौञ्च-युग्म थे। रामरूप लक्ष्मीपति ने ही रावण को मारा था। इस दृष्टि से यह श्लोक आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण ही है यथा-

२९४ रामायणमीमांसा नवम 'हे मानिषाद मायां लक्ष्म्यां निषीदतीति मानिषादस्तत्सम्बुद्धो हे मानिषाद लक्ष्मीपते ! तुम शाश्वतीः समाः अनन्त काल तक प्रतिष्ठित रहो, क्योंकि तुमने रावण-मन्दोदरी रूप युगल के एक रावण को मारकर वेद, धर्म, संस्कृति सब का ही रक्षण किया है।" अस्तु, महर्षि के हृदय में उक्त दृश्य के कारण नितान्त क्षोभ था ही आश्रम में लौट आने पर भी वे उसी चिन्ता में निमग्न थे कि इतने में ही लोकपितामह ब्रह्माजी आश्रम में पधारे । महर्षि ने पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क से उनका पूजन किया और फिर रामवियुक्ता सीता के चिन्तन में ही निमग्न हो गये । ब्रह्मा ने बतलाया कि मेरी ही प्रेरणा से आदि काव्य रामायण का यह प्रथम श्लोक आप के मुख से प्रगट हुआ है । आप समाधि द्वारा राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, दशरथ, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा आदि सभी के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर इसी प्रकार के श्लोकों द्वारा राम-सीता के परम पवित्र चरित्रों का वर्णन करो । मेरे प्रसाद से तुम्हारे इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत न होगी— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” इस प्रकार ब्रह्मा की प्रेरणा से महर्षि ने समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण सीता एवं राम के चरित्र का पूर्ण एवं यथार्थ अनुभव कर दिव्य श्लोकों में शतकोटिप्रविस्तर रामायण का वर्णन किया । वह वर्णन निःसंकोच एवं परम सत्य था । संवाददाताओं एवं टेलीप्रिंटरों द्वारा भेजी गयी अथवा आँखों देखी घटनाओं में भी भ्रान्ति हो सकती है, परन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा तो सर्वथा ऋत (सत्य) का ही दर्शन होता है । और जगह तो काव्य सोष्ठव आदि की दृष्टि से कुछ औपचारिक बातें भी लायी जाती हैं, परन्तु यहाँ तो सीता-चरित्र-वर्णन की दृष्टि से शुद्ध सत्य का वर्णन अपेक्षित था । महर्षि ने, सीता-पुत्र लव और कुश का यथावत् संस्कार किया और वेदों; धनुर्वेद, गान्धर्ववेद आदि उपवेदों का भी साङ्गोपाङ्ग उन्हें शिक्षण दिया । तत्पश्चात् वेदों के उपबृंहण के लिए ही रामायण का अध्यापन किया और तन्त्री ( वीणा ) के तालस्वर के साथ संगीतरूप में रामायण का अभ्यास कराया । वे दोनों ही बालक दीप से उद्भूत दो दीपों के समान ही सर्वथा श्रीराम के ही अनुरूप थे । सीता-राममय दिव्य दम्पती की दिव्य दीप्ति एवं प्रभाव से युक्त थे । अश्विनीकुमारद्वय से भी अत्यधिक सुन्दर वे दोनों बालक जब स्वरसम्पदा से युक्त वीणा-वादन-पूर्वक रामायण का गायन करते थे तो सभी मोहित हो जाते थे । अनेक बार उनका रामायण गान सुनकर ऋषिगण मन्त्रमुग्ध हो जाते थे एवं प्रेमविह्वल होकर कोई ऋषि अपना कमण्डलु, कोई मेखला, कोई वृषी आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे । श्रीराम के अश्वमेधयज्ञ में निमन्त्रित होकर महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि एवं उनके सब आश्रम- वासी नैमिषारण्य पधारे हुए थे । महर्षि दोनों बालकों ( लव और कुश ) को फल-मूलभोजन कराकर कुछ साथ के लिए भी दे देते थे और कहते कि जाकर अवधवासियों को रामायण सुनाओ और भूख लगने पर अपना ही फल खाना, प्यास लगने पर अपने आप ही नदी या कूप से जल निकालकर पीना एवं किसी के कुछ देने पर भी लेना नहीं । परन्तु जो श्रद्धा से सुने उसे रामायण सुनाना । महर्षि के आदेशानुसार दोनों बालकों ने अयोध्याकाण्ड का ही प्रसङ्ग अवधवासियों को सुनाना प्रारम्भ किया : जो भी इस प्रसङ्ग को सुनता मन्त्रमुग्ध हो जाता । आखों देखी पुरानी घटनाओं का प्रत्यक्ष चित्र उनके सामने उपस्थित हो जाता था । कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्रचित्रण । उसे सुनकर सबको आश्चर्य होता था । लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे कुछ लेते न थे । यह समाचार राम-दरबार में भी गया । वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक चरित्र-चित्रण के श्रवण द्वारा रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीता-पुत्रों ने ऋषिकुमार के रूप में, वहाँ भी अपने स्वर,

अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९५ संगीतसौष्ठव तथा सौम्य सुन्दर दिव्य आकृति से सबको प्रभावित किया। उनके रामायण गान से राम, भरत, लक्ष्मण शत्रुघ्न, वसिष्ठादि महर्षि एवं अमात्यवर्ग आदि सभी मोहित हो उठे । श्रीरामचन्द्र ने रामायण गान के अन्त में लक्ष्मण को आदेश दिया कि इन बालकों को शतभार सुवर्ण एवं रत्न प्रदान किया जाय, परन्तु उन्होंने तो परमनिःस्पृहरूप से स्पष्ट कहा कि हम लोग कन्द-मूलफलाशी, वल्कलवसनधारी आश्रमवासी हैं, हमें आपके सुवर्ण-रत्नों की अपेक्षा नहीं है । पुनश्च यदि आप लोगों की इच्छा हो तो हम लोग रामायण-श्रवण करा सकते हैं । विशेषरूप से रामायण-श्रवण का प्रबन्ध किया गया । संसार के सभी गण्यमान ऋषि, महर्षि, राजर्षि, चातुर्वर्ण्य प्रजा के विशेष प्रतिनिधि, देव, असुर, गन्धर्व सभी वहाँ उपस्थित हुए । उन्होंने लोकोत्तर सौन्दर्य, अद्भुत वेदवेदाङ्ग-पाण्डित्य, दिव्य वीणावादन और मनोहर स्वर, परम निःस्पृहता एवं अद्भुत त्याग से सब के मन को वश में कर लिया । ऊँचे से ऊँचे गुण भी सस्पृहता से फीके पड़ जाते हैं। सस्पृह की अच्छी से अच्छी सच्ची बातों पर लोगों को आदर एवं विश्वास नहीं होता, परन्तु जो निःस्पृह एवं त्यागी होता है उसी वक्ता का जनता पर समुचित प्रभाव पड़ता है। फिर भी यहाँ तो कहना क्या ? निःस्पृह परमविरक्त महर्षि की ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' रामायण महाकाव्य का निःस्पृह ऋषिकुमारों द्वारा गायन सुनकर सबको वर्णित घटना के सम्बन्ध में पूर्णविश्वास हो गया । स्थाली-पुलाकन्याय से सम्पूर्ण चरित्र की सत्यता में सबका विश्वास हो गया। अयोध्याकाण्ड की सत्यता में सबका विश्वास हो गया । अयोध्याकाण्ड की सत्यघटनाओं को सुनकर अरण्य, किष्किन्धा एवं लङ्काकाण्ड के चरित्र-श्रवण की सबको उत्कट उत्कण्ठा हुई । सीता-चरित्र की जिज्ञासा भी जागरूक थी ही । सबने सत्य घटनाओं को मन्त्रमुग्ध की भाँति सुना और श्रद्धा तथा विश्वास से भगवती सीता के परम-पवित्र चरित्र की प्रशंसा की । कुटिलों की भी अपनी दुर्भावना पर पश्चात्ताप हुआ । "सीतायाश्चरितं महत्" (वा० रा० १।४।७) के अनुसार उसमें प्रधानरूप से सीता-चरित्र का वर्णन था, परन्तु पतिव्रता सीता का चरित्र जब तक उसके पति भगवान् के चरित्र का वर्णन न होता तब तक वह अपूर्ण ही रहता। अतः उसमें राम-चरित्र का वर्णन भी किया गया । यह वर्णन राजकीय प्रचारमात्र (प्रोपेगण्डा) न था, किसी राजकीय कवि की काव्यकल्पना न थी, किन्तु यह थी राजाश्रय से दूर रहकर, राजान्न से बच कर, कन्दमूल, फल तथा वल्कलवसन पर निर्भर, तपोनिष्ठ, समाधिसम्पन्न महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि की समाधि भाषा, जिसका गान कर रहे थे, उन महर्षि के ही परम प्रिय शिष्य, परम विद्वान्, परम त्यागी, वनवासी देवी के पुत्र लव और कुश । ऐसी स्थिति में जनता का सुस्थिर विश्वास क्यों न होता और कुटिल हृदयों के भी काले कल्मष उससे क्यों न धुल जाते ? सभी के हृदय पिघल गये, कण्ठ गद्गद हो गये, अङ्ग रोमाञ्चकण्टकित हो उठे, आँखों से आनन्दाश्रु एवं शोकाश्रु की धारा वह निकली । राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, माताएँ एवं परिवार के अन्य लोग भी प्रेम-समुद्र में निमग्न हो गये । वसिष्ठादि ऋषिगण भी प्रेमोद्रेक में अधीर हो उठे । महाशक्ति भगवती चिदानन्दस्वरूपा सीता के उज्ज्वल चरित्र ने सब के अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा को उद्योतित कर दिया । महर्षि वाल्मीकि के रामायण महाकाव्य से सबको स्पष्ट विदित हुआ कि सीता के असाधारण तेज के सामने रावण का प्रभाव सर्वथा नगण्य था । श्रीसीता अपने अखण्ड पातिव्रत्य तेज के प्रभाव से रावण की सत्ता में रहती हुई भी रावण को तृणतुल्य समझती थी । और सिंही के तुल्य श्रीसीता ने कहा था—दुष्ट रावण, सावधान, मेरे भगवान् राम का सन्देश एवं आदेश न होने और अपनी तपस्या-पालन करने के अभिप्राय से मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही हूँ । अन्यथा मैं क्षण भर में तुम्हें अपने भस्मार्ह तेज से भस्म कर सकती हूँ— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" (वा० रा० ५।२२।२०)

ऐसे अवसरों पर रावण में श्रीसीता के सामने स्थिर रहने की हिम्मत नहीं रहती थी। यह कोई कवि- कल्पना नहीं अपितु महर्षि की समाधि-भाषा की सत्य वाणी है। वहीं कुछ क्षणों के पश्चात् जब राक्षसियों ने सीता को यह समाचार सुनाया कि सीते, जो वानर आपके पास आया था, वह पकड़ लिया गया और उसकी पूंछ में घृत-तैलसने वस्त्र लपेट कर आग लगा दी गयी। जब सीता ने यह समाचार सुना तो उन्होंने अग्नि से कहा, अग्ने ! यदि मैंने समुचितरूप से गुरुशुश्रूषा की है और मैंने ठीक तपस्या तथा पातिव्रत धर्म का परिपालन किया है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ— “यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः । यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ॥” ( वा० रा० ५।५३।२६ ) सीता के आदेशानुसार दहनशील अग्निदेव शीतल हो गये । श्रीहनुमान् को आश्चर्य हो रहा था कि मेरी पुच्छाग्नि से सम्पूर्ण लङ्का भस्मीभूत हो रही है, परन्तु मेरी पूंछ में तो उष्णता का लेश भी नहीं प्रतीत हो रहा है। हनुमान् ने यह निश्चय किया था कि यह महाशक्ति सीता के तप एवं त्याग तथा पातिव्रत का ही प्रभाव है। जो सीता अपने प्रभाव से अग्नि को ठण्डा कर सकती थी वह अवश्य ही अपने तेज से रावण को भस्म कर सकती थी, यह बात सरलता से समझी जा सकती है। श्रीसीता के विरोधी कुटिल समाज ने भी उनका भक्त होकर पश्चात्ताप की अश्रुधाराओं से अपने कल्मषों को धो डाला। यह थी महर्षि वाल्मीकि की लोकोत्तर सुमधुर कृति की कुशलता। वे अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल हुए और यह थी श्रीराघवेन्द्र की नीति जिसके फलस्वरूप ये घटनाएँ घटित हुईं। जो काम किसी दण्डविधान से या प्रोपेगण्डा से कभी सम्भव नहीं था वह उनकी नीति से अनायास सुसम्पन्न हुआ। फिर तो वसिष्ठ ने भी अपनी तपस्या एवं योगबल के प्रभाव से सत्य वस्तु का साक्षात्कार करके जनता को सीताचरित्र की निर्मलता का ज्ञान कराया। त्रिजटा एवं विभीषण-पत्नी ने भी सीता के परमपवित्र चरित्र का बखान किया। अन्त में परमानन्द सच्चिन्दमयी पराम्बा सीता का अपने परम दिव्य रूप से महामहिम वैभवशालिनी माधवी देवी के अङ्क में प्रत्यक्ष प्राकट्य भी सब की भ्रान्तियों को मिटाकर उनकी परम उपास्यता का प्रमाण बना। श्रीसीता रामचन्द्र की छाया की छाया थीं । राम-रूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चन्द्रिका थीं, रामरूप ईश्वर की महाशक्तिरूपा प्रकृति थीं एवं आनन्दसिन्धु श्रीराम की माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थीं। बहिरङ्ग दृष्टि से ही राम-सीता का विप्रयोग सम्भव था, अन्तरङ्ग दृष्टि से तो यह विप्रयोग सम्भव ही न था। इसी लिए जैसे लंका में सीता की छाया ही रह सकती थी वैसे वनवास में भी छाया ही थी। वस्तुतः अमृत से जैसे उसकी मधुरिमा का पार्थक्य असम्भव है वैसे ही राघवेन्द्र श्रीराम से सीता का पार्थक्य असम्भव ही था। परन्तु वह काल्पनिक विप्रयोग भी राम के लिए असह्य वेदना का विषय था। अपने हाथों को राम निष्करुण कहते थे— “निर्भरगर्भखिन्नसीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते । हे हस्त ! तुम आसन्नप्रसवा सीता के निर्वासन में दक्ष राम के हस्त हो, अतः तुम में करुणा कैसे हो सकती है ? परन्तु स्नेह एवं प्रेम के उद्रेक में राम ने कर्तव्य से विचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी। वे किसी भी स्नेह, दया या सुख के मोह में पड़ कर लोकाराधन, प्रजारञ्जन के कार्य से कैसे विमुख हो सकते थे और उन्होंने सीता का भी इसी में हित समझा था और वह हुआ भी। इस कठोरता का आश्रयण किये बिना महर्षि वाल्मीकि

अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९७ का समागम नहीं हो सकता था, उनके द्वारा विश्वपावन रामायण महाकाव्य का निर्माण सम्पन्न न हो पाता और सीता के सुपुत्र लव-कुश इस प्रकार के संस्कारी विद्वान्, बलवान्, धनुष्मान्, कीर्तिमान् तथा प्रतिभावान् नहीं बन सकते थे । सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था । स्वयं राम ने ही सीता को वनवास देकर स्वयं को कष्ट में डालकर सीता के निर्मल, निष्कलङ्क, परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र को संसार के सामने उपस्थित किया था । परम सानुक्रोश होते हुए भी राम निरनुक्रोश से बन गये थे । श्रीराम ने लव-कुश से पूछा था "तुम्हारी माता का क्या नाम है ?" उन्होंने कहा "हमारी माँ का नाम वनदेवी है।" पिता का नाम पूछने पर कुश ने कहा "हम लोगों को मालूम नहीं।" परन्तु लव ने कहा मैं जानता हूँ मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माता ने कहा था "निरनुक्रोशतनयौ ।" श्रीराम के नेत्रों में अश्रु आ गये थे । वस्तुतः जगज्जननी सीता राम के हृदय को पहचानती थीं। पहले उन्होंने वन में छोड़कर लौटते हुए लक्ष्मण से कहा था- 'वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकावादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत् सदृशं कुलस्य ।।' ( रघुवं० १४।६१ ) अर्थात् लक्ष्मण, मेरी तरफ से उन राजा से यह कहना कि आप के सामने ही मेरी अग्निपरीक्षा एवं अग्निशुद्धि हुई थी, फिर भी आपने लोकवाद-श्रवण के कारण जो मेरा परित्याग किया है क्या यह आप के कुल एवं श्रुत के सदृश है ? परन्तु दूसरे ही क्षण सीता ने फिर कहा- "नहीं, प्रभो ! आप तो प्राणिमात्र के हितैषी एवं कल्याण की कामना करनेवाले हैं, फिर मेरे सम्बन्ध में आपकी अन्यथाबुद्धि कैसे हो सकती है । वज्रोपम असह्य श्रीचरणविप्रयोगरूप दुःख तो मेरे ही पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है"- 'कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ।।' ( रघुवं० १४।६२ ) पतिव्रतामुकुटशिरोमणि सीताजी ने आगे कहा कि "मैं प्रसव के पश्चात् सूर्य में दृष्टि लगाकर ऐसी तपस्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और फिर कभी ऐसा विप्रयोग न हो"- "साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ।।' ( रघुवं० १४।६९ ) श्रीराम ने सीता को वन भेजकर स्वयं तपस्या करते हुए ग्यारह हजार वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए यागादि के लिए विहित होने पर भी दूसरा परिणय नहीं किया । सुवर्णमयी सीता को ही अपने दक्षिणाङ्क में बैठाकर अश्वमेधादि बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था । श्रीराम का स्मरण कर विह्वल होने पर श्रीसीता की सखी वासन्ती कहती थी कि सखी ! तुम ऐसे निष्ठुर राम का स्मरण करके क्यों दीर्घ एवं उष्ण उच्छ्वास लेती हो । सीता ने कहा; "सखि ! राम निष्ठुर नहीं हैं। मैं बहिरङ्ग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ, वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ। सखि, श्रीराम के हृदय को अन्य किन्हीं स्त्रियों का श्वास कभी स्पर्श नहीं कर सका।" इस प्रकार श्रीराम ने नीति के साथ ही पूर्णरूप से प्रीति का भी परिपालन किया था । श्रीराम ने अनन्त अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर, सीता को भी अवसर दिया कि वे महर्षियों के मुखारविन्द से अध्यात्मचर्चा श्रवण कर सकें और समाधि-निष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च स्थिति की परमार्थ साधना में प्रतिष्ठित हों । स्वयं भी राम विषयविरक्त होकर ब्रह्मनिष्ठा का सम्पादन कर सके । इस प्रकार प्रजारञ्जन के साथ साथ परमार्थ-साधन भी सम्पन्न हो । ३८

किसी भी मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् के लिए मातृपवित्रता-ख्याति अत्यावश्यक है। अतः अपने उत्तराधिकारी लव-कुश की उच्च स्थिति के लिए सीता-चरित्र का उज्ज्वल निष्कलङ्क होना अत्यावश्यक है। राज- महलों में पालन, पोषण एवं संस्कारों की अपेक्षा, आरण्यक ऋषियों के आश्रमों का पालन, पोषण एवं संस्कार बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। इसी लिए अपने उत्तराधिकारी पुत्रों का उत्कृष्ट संस्कार एवं उत्कृष्ट शक्तिशाली चरित्र निर्माण हो सके, इस कार्य में सीता का वनवास अधिक उपयोगी था । महर्षि श्रीवाल्मीकिजी ने स्वयं ही वेदवेदाङ्गों की शिक्षा के समान ही, धनुर्वेद एवं गन्धर्ववेदादि की भी शिक्षा दी थी। इसी लिए लव-कुश धनुर्वेद के भी प्रतिष्ठित रहस्यज्ञ हुए थे। अयोध्या, किष्किन्धा, लङ्का एवं संसार के सभी शूरवीरों ने उनका लोहा माना था। रामाश्वमेध के अश्व को अवरुद्ध कर लव-कुश ने श्रीराम सहित उनके सभी शूर-वीरों के साथ युद्ध में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। इस तरह सीता-निर्वासनरूप एक कार्य में भी नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ सब का सामञ्जस्य राम ने सम्पादित किया था। नीतिज्ञों ने नीतिनिष्ठा में राम को ही सर्वोत्कृष्ट आदर्श माना है— “यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानन्तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥” (अनर्घराघव १।४) न्याय पर चलनेवाले के साथी वानर, भालू, गृध्र आदि पशु-पक्षी भी बन जाते हैं। न्याय का पथ छोड़कर चलनेवाले का भाई भी साथ छोड़ देता है। दृष्टान्तरूप में श्रीराम एवं रावण को देखा जा सकता है। कुछ पाश्चात्य अज्ञ कुप्रचारक दुःसंस्कारों से दूषित मस्तिष्कवाले अपने अधकचरे रामायण-ज्ञान का दुष्प्रचार में दुरुपयोग करते हैं। वे सीता के लङ्का-निवास एवं वनवास दोनों के रामायणवर्णित स्वरूप को विकृत करके उससे श्रीसीता के दुश्चरित्र होने तथा दण्डित होने की कल्पना करते हैं। श्रीसीता के निर्वाण को, सीता को राम के द्वारा जीवित धरती में गड़वा देने के रूप में वर्णन करते हैं और इसे राम की क्रूरता और पिछड़े हुए जङ्गलियों के उदाहरण के रूप में उपस्थित करते हैं। परन्तु यह उनका उपहासास्पद अर्धकुक्कुटीन्याय का उदाहरणमात्र है। जैसे कोई आधी मुर्गी का भक्षण करके आधी को अण्डा देने के लिए रखना चाहता है उसी प्रकार ऐसे लोग रामायण के ही आधार पर श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व मानकर रामायण के द्वारा ही वर्णित श्रीसीता-राम के परमेश्वरत्व तथा उनके दिव्य अलौकिक चरित्रों को अस्वीकार कर देते हैं । वस्तुतः रामायण आदि भारतीय आर्ष-ग्रन्थों का प्रामाण्य अस्वीकार करने से श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व किसी भी आधुनिक इतिहास एवं प्रत्यक्ष तथा अनुमान से नहीं सिद्ध हो सकता । अतः यदि रामायण आदि का प्रामाण्य मान्य है तब तो रामायण में वर्णित श्रीसीता और राम के दिव्य चरित्रों को मानना भी अनिवार्य ही है। यदि रामायण का प्रामाण्य नहीं मान्य है तो फिर सीता और राम का अस्तित्व तथा विरोधियों द्वारा कल्पित घटनाओं की भी सिद्धि नहीं हो सकती । अन्यथा ईसा आदि सम्बन्धी इतिहासों में भी उनके विरुद्ध बहुत सी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, परन्तु यह शिष्टता, सभ्यता न होकर असभ्यता की पराकाष्ठा ही होगी। रामायण के अनुसार श्रीसीता के निर्मल निष्कलङ्क परमपवित्र चरित्र की प्रामाणिकता राक्षसों तथा वानरों के समक्ष साक्षात् अग्नि ने, ब्रह्मा ने, इन्द्र ने तथा सभी देवताओं ने सिद्ध कर दी है। सीतावनीवास का पवित्र उद्देश्य भी पूर्ववर्णित प्रकार से श्रीराम का नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का सामञ्जस्य सम्पादन करना ही है। श्रीसीता का निर्णय तो रामायणवर्णित दिव्य चरित्र है, जिससे सर्वसाधारण को भी सीता के साक्षात् दिव्य परमेश्वरी होने का विश्वास हो जाता है। श्रीसीता ने धरती देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं पवित्र तथा निष्कलङ्क हूँ तो कृपा

अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता २९९ करके आप स्वयं प्रकट होकर मुझे अपने अङ्क में स्थान दें। यह कहते ही तत्क्षण धरती फटती है, उसमें से एक दिव्य परमतेजोमय प्रकाशमय सिंहासन प्रकट होता है। उसपर विराजमान विष्णु-पत्नी माधवी मूर्तिमती भगवती धरती श्री- सीता को प्यार से अपने अङ्क में बैठा लेती हैं और सबके देखते देखते अन्तर्धान हो जाती हैं। प्रजा में जय-जयकार होने लगता है। भारत में आज भी कितनी सतियां जनसमूह के समक्ष ही अपने शरीर से दिव्य अग्नि प्रकट कर पति-सह- गमन करती हैं। श्रीसीता का तो, रामायण के अनुसार, जन्म भी पृथ्वी से ही हुआ था। ये सब बातें जड़वादियों की समझ में भले ही न आयें, परन्तु आध्यात्मिक तथा आधिदैविक तत्त्वों में विश्वास करनेवालों के लिए ऐश्वर्य तथा माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी तथा श्रीगङ्गा की अधिष्ठात्री दिव्यसुरेश्वरी के समान ही अखण्ड भूमण्डल की अधिष्ठात्री विष्णुपत्नी माधवी सर्वमान्य तत्त्व है। अतः उससे श्रीसीता का आविर्भाव तथा उसके अङ्क में निवेश असम्भव नहीं है। साथ ही देवता विग्रहवान् होते हैं। देवता स्वेच्छानुसार दिव्य लीलाविग्रह धारण कर सकते हैं। केन उपनिषद् में ब्रह्म का दिव्य अप्रधृष्य तेजोमय यक्षरूप में आविर्भाव श्रुत है। छान्दोग्य में आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष का हिरण्यश्मश्रु, हिरण्यकेश, पुण्डरीक- नेत्र तथा ज्योतिर्मय स्वरूप स्पष्टरूप से वर्णित है। मन्त्रसंहिताओं में भी नीलग्रीव शिव तथा त्रिविक्रम विष्णु का श्रीविग्रह वर्णित है। इसी दृष्टि से सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् विष्णु या ब्रह्मा का रामस्वरूप में एवं साधिष्ठान दिव्य-शक्ति का श्रीसीतारूप में आविर्भाव शास्त्र एवं युक्तितर्कसङ्गत है। श्रीकामिल बुल्के ने भी अपनी रामकथा में राम के लौकिक रूप का ही वर्णन किया है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि वेदों में कहीं भी श्रीराम का वर्णन नहीं है। यद्यपि दशरथ का वर्णन वेदों में है, यह वह स्वयं मानते हैं, परन्तु वे वेदशब्द से केवल मन्त्र-संहिता ही समझते हैं, जब कि पूर्वोत्तरमीमांसक, कल्पसूत्रकार तथा सभी मिताक्षरा प्रभृति निबन्धकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को ही वेद मानते हैं। उपनिषदों में पूर्णरूप से श्रीराम, श्रीसीता तथा श्रीकृष्ण, श्रीराधा, श्रीनृसिंह आदि का शुद्ध सच्चिदानन्दघन परब्रह्म होना अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस विषय में रामतापनीय, रामरहस्य, रामतारसार, गोपालतापनीय, नृसिंह- तापनीय आदि उपनिषदें द्रष्टव्य हैं। मन्त्र भाग में भी रामादि दिखाये जा चुके हैं। जो ईसाई श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य चरित्रों पर विश्वास नहीं करते उन्हें बाइबिल में वर्णित ईसा के दिव्य चरित्रों को भी मिथ्या मानना पड़ेगा। फिर कुमारी के उदर से ईसा का आविर्भाव भी कैसे सिद्ध होगा ? कुमारीगर्भसंभूत ईसा ईश्वरपुत्र है ? या किसी नारकादि विशेष के सम्बन्ध से विवाह के पूर्व ही किसी कुमारी से ईसा की उत्पत्ति हुई, इसका निर्णय कैसे हो सकेगा ? रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता “यदुवाच न तन्मिथ्या यद्ददौ न जहार तत् । सोऽभूद् भग्नव्रतः शत्रूनुद्धृत्य प्रतिरोपयन् ॥” ( रघुवं० १७।४२ ) महाराज अतिथि ने दान और रक्षा के विषय में जो कुछ कहा वह मिथ्या नहीं हुआ, जो उन्होंने दान दे दिया उसका अपहरण नहीं किया। हाँ, एक ही विषय में उनका व्रत टूटा जो उन्होंने शत्रुओं को उजाड़कर पुनः बसाया। “वयोरूपविभूतीनामेकैकं मदकारणम् । तानि तस्मिन् समस्तानि न तस्योत्सिषिचे मनः ॥” ( रघुवं० १७।४३ )

३०० रामायणमीमांसा नवम अवस्था ( यौवन ), रूप ( सौन्दर्य ), विभूति ( धनसम्पत्ति ) इनमें से एक एक भी गर्व का कारण होता है । अतिथि में ये सभी वस्तुएं थीं, परन्तु उनका मन गर्वीला नहीं हुआ । “तपो रक्षन् स विघ्नेभ्यस्तस्करेभ्यश्च सम्पदः । यथास्वमाश्रमैश्चक्रे वर्णैरपि षडंशभाक् ॥” ( रघुवं० १७।६५ ) विघ्नों से तपस्वियों के तप की तथा चोरों से प्रजाओं की सम्पत्ति की रक्षा करने के कारण उस महाराज अतिथि को ब्राह्मणादि वर्णों, ब्रह्मचारी आदि आश्रमियों ने अपने-अपने तप और सम्पत्ति के छठे हिस्से का भागी बना दिया । “खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः सस्यं वनैर्गजान् । दिदेश वेतनं तस्मै रक्षासदृशमेव भूः ॥” ( रघुवं० ७१।६६ ) रक्षा के अनुरूप ही पृथ्वी ने खानों से रत्न, खेतों से अन्न और वनों से हाथियों का उत्पादन कर उस राजा अतिथि के लिए वेतन दिया । “स गुणानां बलानाञ्च षण्णां षण्मुखविक्रमः । बभूव विनियोगज्ञः साधनीयेषु वस्तुषु ॥” ( रघुवं० १७।६७ ) कार्तिकेय के समान पराक्रमी वह राजा अतिथि सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों एवं मूल भृत्यादि बलों का प्रयोजन के अनुसार विनियोजन का यथार्थ ज्ञाता था । “कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि तस्मिन् सन्मार्गयोधिनि । भेजेऽभिसारिकावृत्ति जयश्रीर्वीरगामिनी ॥” ( रघुवं० १७।६९ ) वह राजा अतिथि कूटयुद्ध का विशेषज्ञ होता हुआ भी अपनी वीरता के कारण सरल धार्मिक युद्ध ही करता था । विजयश्री अभिसारिका के समान उसका स्वयं वरण करती थी, कारण वह वीर पुरुष के ही पास पहुँचती है । “प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः समुद्रोऽपि तथाविधः । स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूत्ताविव क्षयी ॥” ( रघुवं १७।७१ ) चन्द्रमा बढ़कर क्षीण होता है और उसी तरह समुद्र भी बढ़कर क्षीण होता है । राजा अतिथि उनके समान बढ़ा अवश्य पर उनके समान क्षीण नहीं हुआ । “स्तूयमानः स जिह्लाय स्तुत्यमेव समाचरन् । तथापि ववृधे तस्य तत्कारिद्वेषिणो यशः ॥” ( रघुवं० १७।७३ ) प्रशंसनीय कार्य करने पर भी यदि कोई अतिथि राजा की प्रशंसा करता था तो वह अपनी प्रशंसा सुन कर लज्जित ही होता था । प्रशंसकों का द्वेषी होने पर भी उसका यश बराबर बढ़ता ही गया । “इन्दोरगतयः पद्मे सूर्यस्य कुमुदेऽशवः । गुणास्तस्य विपक्षेऽपि गुणिनो लेभिरेऽन्तरम् ॥” ( रघुवं० १७।७५ ) कमल में चन्द्रमा की और कुमुद में सूर्य की किरणे प्रवेश नहीं पा सकती । परन्तु गुणवान् महाराज अतिथि के गुण शत्रुओं के यहाँ भी स्थान पाते थे । अर्थात् शत्रु भी उनके गुणों की प्रशंसा करते थे । “पराभिसन्धानपरं यद्यप्यस्य विचेष्टितम् । जिगीषोरश्वमेधाय धर्म्यमेव बभूव तत् ॥” ( रघुवं० १७।७६ )

अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता ३०१ अश्वमेधयज्ञ करने के लिए अतिथि राजा ने विजय की कामना से शत्रुओं के साथ छलछद्मप्रधान कर्म किया तथापि छल-छद्म धर्मयुक्त ही रहा। "अनित्याः शत्रवो बाह्या विप्रकृष्टाश्च ते यतः। अतः सोऽभ्यन्तरान्नित्यान् षट् पूर्वमजयद्रिपून् ॥” ( रघुवं० १७।४५ ) बाहर के शत्रु कार्यवशात् कभी शत्रु बन सकते हैं और कभी मित्र भी बन सकते हैं, अतः वे अनित्य शत्रु हैं तथा वे दूर भी रहते हैं, इसलिए अतिथि राजा ने अपने हृदय में रहनेवाले काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं के ऊपर पहले विजय प्राप्त की । “कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ॥” (रघुवं० १७।४७ ) पराक्रमरहित केवल नीति कायरता है और नीतिरहित केवल पराक्रम हिंसकपना है, अतः अतिथि ने नीति और पराक्रम दोनों का सम्बन्ध करके सफलता प्राप्त करने का निश्चय किया । “न तस्य मण्डले राज्ञो न्यस्तप्रणिधिदीधितेः । अदृष्टमभवत्किञ्चिद् व्यभ्रस्येव विवस्वतः ॥” ( रघुवं० १७।४८ ) गुप्तचरों का जाल बिछाने के कारण उस राजा अतिथि को अपने राज्य में कुछ भी वैसे ही अज्ञात नहीं था जैसे मेघरहित सूर्य को कुछ भी अज्ञात नहीं रहता । "परेषु स्वेषु च क्षिप्तैरविज्ञातपरस्परैः । सोऽपसर्पैर्जजागार यथाकालं स्वपन्नपि ॥” ( रघुवं० १७।५१ ) राजा अतिथि समयानुसार सोते हुए भी परस्पर अविज्ञात गुप्तचरों को शत्रु-देश में और अपने अधिकारियों में नियुक्त कर उनके द्वारा सब कुछ जानते रहते थे । “दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्तस्य रोद्धुरपि द्विषाम् । नहि सिंहो गजास्कन्धी भयाद् गिरिगुहाशयः ॥” ( रघुवं० १७।५२ ) राजा अतिथि स्वयं ही दूसरे (शत्रु) लोगों के किलों का अवरोधक था; अतिथि के किले का दूसरे अवरोध नहीं कर सकते थे । ऐसा कहना ठीक न होगा कि ऐसी स्थिति में उसे किले की क्या आवश्यकता थी ? कारण स्वभाव से ही राजा के लिए किला अपेक्षित होता है ! हाथियों के झुण्डपर आक्रमण करनेवाला सिंह भय से गिरिगुहा में नहीं सोता, किन्तु स्वभाव से ही सोता है । “भव्यमुख्याः समारम्भाः प्रत्यवेक्ष्या निरत्ययाः । गर्भशालिसधर्माणस्तस्य गूढं विपेषिरे ॥” (रघुवं० १७।५३) राजा अतिथि के कार्य कल्याणप्रधान होते थे और वे आरम्भ करने के पहले उनपर भली भाँति विचार भी कर लेते थे, इसलिए उनमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं होती थी । जैसे धान के दाने भीतर ही भीतर परिपाक (फल) को प्राप्त होते हैं वैसे ही उनके काम भी गुप्तरूप से आरम्भ होकर पूर्ण हो जाते थे । “अपथेन प्रवृवृते न जातुपचितोऽपि सः । वृद्धो नदीमुखेनेव प्रस्थानं लवणाम्भसः ॥” ( रघुवं० १७।५४) अतिथि समृद्ध होने पर भी अपथ से नहीं चले अर्थात् मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया । ज्वार आने पर समुद्र नदी-प्रवेश के मार्ग से ही बढ़ता है, दूसरे मार्ग से नहीं ।

३०२ रामायणमीमांसा नवम “शक्येष्वेवाभवद्यात्रा तस्य शक्तिमतः सतः। समीरणसहायोऽपि नाम्भःप्रार्थी दवानलः॥” ( रघुवं० १७।५६ ) अतिथि यद्यपि शक्तिसम्पन्न थे तथापि अपने से हीन शक्तिवाले राजाओं के ऊपर ही उन्होंने आक्रमण किया। दवाग्नि वायु की सहायता पाकर भी जलाने के लिए तृण, काष्ठादि की ही अपेक्षा रखती है, जल की नहीं । “न धर्ममर्थकामाभ्यां बबाधे न च तेन तौ। नार्थं कामेन कामं वा सोऽर्थेन सदृशस्त्रिषु ॥” ( रघुवं० १७।५७ ) अतिथि ने अर्थ और काम परायण होकर धर्म को खतरे में नहीं डाला । न तो धर्मपरायण होकर अर्थ और काम को हो सङ्कट में डाला । काम से अर्थ और अर्थ से काम को उन्होंने पीड़ित नहीं किया । वह धर्म, अर्थ और काम तीनों में समवर्ती रहे । “हीनान्यनुपकर्तॄणि प्रवृद्धानि विकुर्वते । तेन मध्यमशक्तीनि मित्राणि स्थापितान्यतः॥” ( रघुवं० १७।५८ ) क्षीणशक्ति मित्र उपकार नहीं कर सकता और बढ़ा हुआ मित्र विकृत हो सकता है, इसलिए अतिथि ने मध्यमशक्ति मित्रों की स्थापना की । “परात्मनोः परिच्छिद्य शक्त्यादीनां बलाबलम् । ययावेवमबलिष्ठश्चेत् परस्मादास्त सोऽन्यथा ॥” ( रघुवं० १७।६० ) अतिथि अपने और शत्रु के देश, काल, शक्ति और परिस्थिति का बलाबल पहले निश्चित करते थे । बलवान् होने पर आक्रमण करते थे अन्यथा सन्धि आदि की वार्ता से शत्रुओं को सान्त्वना देते हुए अपने यहाँ रहते थे । “कोशेनाश्रयणीयत्वमिति तस्यार्थसङ्ग्रहः । अम्बुगर्भो हि जीमूतश्चातकैरभिनन्द्यते ॥” ( रघुवं० १७।५९ ) खजाने से ही दुनिया में आदर होता है, इसलिए अतिथि ने खजाने का संग्रह किया, क्योंकि जलपरिपूर्ण मेघ का ही चातक अभिनन्दन करता है । “परकर्मापहः सोऽभूदुद्यतः स्वेषु कर्मसु । आवृणोदात्मनो रन्ध्रं रन्ध्रेषु प्रहरन् रिपून् ॥ ( रघुवं० १७।६१ ) अतिथि सदा शत्रुओं के कार्यों में रोड़ा अटकाता हुआ अपने कर्म में सदा उद्यत रहता रहा । शत्रुओं के रन्ध्र में प्रहार करता हुआ वह अपना रन्ध्र सदा छिपाये रहता था । “सर्पस्येव शिरोरत्नं नास्य शक्तित्रयं परः । स चकषं परस्मात्तदयस्कान्त इवायसम् ॥ ( रघुवं० १७।६३ ) सर्प के सिर के रत्न को जैसे कोई खींच नहीं सकता वैसे ही अतिथि की तीनों शक्तियों ( प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति ) को किसी ने नहीं खींचा, किन्तु चुम्बक जैसे लोहे को खींच लेता है वैसे ही अतिथि ने शत्रुओं की तीनों शक्तियों को खींच लिया ।

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०३ तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता बुल्के के अनुसार "तत्त्वसंग्रहरामायण की रचना १७वीं शती ई० की है। इसके रचयिता रामब्रह्मानन्द हैं। इनका रामायणतत्त्वदर्पण ग्रन्थ भी है। तत्त्वसंग्रहरामायण में राम के ब्रह्मत्व पर प्रकाश डाला गया है। इसमें राम को विष्णु के अतिरिक्त शिव-ब्रह्मा-हरिहर त्रिमूर्ति परब्रह्म का भी अवतार माना गया है। तदनन्तर रामायण के गायत्रीस्वरूप का भी स्पष्टीकरण किया है। इसके पश्चात् शिव-पार्वती-संवाद के रूप में समस्त रामकथा का वर्णन हुआ है। इसमें राम की दास्यभक्ति के अतिरिक्त अद्वैतरामोपासना का भी उल्लेख है। कई तीर्थों का महत्त्व सिद्ध करने के लिए उनका सम्बन्ध राम से जोड़ा गया है जैसे वाराणसी, गया, गोदावरी, धनुष्कोटि तथा रंगनाथ। इस रचना के निम्न लिखित प्रसङ्ग धर्म-खण्ड पर आधारित हैं। सीता-स्वयंवर में शिव की उपस्थिति, कैकेयी का पश्चात्ताप, सीता-हरण, हस्तरेखा दिखाने के लिए सीता का रखवाली के लिए लक्ष्मण द्वारा खींची हुई रेखा का उल्लङ्घन कर रावण के निकट जाना, अशोकवन में रावण-सीता-संवाद के समय हनुमान्जी का प्रकट होना, रावण पर प्रहार करना तथा मृत्यु द्वारा मायासीता का रूप धारण करना। निम्नोक्त विशेषताएँ तत्त्वसंग्रहरामायण की हैं- वाल्मीकि-कथा का परिवर्तित रूप, गङ्गा-तट पर उनकी तपस्या के फलस्वरूप सीता को अपने आश्रम में शरण देने की वरप्राप्ति ( २।२२-३०;७,६ ) । सुतीक्ष्ण के आश्रम से बिदा लेते समय सीता भूमिदेवी से रत्नजटित पादुकाओं का एक जोड़ा ग्रहण करती हैं। उन्हें पहनकर राम पादपीड़ा तथा भूख-प्यास से मुक्त होते हैं। मायासीता का वृत्तान्त, जिसके अनुसार वास्तविक सीताजी रामजी के वक्षःस्थल में अव्यक्तरूप से रहती हैं। रावण और जटायु का युद्ध। राम का सुग्रीव को अपना शिवरूप दिखाना। हनुमान् की जन्म-कथा, जिसके अनुसार पार्वती उनकी माता मानी जाती हैं ( ४।१३ ) । सीता द्वारा शतानन रावण का वध ( ७।१-२ ) । जनक के पूर्वजन्म की कथा। उक्त दोनों रामायण पुराणों, रामायणों तथा परम्पराप्राप्त कथाओं पर निर्भर हैं।" राम का परब्रह्म होना तो उपनिषदों एवं वाल्मीकि- रामायण, अध्यात्मरामायण आदि पर ही निर्भर है। राम की शिवरूपता भी उपनिषदों पर निर्भर है। ईश्वर होने से त्रिमूर्तिरूपता राम की सुतरां सिद्ध हो जाती है। राम की अद्वैतोपासना भी उपनिषदों में वर्णित है। लक्ष्मण की रेखा की कथा अति प्राचीन परम्पराप्राप्त है। भिक्षा देने के प्रसङ्ग से भी सीता का रेखा से बाहर जाने की कथा प्रसिद्ध है। अवश्य ही सीता को अपने आश्रम में शरण देने की वरप्राप्ति की बात महत्त्वपूर्ण है और वह बिना तपस्या के संभव नहीं थी। किसी कल्प में अशोकवनिका में हनुमान् का प्रकट होकर रावण पर प्रहार करना संभव है। जो वस्तु वेद, रामायण, पुराण, भारत आदि से विरुद्ध न हो और परम्परा से श्रुत हो वही वैदिक सनातनधर्म में प्रमाणरूप से ग्राह्य होती है। इसी लिए प्रत्यक्ष श्रुति में इसका संकेत किया है- इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे। ( ईशा० उ० १० ) इसी कोटि में भूमिदेवी से रत्नजटित पादकाओं की प्राप्ति भी आ सकती है। राम तथा सीता का अभेद और राम में सीता का निवास आदि परम्पराप्राप्त है। अतएव तुलसी के रामचरितमानस में भी उसका संकलन किया गया है- तुम पावक मँह करहु निवासा। जब लगि करहु निशाचर नासा ॥ ( रा० मा० ३।२३।२ ) हनुमान् का पार्वती-पुत्र होना तथा शङ्कर का पुत्र होना भी प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध हनुमान् चालीसा में- "शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महाजगवन्दन ॥" कहा गया है। शतानन रावण के वध का भी अद्भुतरामायण आदि में सङ्केत है।

३०४ रामायणमीमांसा नवम काल-निर्णय रामायण १७९ वें अनु० में बुल्के ने काल-निर्णय रामायण की चर्चा की है जिसमें राम-कथा को प्रधान घटनाओं की तिथियों का उल्लेख है । परन्तु यह तो सर्वथा प्राचीन ही है । वाल्मीकिरामायण के टीकाकार नागेश भट्ट आदि इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर रामकथा की घटनाओं का काल-निर्धारण करते हैं । स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड में धर्मारण्य- खण्ड के तीसवें अध्याय तथा पद्मपुराण में पातालखण्ड के ३६ वें अध्याय में यह सब वर्णन है । पद्मपुराण में महर्षि लोमश वक्ता हैं । अग्निवेश के नाम से भी एक अन्य रामायण प्रचलित है । वे भी ऋषि हैं । वह रामायण भी, जो कि वेंकटेश प्रेस के अनुसार १०५ श्लोकों का है, प्रामाणिक है । समयादर्शरामायण लक्ष्मीनारायण प्रेस से प्रकाशित १०३ श्लोकों का है । समयनिरूपणरामायण वेंकटेश प्रेस से प्रकाशित ४५ श्लोकों का है । अग्निवेशकृत रामायण का राजेन्द्रलाल मिश्र के कैटलाग में ( भाग ७ पृष्ठ ५८ ) तथा रामायणरहस्य या रामहृदयम् का (भाग ८ पृष्ठ १२५) उल्लेख है । इस रचना का विस्तार २७७ श्लोकों में बताया गया है । तँजोर कैटलाग में अग्निवेश कृत ५०० श्लोकों के विस्तारवाले रामजातकम् का उल्लेख है । अग्निवेशरामायण में विवाह के समय राम और सीता की अवस्था क्रमशः १५ तथा ६ वर्ष की थी, वनवास के समय २७ और १८ वर्ष की थी एवं राज्याभिषेक के समय ४२ और ३३ वर्ष की थी । इसी तरह अम्बररामायण (दे० कल्याण का रामायणाङ्क पृ० ३०४ ), व्यासकृत रामायणतात्पर्यदीपिका ( मद्रास कैटलाग, नं० आर १५१८ ), रामावतारकालनिर्णय-सूचिका (मद्रास कैटलाग, नं० टी १९०९), श्रीनिवास- राघवकृत रामायणसंग्रह ( मद्रास कैटलाग नं० आर० २२३४ ) में भी उपर्युक्त विषयों का वर्णन है । १८० वें अनु० में बुल्के ने अर्वाचीन रामकथा-साहित्य में बहुसंख्यक रामायणों का उल्लेख किया है । आनन्दरामायण के अनुसार वाल्मीकिरामायण से ही अनेक रामायणों का प्रादुर्भाव हुआ है । बुल्के कहते हैं उनमें अधिकांश कल्पित हैं । पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि यदि उनकी रचना हुई भी हो तो इसमें बहुत सन्देह नहीं है कि ये ग्रन्थ अपेक्षाकृत अर्वाचीन हैं । परन्तु उनका यह कथन भी अर्ध सत्य ही है, क्योंकि उनमें से बहुत रामायण प्राचीन ही हैं । भुशुण्डिरामायण या मूलरामायण तथा आदिरामायण का उल्लेख अधिक होता है । कहा जाता है कि इसकी हस्तलिपि श्रवणकुञ्ज अयोध्या में तथा लक्ष्मणकिला में सुरक्षित है । उसमें पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर चार खण्ड है । बुल्के के अनुसार वे स्वयं तो मूल प्रति नहीं देख सके, परन्तु डाक्टर भगवतीप्रसादसिंह को इसकी पूरी प्रति मिली है । बड़ौदा ओरिएण्टल इंस्टिट्यूट में उसके दक्षिण, पश्चिम और उत्तर खण्डों की अर्वाचीन हस्तलिपियाँ विद्यमान हैं । जयपुर में दो रामायण हैं, जिनके वक्ता भुशुण्डि हैं, एक आदिरामायण और दूसरा ब्रह्मरामायण । इनमें रामजी की रास-लीलाओं का वर्णन है । इण्डिया आफिस के चित्रकूटमाहात्म्य की हस्तलिपि में रचना अथवा लिपिकाल का उल्लेख नहीं है । पर यह मेकेंजी महोदय के संग्रह की है । अतः कम से कम डेढ़ सौ वर्ष पुरानी है । परन्तु इतनेमात्र से भुशुण्डिरामायण आदि की अर्वाचीनता और अनार्षता सिद्ध नहीं होती है । प्राचीनकाल में ग्रन्थ लिपि सुरक्षित रखने की पद्धति बहुत कम प्रचलित थी, अतः प्राचीन से प्राचीन ग्रन्थों की भी सुरक्षित हस्तलिपि का मिलना असम्भव है । इसमें भरत-अत्रि-संवाद भुशुण्डि द्वारा शाण्डिल्य को सुनाया गया है । श्रोता और वक्ता के अति प्राचीन होने के कारण मूल कथा की प्राचीनता स्पष्ट ही सिद्ध है । उसके अनुसार चित्रकूट के सान्तानिक वन में एक सरोवर है । उसके मध्य में एक रम्य मण्डप है । जहाँ एक वेदिका पर सीता एवं उनकी सखियों के साथ राम रास- लीला करते हैं । डा० भगवतीप्रसाद अपने "रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय" में भुशुण्डिरामायण के कथानक के विषय

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०५ में लिखते हैं कि रावण द्वारा भेजे गये राक्षस बाल्यावस्था में ही राम को समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु वे स्वयं मारे जाते हैं। उनके डर से दशरथ राम को गुप्त स्थान पर भेज देते हैं। सरयूपार गोपप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित और उनकी पत्नी मांगल्या राम का पालन-पोषण करते हैं। विवाह के पूर्व अयोध्या के प्रमोदवन में देवावतार गोपियों एवं परा शक्ति सीता के साथ राम रास-लीला करते हैं। मिथिला पहुँच कर एक पक्षी द्वारा वे सीता के पास अपना एक चित्र भेजते हैं। चित्रदर्शन से सीता उन्हें प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित होती हैं। दशरथ के अश्वमेधयज्ञ में विजित राजाओं की सहस्रों कन्याओं को वे (राम) स्वीकार करते हैं। चित्रकूट में गोप और गोपिकाओं के संग रास-क्रीड़ा का आयोजन होता है। सीता के अतिरिक्त सहजा सखी का भी राम की पत्नी के रूप में उल्लेख है। सहजा भी जनकवंशीय कन्या कही गयी है। सीता ज्ञानपरक भक्ति और सहजा प्रेमा भक्ति की प्रतीक कही गयी हैं (दे० पृष्ठ ९७ रामभक्ति में रसिकसम्प्रदाय)। बुल्के आदि ऐसे कथनों को अत्यन्त अर्वाचीन और कृष्णलीला का अनुकरणमात्र मानते हैं। परन्तु यह पाश्चात्यों की अशुद्ध विचारपद्धति है। वास्तविक दृष्टि नहीं है। वैदिक ऋषियों की दृष्टि से कोई भी कथावस्तु नवीन नहीं है। वेद, पुराण आदि अनादि हैं। अनादि ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि की कथाएँ हैं। कृष्णोपनिषत् के अनुसार तो अनेक साधक राम के वरदान से ही कृष्णावतार में गोपीभाव प्राप्त कर सके हैं। नारदपाञ्चरात्र आदि आगमों में भी राम को कृष्ण से पहले का माना गया है। फिर जन्मान्तर में कृष्ण भी राम से और पहले के हैं। तभी तो वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्णरूप भी कहा गया है— 'कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।' (वा० रा० ६।११९।१५) अवश्य ही एकपत्नीव्रत मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामजी के सम्बन्ध में उक्त चरित्र सङ्गत नहीं दिखते हैं। तथापि कल्पभेद से राम के साथ उक्त चरित्रों का सम्बन्ध असम्भव नहीं है। १८१वें अनु० में कहा गया है कि महारामायण का भी रामदासकृत हिन्दुत्व में उल्लेख है। इसके पाँच अध्याय (४७-५२) अयोध्या में संवत् १९८५ में छपे हैं। इसमें रामचरणों की ४८ रेखाओं का उल्लेख एवं रामो- पासकों के संस्कारों का वर्णन है। जिनमें एक धनुर्बाण-संस्कार है। राम के अक्षरातीत ब्रह्म होने के साथ उनकी सखी- भाव से उपासना करने का उल्लेख है। सीता की ३३ शक्तियों की नामावली तथा उनके कार्यों का वर्णन है। राम- नाम-माहात्म्य के प्रसङ्ग में रमु धातु से रामनाम की व्युत्पत्ति का प्रतिपादन तथा रास-क्रीड़ा का उल्लेख है। बुल्के के अनुसार सम्भव है यह भुशुण्डिरामायण से अभिन्न हो। परन्तु बुल्के का उक्त कथन असङ्गत एवं निष्प्रमाण है। अनादिकाल से विभिन्न सम्प्रदायों में राम की उपासना होती आयी है। तदनुसार रामायण के सम्बन्ध में विभिन्न आर्ष पद्धतियाँ हैं। समुचित हेतु के बिना किसी को अप्रामाणिक एवं अर्वाचीन कहने का साहस पाश्चात्य एवं तदनुयायी ही कर सकते हैं। १८२वें अनु० में मन्त्ररामायण की चर्चा बुल्के ने की है। उसमें रामायण के वेदमूलकत्व का प्रतिपादन किया गया है। "वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥" यह लव-कुश द्वारा विहित मङ्गलाचरण का श्लोक रामायणपाठकों की परम्परा में प्रचलित है। इसका अर्थ है—वेदवेद्य परमेश्वर जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तो साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि से रामायण के रूप में प्रकट हुए। ३९

३०६ रामायणमीमांसा नवम मन्त्ररामायण के आधार पर नीलकण्ठ ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक के सम्पूर्ण चरित्रों का वर्णन किया है। ऋक्संहिता के दशवें मण्डल के ९९वें सूक्त में आर्ष 'वभ्र' का उल्लेख है। 'वभ्र' वाल्मीकि ही हैं। इन्द्र, राम, रुद्रगण, हनुमान् तथा उनके साथियों आदि का वर्णन है। बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं— “नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति ।” (पृ० २६) बुल्के ने मन्त्ररामायण को समझने का प्रयत्न नहीं किया । नीलकण्ठजी ठीक ही कहते हैं कि यह स्थाणु का अपराध नहीं है जो कि अन्धा उसे नहीं देखता । वेदमन्त्र विशेषतः ऋग्वेद के मन्त्र बहुत कठिन हैं। इसलिए निरुक्त, निघण्टु तथा ब्राह्मण और सूत्र का आश्रय लेकर ही उनका अर्थ किया जाता है। पुराणों तथा महाभारत में कहा गया है कि वेद अल्पश्रुत से डरता है कि वह बेसमझ अवश्य मुझपर, अर्थ का अनर्थ कर, प्रहार करेगा । “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” इसी लिए इतिहासपुराणों द्वारा वेदों का उपबृंहण कहा गया है। वाल्मीकिरामायण में भी कहा गया है कि वेदों के उपबृंहणार्थ ही वाल्मीकि ने लव और कुश को रामायण महाकाव्य पढ़ाया था— “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” (वा० रा० १।४।६ ) नीलकण्ठ ने प्रमाणों के आधार पर मन्त्रों की व्याख्या करते हुए रामचरित का वर्णन किया है। उलटे बुल्के ने ही मन्त्रार्थ न समझकर “दशरथस्य शोणाः” दशरथशब्दमात्र के आधार पर ऋक्संहिता में राजा दशरथ का उल्लेख मान लिया है। इसी लिए बुल्के का साहस नहीं हुआ कि नीलकण्ठ के किसी मन्त्र के व्याख्यान का उद्धरण करके उसमें दोष दिखा सकें । मन्त्ररामायण की संक्षिप्त व्याख्या पृथक् देखें । बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के प्रथम श्लोक में गायत्रीस्वरूप का उल्लेख किया गया है । गायत्रीरामायण विद्यारण्यकृत रामायणरहस्य ( श्रीशङ्करगुरुकुल-पत्रिका भाग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (बालकाण्ड सर्ग ५) गोविन्द- राजकृत भूषण टीका आदि में रामायण के गायत्रीस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। तर्क यह है कि रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है। “प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।” ( रामायणरहस्य ६३ ) बुल्के कहते हैं, वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता है । विद्यारण्य ने वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्रीस्वरूप कहा है। “गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम् ।” परशुराम ने क्यों क्षत्रियों का नाश किया और फिर भी क्षत्रिय-वंश का नाश क्यों नहीं हुआ ? राम के इन प्रश्नों का समाधान करते हुए वाल्मीकि ने वेदान्तरामायण कहा है। इसमें परशुराम के चरित्र का वर्णन है । इसका प्रकाशन, लहरी प्रेस, बनारस (सं १९१४) में हुआ है। हिन्दुत्व में वस्तीनिवासी पं० धनराजशास्त्री की दी हुई टिप्पणी के आधार पर १९ रामायणों की कथावस्तु का संक्षिप्त परिचय दिया है। जैमिनिभारत १८५ वाँ अनु० : जैमिनिभारत या जैमिनीयाश्वमेध की रचना बुल्के के अनुसार “भागवतपुराण के बाद १३वीं शती पूर्व की है, क्योंकि जैमिनीयाश्वमेध में भागवत का उल्लेख है तथा इसका १३वीं शती में कन्नड भाषा में अनुवाद हुआ है। इसका मुख्य विषय युधिष्ठिर के अश्वमेध का वर्णन है। इसमें कुशलवोपाख्यान अ० २५-३६ में

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०७ दिया गया है। इसके अनुसार धोबी द्वारा सीतानिन्दा के फलस्वरूप सीतात्याग, कुश और लव का जन्म तथा यज्ञाश्व के कारण राम सेना से युद्ध, अनन्तर राम और सीता का सम्मिलन वर्णित। यह सुखान्त रामकथा पद्मपुराण के पातालखण्ड के वृत्तान्त से मिलती जुलती है।” वस्तुतः जैमिनीयाश्वमेध आर्ष ग्रन्थ है। भागवत के नामोल्लेखमात्र से वह अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि प्रायः सभी पुराणों में सभी पुराणों के नाम हैं। जो कि सर्वज्ञकल्प व्यासजी के द्वारा ही सम्भव हैं। जैमिनि व्यास के शिष्य तथा उनके समकाल के ही हैं। मैरावणचरित (मद्रास मैनुस्क्रिप्ट कैटलाग नं० डी २०८२) अथवा हनुमद्विजय (वही, डी १२२१५) के अध्यायों की पुष्पिका में इसे 'जैमिनिभारत' का एक अंश माना गया है। इसमें मैरावण पर रुद्रांश हनुमान् की विजय का वर्णन अगस्त्य द्वारा सुनाया गया है। मेघनाद-वध के बाद मैरावण राम तथा लक्ष्मण को पाताल ले जाता है। हनुमान् अपने पुत्र मत्स्यराज या मकरध्वज की सहायता से मैरावण का वध करके राम और लक्ष्मण को फिर से युद्धभूमि में लाते हैं। रामचरितमानस के क्षेपकों में भी इस कथा का उल्लेख है। थाईलैण्ड की रामकीर्ति में भी इसका उल्लेख है। मूलतः यह कथा भी आर्ष है। सहस्रमुखरावणचरित्रम् (मद्रास कैटलाग डी २०९८) यह रचना भी महाभारत के आश्रमवासिपर्व का एक अंश मानी जाती है। अद्भुतरामायण के वृत्तान्त से इसकी कथावस्तु मिलती जुलती है। रावण पर सीता की विजय के विषय में हस्तलिपियों का भी पता चला है। सीताविजय, जो वसिष्ठोत्तररामायण का एक भाग है, में सीता की शतस्कन्ध रावण पर विजय का वर्णन है। सत्योपाख्यान "सत्योपाख्यान (वेंकटेश्वर प्रेस) में वाल्मीकि-मार्कण्डेय-संवाद वर्णित है। इसकी कथावस्तु से पता चलता है कि यह अध्यात्मरामायण के बहुत बाद की रचना है जब रामकथा तथा रामभक्ति पर कृष्णलीला का गहरा प्रभाव पड़ने लगा था।” बुल्के का यह कथन निराधार है, क्योंकि इसका पीछे खण्डन हो चुका है। उसमें राम, लक्ष्मण आदि विष्णु, शेष, सुदर्शन एवं शङ्ख के अवतार हैं, यह उल्लेख (अध्याय १-२) करने के पश्चात् मन्थरा कैकेयी-संवाद दिया गया है, जिसमें दशरथ और कैकेयी के विवाह की चर्चा है (अध्याय ३-९)। तदुपरान्त मन्थरा के पूर्व जन्म की कथा का वर्णन है जिसके अनुसार वह दैत्य विरोचन की पुत्री थी। विष्णु की आज्ञा से इन्द्र द्वारा वज्र से मारी गयी थी (अध्याय १०-१५)। पूर्वार्द्ध के शेष अध्यायों (१६-४९) में राम की बाललीला का विस्तार से वर्णन है। इसकी विशेष कथाएँ यों हैं—देवताओं का अयोध्या में आगमन, दशरथ द्वारा उनका स्वागत (अध्याय १७-२३)। काकभुशुण्डि का राम की रोटी (शष्कुली) चुराना, बाद में राम से क्षमा मांगना, राम में निश्चल भक्ति की प्रार्थना करना एवं उनके द्वारा गरुड़ को रामतत्त्व सिखलाने का उल्लेख है (अध्याय २६)। जिन ग्रन्थों में राम की भक्ति का वर्णन होगा, बुल्के उन्हें अपनी कसौटी के अनुसार अर्वाचीन कहेंगे। इसका क्या इलाज ? परन्तु आस्तिक लोग तो वाल्मीकिरामायण को भी रामभक्ति का ही ग्रन्थ मानते हैं। पर बुल्के उसमें भी भक्तिवाले अंश को अर्वाचीन प्रक्षेप मान लेते हैं। वस्तुतः यह उनकी कुनीयतमात्र है। कोई विचार नहीं है। तुलसी के रामचरितमानस में काकभुशुण्डि-गरुड़संवाद की कथा प्रसिद्ध है। राम की बाललीलाओं का भी वहाँ वर्णन है। रत्नमाला और उसके पति का वृत्तान्त, अगले जन्म में उनको नन्द और यशोदा बनने का आश्वासन (अध्याय २९, ३०)। राम का गुह से मृगया की शिक्षा पाना (अध्याय ४३ में) है। उत्तरार्द्ध में सीता-स्वयंवर का वर्णन किया गया है। उसमें प्रहस्त की उपस्थिति का उल्लेख भी किया गया है। सीता-राम के विवाह के बाद

३०८ रामायणमीमांसा नवम उनकी तीर्थयात्रा का वर्णन है। जल-विहार, वन-विहार, सीता की मानलीला, होलिकोत्सव आदि शृङ्गारात्मक वर्णन किये गये हैं। इन्हीं अंशों को देखकर बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् श्रीकृष्ण-लीला का प्रभाव मान लेते हैं। परन्तु यह कल्पना निराधार है। राम अवतार श्रीकृष्ण से पहले हुआ। उनकी स्वतन्त्र लीलाएँ हैं। वेदमन्त्र सभी अनादि हैं तो भी मन्त्रों की तुल्यता देखकर उनको एक दूसरे से प्रभावित नहीं कहा जा सकता है। पुरुषसूक्त प्रायः विभिन्न संहिता में हैं। उनमें बहुत कुछ तुल्यता है ही। धर्मखण्ड १८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "धर्मखण्ड की कई हस्तलिपियाँ मद्रास के राजकीय ओरिएण्टल पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। यह रचना स्कन्दपुराण का एक अंश है। इसका रचनाकाल १५वीं या १६वीं शती प्रतीत होता है।" कालनिर्णयसम्बन्धी पूर्व वर्णित अनुमानों के तुल्य यह अनुमान भी निराधार है। स्कन्दपुराण का अंश होने से इसे भी व्यास की कृति ही मानना समुचित है। इस रामकथा में शिव को विशेष रूप से महत्त्व दिया गया है। सीता-स्वयंवर में पार्वती के साथ शिवजी रामजी को धनुष तोड़ने का आदेश देते हैं। इसमें राम और शिव की अभिन्नता दिखलायी गयी है। वनवास के समय शिव ब्राह्मण का रूप धारण कर उनसे मिलते हैं। संवाद में राम सुस्पष्ट शब्दों में अपना तथा शिव का अभेद व्यक्त करते हैं— “शिवं मां प्रतिजानीहि नावयोरन्तरमण्व् ।” ( अध्याय ३८ ) अन्यत्र राम ने हनुमान् को भेजते समय उनसे कहा था कि तुम शिव के अवतार हो और मैं स्वयं शिव हूँ ( अ० ९८)। धर्मखण्ड की रामकथा की निम्नोक्त विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं—कैकेयी का पश्चात्ताप ( अध्याय ३८ ), सीता-हरण का वृत्तान्त ( अध्याय ८१ ), अशोकवन में रावण-सीता-संवाद के समय हनुमान् का प्रकट होना तथा रावण को भगा देना ( अध्याय १०५ ) एवं मृत्यु द्वारा मायामयी सीता का रूप धारण करना ( अध्याय १३० )। उपनिषदों में भी राम और शिव का अभेद प्रतिपादित है। तुलसीदास ने भी अपने रामचरितमानस में राम और शिव का अभेद कहा है। उनके अनुसार शिवजी रामजी के सेवक, स्वामी तथा सखा भी हैं। ऐसे परम सिद्धान्त के प्रतिपादक ग्रन्थ को बुल्के आधुनिक कहते हैं, यह उनकी मनोवृत्ति का नमूना है। वे यह मानकर चलते हैं कि पहले राम एक अच्छे मनुष्य थे। लोग उन्हें मनुष्य ही मानते थे। उनका ईश्वर का अवतार होना यह बाद की कल्पना है। शिव और राम का अभेद उससे और भी बाद की कल्पना है। परन्तु उनका यह निर्णय भी निराधार है, क्योंकि वेद-उपनिषदों के अनुसार राम का परब्रह्म होना सिद्ध है, अतः शिव का उनसे अभिन्न होना स्वाभाविक है। ईश्वर एवं उसका अवतार होना यह मन्त्रों एवं ब्राह्मणों और उपनिषदों से सिद्ध ही है। हनुमत्संहिता १९०वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "हनुमत्संहिता की सं० १७१५ की एक हस्तलिपि का उल्लेख राजेन्द्र- लाल मित्र के कैटलाग में किया गया है ( भाग ७ पृ० २५० )। इस रचना का महारासोत्सव के नाम से सन् १९०४ में लखनऊ से प्रकाशन हुआ है। इसमें हनुमान् और अगस्त्य के संवाद के रूप में सरयू-तट पर राम की रासलीला तथा जल-विहार का वर्णन है। इसमें सीता अपने शरीर से १८४०८ नारियों की सृष्टि करती हैं

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०९ तथा इनके साथ रास करने के लिए राम कृष्ण की भाँति उतने ही रूप धारण करते हैं। इसका विस्तार २६० श्लोकों का है।" बुल्के के अनुसार "रामकथा पर यह प्रभाव अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। फिर भी सं० १७१५ की हस्तलिपि से पता चलता है गोस्वामी तुलसीदासजी के जीवनकाल में उसका सूत्रपात अवश्य हो चुका होगा।" पर बुल्के की यह कल्पना निराधार है। यह कई बार कहा जा चुका है कि कृष्ण-लीलाओं के अनुसार भी वृन्दावन की रासलीला नित्य रासलीला का एक अंश ही है। गोलोकधाम में रासलीला नित्य प्रचलित है। वृन्दावन की रासलीला में भी मुख्य सिद्धान्त यही है कि श्रीराधा की कायव्यूहरूपा गोपाङ्गनाएँ ही नित्य रासलीला की परिकर हैं। भक्त अपने आप को भगवान् की लीलाओं का अङ्गोपाङ्ग बनाना चाहता है। वह चाहता है मैं कोटि-कोटि कानों से भगवान् का चरित्र सुनूँ, कोटि-कोटि नेत्रों से भगवान् का मङ्गलमय रूप देखूं, कोटि-कोटि हाथों से तथा कोटि-कोटि शरीरों से भगवान् की सेवा करूँ। इसी दृष्टि से सीता कोटि-कोटि देहों से भगवान् राम की लीलाओं को प्रोत्साहन देती हैं। ऐसी स्थिति में हनुमत्संहिता की कथावस्तु शुद्ध वैदिक सिद्धान्तों पर ही आधारित है। बृहत्कोसलखण्ड १९१वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "राजेन्द्रलाल मित्र के कैटलाग में उसकी एक हस्तलिपि सं० १९१४ का विवरण दिया गया है (भाग ९ पृ० ५२)। उन्होंने उसे बेतिया (चम्पारन) में देखा है। उसका विस्तार ३०७२ श्लोकों का बताया गया है। संवत् २००१ में लाहोर के श्रीरोशनलाल अग्रवाल ने हिन्दी टीकासहित इसकी १३० प्रतियाँ छपवायी थी। यह हिन्दी रसवर्धिनी टीका श्रीरामवल्लभीशरणजी महाराज की लिखी हुई है। वेदव्यासकृत बृहत्कोसलखण्ड ब्रह्मरामायण का अंश माना जाता है। इसके १५ अध्यायों का कथानक तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। १—विवाह के पूर्व राम की लीला (अ० १-५)। प्रारम्भ में यज्ञोपवीत संस्कार तथा विद्याभ्यास के पश्चात् सखा-रास का वर्णन किया गया है। राम के सखा, जिनमें रुद्र भी शामिल हैं, स्त्री का रूप धारण कर राम के साथ रास का आयोजन करते हैं (अध्याय १)। अनन्तर गोपिकाओं, देवकन्याओं और राजकन्याओं के साथ राम के रास का वर्णन किया गया है। किसी अवसर पर राम को देखकर गोपियों का मन आकर्षित हुआ और वे उनको पतिरूप में प्राप्त करने के उद्देश्य से तप तथा पार्वती की पूजा करने लगीं। पिता की आज्ञा लेकर राम शिकार करने के बहाने यमुना तट पर पहुँचते हैं। शिव की आज्ञा से निकुम्भ आँधी उत्पन्न करता है, जिसमें गोधन भाग जाता है तथा गोप उसका पीछा करते-करते चले जाते हैं। इतने में राम गोपियों के पास चले जाते हैं। उनके साथ वसन्तोत्सव मानते हैं तथा रासलीला भी करते हैं। इसमें लक्ष्मी, सरस्वती, उमा आदि मालिन का रूप धारण कर भाग लेती हैं। अन्त में गोपियों को बिदा कर राम अपने सखाओं को योगनिद्रा से जगाकर अयोध्या लौटते हैं (अध्याय २)। अगले अध्याय में दशरथ राम को दही का कर वसूल करने के लिए गोपों के यहाँ भेज देते हैं। वे राम को अपनी पुत्रियाँ समर्पित कर देते हैं। राम सबसे विवाह कर अयोध्या लौट आते हैं। अनन्तर सान्तानिक वन की लताओं से देवकन्याएँ प्रकट होकर राम के साथ विविध विलास करती हैं। अन्त में उनकी रासलीला का भी विधान होता है (अध्याय ३)। अब देवता अयोध्या पहुँचकर राम से निवेदन करते हैं कि वे उनकी कन्याओं को भी ग्रहण करें। इसके बाद दशरथ राम को शम्बरासुर का वध करने के लिए भेज देते हैं। राम उसका वैजयन्त नामक पुर घेरकर उसके पुत्र का वध करते हैं तथा शम्बरासुर द्वारा हरण की गयी राजा, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष आदि की कन्याओं को लेकर अयोध्या आते हैं। उनके साथ भी रासक्रीड़ा करते हैं (अध्याय ४,५)। २—राम और सीता का विवाह (अध्याय ६,७)। एक तपस्विनी से राम के कार्यों का वर्णन सुनकर अष्टवर्षीया सीता विरह से व्याकुल होने लगती हैं। महेश्वर जनक को स्वप्न में दिखायी पड़ते हैं और परामर्श देते

हैं कि स्वयंवर का आयोजन हो जो उनका धनुष चढ़ाने में समर्थ हो वही सीता का पति होने योग्य है। बहुत से राजा असफल होकर युद्ध करते हैं, किन्तु पराजय के बाद वे अपनी पुत्रियों को जानकी की सखी बनाने के लिए मिथिला में ले आते हैं। सीता राम का रूप धारण अपनी सखियों के साथ रास करती हैं (अध्याय ६)। नारद राम के पास जाकर सीता के वियोग का वर्णन करते हैं तथा उनके स्वयंवर का समाचार सुनाकर चले जाते हैं। शिव की प्रेरणा से विश्वामित्र राम तथा लक्ष्मण को मिथिला ले जाते हैं। वहाँ राम धनुष तोड़कर सीता को प्राप्त करते हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के भी विवाह होते हैं। ३—विवाह के पश्चात् राम की लीला (अध्याय ८-१५)। विवाह के बाद राम असंख्य कन्याओं के साथ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित प्रासाद में निवास करते हैं। समय-समय पर विविध उत्सव मनाते हैं। वन में जाकर रास-लीला करते हैं। बुल्के के अनुसार गोप-कन्या, देव-कन्या, गन्धर्व-कन्या, किन्नर-सुता, विद्याधर-कन्या, सिद्धकुमारी, राज- कन्या, साध्य-कन्या, यक्ष-कन्या तथा नागकन्याओं के सङ्ग रासलीला के वर्णन प्रसङ्गों में कृष्ण की रासलीला का स्पष्ट अनुकरण किया गया है। उदाहरणार्थ राम का बहुत से रूप धारण करना, अन्तर्धान हो जाना, सीता की मान-लीला आदि।" वस्तुतः— "राम अनन्त अनन्त गुनानी। अगणित जन्म कर्म नामानी ॥" (रा० मा० ७।५१।२) तुलसीदासजी के अनुसार राम के अनन्त अवतार तथा अनन्त लीलाएँ हैं। किसी कल्प में राम ने भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिए रासलीला की है। राम ब्रह्मस्वरूप हैं। प्राणिमात्र उनके अनन्त माधुर्य पर मुग्ध होते हैं। "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।" (गी० ११।४४) पुत्र पर पिता का जैसा, सखा पर सखा का जैसा एवं प्रिया पर प्रिय का जैसा भगवान् का अनुग्रह सब चाहते हैं। किसी कल्प में भगवान् राम ने अपने भक्तों की वाञ्छाएँ कृष्णावतार में पूरी की हैं और किसी कल्प में स्वयं अपने ही रूप में भक्तवाञ्छाकल्पद्रुम भगवान् ने भक्तवाञ्छा पूरी की है। इसमें कृष्ण के अनुकरण की कल्पना निराधार ही है। हिन्दुत्व में वर्णित रामकथा अनु० १९२ से अनु० २१०: हिन्दुत्व में प्रदर्शित रामायण में से महारामायण शङ्कर-पार्वती-संवादरूप ३,५०,००० श्लोकों का ग्रंथ है। इसमें कनकभवनविहारी राम की ९९ रासलीलाओं का वर्णन है। नारदकृत संवृतरामायण का विस्तार २४,००० श्लोकों का है। इसमें स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की तपस्या तथा दशरथ और कौशल्या के रूप में आविर्भाव का वर्णन है। लोमशरामायण लोमश ऋषि की कृति में ३२,००० श्लोक हैं। इसमें राजा कुमुद और वीरवती के दशरथ तथा कौशल्या के रूप में जन्म का वर्णन है। अगस्त्यरामायण १६,००० श्लोकों का है। इसमें भानुप्रताप अरिमर्दन की कथा है तथा राजा कुन्तल और सिन्धुमती का दशरथ और कौशल्या के रूप में जन्म वर्णित है। मञ्जुलरामायण सुतीक्ष्णकृत १,२०,००० श्लोकों का है। इसमें भानुप्रताप अरिमर्दन की कथा तथा शबरी के प्रति राम द्वारा नवधा भक्ति का वर्णन है।