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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 385, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 385

३०८ रामायणमीमांसा नवम उनकी तीर्थयात्रा का वर्णन है। जल-विहार, वन-विहार, सीता की मानलीला, होलिकोत्सव आदि शृङ्गारात्मक वर्णन किये गये हैं। इन्हीं अंशों को देखकर बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् श्रीकृष्ण-लीला का प्रभाव मान लेते हैं। परन्तु यह कल्पना निराधार है। राम अवतार श्रीकृष्ण से पहले हुआ। उनकी स्वतन्त्र लीलाएँ हैं। वेदमन्त्र सभी अनादि हैं तो भी मन्त्रों की तुल्यता देखकर उनको एक दूसरे से प्रभावित नहीं कहा जा सकता है। पुरुषसूक्त प्रायः विभिन्न संहिता में हैं। उनमें बहुत कुछ तुल्यता है ही। धर्मखण्ड १८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "धर्मखण्ड की कई हस्तलिपियाँ मद्रास के राजकीय ओरिएण्टल पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। यह रचना स्कन्दपुराण का एक अंश है। इसका रचनाकाल १५वीं या १६वीं शती प्रतीत होता है।" कालनिर्णयसम्बन्धी पूर्व वर्णित अनुमानों के तुल्य यह अनुमान भी निराधार है। स्कन्दपुराण का अंश होने से इसे भी व्यास की कृति ही मानना समुचित है। इस रामकथा में शिव को विशेष रूप से महत्त्व दिया गया है। सीता-स्वयंवर में पार्वती के साथ शिवजी रामजी को धनुष तोड़ने का आदेश देते हैं। इसमें राम और शिव की अभिन्नता दिखलायी गयी है। वनवास के समय शिव ब्राह्मण का रूप धारण कर उनसे मिलते हैं। संवाद में राम सुस्पष्ट शब्दों में अपना तथा शिव का अभेद व्यक्त करते हैं— “शिवं मां प्रतिजानीहि नावयोरन्तरमण्व् ।” ( अध्याय ३८ ) अन्यत्र राम ने हनुमान् को भेजते समय उनसे कहा था कि तुम शिव के अवतार हो और मैं स्वयं शिव हूँ ( अ० ९८)। धर्मखण्ड की रामकथा की निम्नोक्त विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं—कैकेयी का पश्चात्ताप ( अध्याय ३८ ), सीता-हरण का वृत्तान्त ( अध्याय ८१ ), अशोकवन में रावण-सीता-संवाद के समय हनुमान् का प्रकट होना तथा रावण को भगा देना ( अध्याय १०५ ) एवं मृत्यु द्वारा मायामयी सीता का रूप धारण करना ( अध्याय १३० )। उपनिषदों में भी राम और शिव का अभेद प्रतिपादित है। तुलसीदास ने भी अपने रामचरितमानस में राम और शिव का अभेद कहा है। उनके अनुसार शिवजी रामजी के सेवक, स्वामी तथा सखा भी हैं। ऐसे परम सिद्धान्त के प्रतिपादक ग्रन्थ को बुल्के आधुनिक कहते हैं, यह उनकी मनोवृत्ति का नमूना है। वे यह मानकर चलते हैं कि पहले राम एक अच्छे मनुष्य थे। लोग उन्हें मनुष्य ही मानते थे। उनका ईश्वर का अवतार होना यह बाद की कल्पना है। शिव और राम का अभेद उससे और भी बाद की कल्पना है। परन्तु उनका यह निर्णय भी निराधार है, क्योंकि वेद-उपनिषदों के अनुसार राम का परब्रह्म होना सिद्ध है, अतः शिव का उनसे अभिन्न होना स्वाभाविक है। ईश्वर एवं उसका अवतार होना यह मन्त्रों एवं ब्राह्मणों और उपनिषदों से सिद्ध ही है। हनुमत्संहिता १९०वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "हनुमत्संहिता की सं० १७१५ की एक हस्तलिपि का उल्लेख राजेन्द्र- लाल मित्र के कैटलाग में किया गया है ( भाग ७ पृ० २५० )। इस रचना का महारासोत्सव के नाम से सन् १९०४ में लखनऊ से प्रकाशन हुआ है। इसमें हनुमान् और अगस्त्य के संवाद के रूप में सरयू-तट पर राम की रासलीला तथा जल-विहार का वर्णन है। इसमें सीता अपने शरीर से १८४०८ नारियों की सृष्टि करती हैं

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