भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०७ दिया गया है। इसके अनुसार धोबी द्वारा सीतानिन्दा के फलस्वरूप सीतात्याग, कुश और लव का जन्म तथा यज्ञाश्व के कारण राम सेना से युद्ध, अनन्तर राम और सीता का सम्मिलन वर्णित। यह सुखान्त रामकथा पद्मपुराण के पातालखण्ड के वृत्तान्त से मिलती जुलती है।” वस्तुतः जैमिनीयाश्वमेध आर्ष ग्रन्थ है। भागवत के नामोल्लेखमात्र से वह अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि प्रायः सभी पुराणों में सभी पुराणों के नाम हैं। जो कि सर्वज्ञकल्प व्यासजी के द्वारा ही सम्भव हैं। जैमिनि व्यास के शिष्य तथा उनके समकाल के ही हैं। मैरावणचरित (मद्रास मैनुस्क्रिप्ट कैटलाग नं० डी २०८२) अथवा हनुमद्विजय (वही, डी १२२१५) के अध्यायों की पुष्पिका में इसे 'जैमिनिभारत' का एक अंश माना गया है। इसमें मैरावण पर रुद्रांश हनुमान् की विजय का वर्णन अगस्त्य द्वारा सुनाया गया है। मेघनाद-वध के बाद मैरावण राम तथा लक्ष्मण को पाताल ले जाता है। हनुमान् अपने पुत्र मत्स्यराज या मकरध्वज की सहायता से मैरावण का वध करके राम और लक्ष्मण को फिर से युद्धभूमि में लाते हैं। रामचरितमानस के क्षेपकों में भी इस कथा का उल्लेख है। थाईलैण्ड की रामकीर्ति में भी इसका उल्लेख है। मूलतः यह कथा भी आर्ष है। सहस्रमुखरावणचरित्रम् (मद्रास कैटलाग डी २०९८) यह रचना भी महाभारत के आश्रमवासिपर्व का एक अंश मानी जाती है। अद्भुतरामायण के वृत्तान्त से इसकी कथावस्तु मिलती जुलती है। रावण पर सीता की विजय के विषय में हस्तलिपियों का भी पता चला है। सीताविजय, जो वसिष्ठोत्तररामायण का एक भाग है, में सीता की शतस्कन्ध रावण पर विजय का वर्णन है। सत्योपाख्यान "सत्योपाख्यान (वेंकटेश्वर प्रेस) में वाल्मीकि-मार्कण्डेय-संवाद वर्णित है। इसकी कथावस्तु से पता चलता है कि यह अध्यात्मरामायण के बहुत बाद की रचना है जब रामकथा तथा रामभक्ति पर कृष्णलीला का गहरा प्रभाव पड़ने लगा था।” बुल्के का यह कथन निराधार है, क्योंकि इसका पीछे खण्डन हो चुका है। उसमें राम, लक्ष्मण आदि विष्णु, शेष, सुदर्शन एवं शङ्ख के अवतार हैं, यह उल्लेख (अध्याय १-२) करने के पश्चात् मन्थरा कैकेयी-संवाद दिया गया है, जिसमें दशरथ और कैकेयी के विवाह की चर्चा है (अध्याय ३-९)। तदुपरान्त मन्थरा के पूर्व जन्म की कथा का वर्णन है जिसके अनुसार वह दैत्य विरोचन की पुत्री थी। विष्णु की आज्ञा से इन्द्र द्वारा वज्र से मारी गयी थी (अध्याय १०-१५)। पूर्वार्द्ध के शेष अध्यायों (१६-४९) में राम की बाललीला का विस्तार से वर्णन है। इसकी विशेष कथाएँ यों हैं—देवताओं का अयोध्या में आगमन, दशरथ द्वारा उनका स्वागत (अध्याय १७-२३)। काकभुशुण्डि का राम की रोटी (शष्कुली) चुराना, बाद में राम से क्षमा मांगना, राम में निश्चल भक्ति की प्रार्थना करना एवं उनके द्वारा गरुड़ को रामतत्त्व सिखलाने का उल्लेख है (अध्याय २६)। जिन ग्रन्थों में राम की भक्ति का वर्णन होगा, बुल्के उन्हें अपनी कसौटी के अनुसार अर्वाचीन कहेंगे। इसका क्या इलाज ? परन्तु आस्तिक लोग तो वाल्मीकिरामायण को भी रामभक्ति का ही ग्रन्थ मानते हैं। पर बुल्के उसमें भी भक्तिवाले अंश को अर्वाचीन प्रक्षेप मान लेते हैं। वस्तुतः यह उनकी कुनीयतमात्र है। कोई विचार नहीं है। तुलसी के रामचरितमानस में काकभुशुण्डि-गरुड़संवाद की कथा प्रसिद्ध है। राम की बाललीलाओं का भी वहाँ वर्णन है। रत्नमाला और उसके पति का वृत्तान्त, अगले जन्म में उनको नन्द और यशोदा बनने का आश्वासन (अध्याय २९, ३०)। राम का गुह से मृगया की शिक्षा पाना (अध्याय ४३ में) है। उत्तरार्द्ध में सीता-स्वयंवर का वर्णन किया गया है। उसमें प्रहस्त की उपस्थिति का उल्लेख भी किया गया है। सीता-राम के विवाह के बाद