रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ रामायणमीमांसा नवम मन्त्ररामायण के आधार पर नीलकण्ठ ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक के सम्पूर्ण चरित्रों का वर्णन किया है। ऋक्संहिता के दशवें मण्डल के ९९वें सूक्त में आर्ष 'वभ्र' का उल्लेख है। 'वभ्र' वाल्मीकि ही हैं। इन्द्र, राम, रुद्रगण, हनुमान् तथा उनके साथियों आदि का वर्णन है। बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं— “नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति ।” (पृ० २६) बुल्के ने मन्त्ररामायण को समझने का प्रयत्न नहीं किया । नीलकण्ठजी ठीक ही कहते हैं कि यह स्थाणु का अपराध नहीं है जो कि अन्धा उसे नहीं देखता । वेदमन्त्र विशेषतः ऋग्वेद के मन्त्र बहुत कठिन हैं। इसलिए निरुक्त, निघण्टु तथा ब्राह्मण और सूत्र का आश्रय लेकर ही उनका अर्थ किया जाता है। पुराणों तथा महाभारत में कहा गया है कि वेद अल्पश्रुत से डरता है कि वह बेसमझ अवश्य मुझपर, अर्थ का अनर्थ कर, प्रहार करेगा । “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” इसी लिए इतिहासपुराणों द्वारा वेदों का उपबृंहण कहा गया है। वाल्मीकिरामायण में भी कहा गया है कि वेदों के उपबृंहणार्थ ही वाल्मीकि ने लव और कुश को रामायण महाकाव्य पढ़ाया था— “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” (वा० रा० १।४।६ ) नीलकण्ठ ने प्रमाणों के आधार पर मन्त्रों की व्याख्या करते हुए रामचरित का वर्णन किया है। उलटे बुल्के ने ही मन्त्रार्थ न समझकर “दशरथस्य शोणाः” दशरथशब्दमात्र के आधार पर ऋक्संहिता में राजा दशरथ का उल्लेख मान लिया है। इसी लिए बुल्के का साहस नहीं हुआ कि नीलकण्ठ के किसी मन्त्र के व्याख्यान का उद्धरण करके उसमें दोष दिखा सकें । मन्त्ररामायण की संक्षिप्त व्याख्या पृथक् देखें । बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के प्रथम श्लोक में गायत्रीस्वरूप का उल्लेख किया गया है । गायत्रीरामायण विद्यारण्यकृत रामायणरहस्य ( श्रीशङ्करगुरुकुल-पत्रिका भाग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (बालकाण्ड सर्ग ५) गोविन्द- राजकृत भूषण टीका आदि में रामायण के गायत्रीस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। तर्क यह है कि रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है। “प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।” ( रामायणरहस्य ६३ ) बुल्के कहते हैं, वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता है । विद्यारण्य ने वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्रीस्वरूप कहा है। “गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम् ।” परशुराम ने क्यों क्षत्रियों का नाश किया और फिर भी क्षत्रिय-वंश का नाश क्यों नहीं हुआ ? राम के इन प्रश्नों का समाधान करते हुए वाल्मीकि ने वेदान्तरामायण कहा है। इसमें परशुराम के चरित्र का वर्णन है । इसका प्रकाशन, लहरी प्रेस, बनारस (सं १९१४) में हुआ है। हिन्दुत्व में वस्तीनिवासी पं० धनराजशास्त्री की दी हुई टिप्पणी के आधार पर १९ रामायणों की कथावस्तु का संक्षिप्त परिचय दिया है। जैमिनिभारत १८५ वाँ अनु० : जैमिनिभारत या जैमिनीयाश्वमेध की रचना बुल्के के अनुसार “भागवतपुराण के बाद १३वीं शती पूर्व की है, क्योंकि जैमिनीयाश्वमेध में भागवत का उल्लेख है तथा इसका १३वीं शती में कन्नड भाषा में अनुवाद हुआ है। इसका मुख्य विषय युधिष्ठिर के अश्वमेध का वर्णन है। इसमें कुशलवोपाख्यान अ० २५-३६ में