रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 382, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०५ में लिखते हैं कि रावण द्वारा भेजे गये राक्षस बाल्यावस्था में ही राम को समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु वे स्वयं मारे जाते हैं। उनके डर से दशरथ राम को गुप्त स्थान पर भेज देते हैं। सरयूपार गोपप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित और उनकी पत्नी मांगल्या राम का पालन-पोषण करते हैं। विवाह के पूर्व अयोध्या के प्रमोदवन में देवावतार गोपियों एवं परा शक्ति सीता के साथ राम रास-लीला करते हैं। मिथिला पहुँच कर एक पक्षी द्वारा वे सीता के पास अपना एक चित्र भेजते हैं। चित्रदर्शन से सीता उन्हें प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित होती हैं। दशरथ के अश्वमेधयज्ञ में विजित राजाओं की सहस्रों कन्याओं को वे (राम) स्वीकार करते हैं। चित्रकूट में गोप और गोपिकाओं के संग रास-क्रीड़ा का आयोजन होता है। सीता के अतिरिक्त सहजा सखी का भी राम की पत्नी के रूप में उल्लेख है। सहजा भी जनकवंशीय कन्या कही गयी है। सीता ज्ञानपरक भक्ति और सहजा प्रेमा भक्ति की प्रतीक कही गयी हैं (दे० पृष्ठ ९७ रामभक्ति में रसिकसम्प्रदाय)। बुल्के आदि ऐसे कथनों को अत्यन्त अर्वाचीन और कृष्णलीला का अनुकरणमात्र मानते हैं। परन्तु यह पाश्चात्यों की अशुद्ध विचारपद्धति है। वास्तविक दृष्टि नहीं है। वैदिक ऋषियों की दृष्टि से कोई भी कथावस्तु नवीन नहीं है। वेद, पुराण आदि अनादि हैं। अनादि ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि की कथाएँ हैं। कृष्णोपनिषत् के अनुसार तो अनेक साधक राम के वरदान से ही कृष्णावतार में गोपीभाव प्राप्त कर सके हैं। नारदपाञ्चरात्र आदि आगमों में भी राम को कृष्ण से पहले का माना गया है। फिर जन्मान्तर में कृष्ण भी राम से और पहले के हैं। तभी तो वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्णरूप भी कहा गया है— 'कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।' (वा० रा० ६।११९।१५) अवश्य ही एकपत्नीव्रत मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामजी के सम्बन्ध में उक्त चरित्र सङ्गत नहीं दिखते हैं। तथापि कल्पभेद से राम के साथ उक्त चरित्रों का सम्बन्ध असम्भव नहीं है। १८१वें अनु० में कहा गया है कि महारामायण का भी रामदासकृत हिन्दुत्व में उल्लेख है। इसके पाँच अध्याय (४७-५२) अयोध्या में संवत् १९८५ में छपे हैं। इसमें रामचरणों की ४८ रेखाओं का उल्लेख एवं रामो- पासकों के संस्कारों का वर्णन है। जिनमें एक धनुर्बाण-संस्कार है। राम के अक्षरातीत ब्रह्म होने के साथ उनकी सखी- भाव से उपासना करने का उल्लेख है। सीता की ३३ शक्तियों की नामावली तथा उनके कार्यों का वर्णन है। राम- नाम-माहात्म्य के प्रसङ्ग में रमु धातु से रामनाम की व्युत्पत्ति का प्रतिपादन तथा रास-क्रीड़ा का उल्लेख है। बुल्के के अनुसार सम्भव है यह भुशुण्डिरामायण से अभिन्न हो। परन्तु बुल्के का उक्त कथन असङ्गत एवं निष्प्रमाण है। अनादिकाल से विभिन्न सम्प्रदायों में राम की उपासना होती आयी है। तदनुसार रामायण के सम्बन्ध में विभिन्न आर्ष पद्धतियाँ हैं। समुचित हेतु के बिना किसी को अप्रामाणिक एवं अर्वाचीन कहने का साहस पाश्चात्य एवं तदनुयायी ही कर सकते हैं। १८२वें अनु० में मन्त्ररामायण की चर्चा बुल्के ने की है। उसमें रामायण के वेदमूलकत्व का प्रतिपादन किया गया है। "वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥" यह लव-कुश द्वारा विहित मङ्गलाचरण का श्लोक रामायणपाठकों की परम्परा में प्रचलित है। इसका अर्थ है—वेदवेद्य परमेश्वर जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तो साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि से रामायण के रूप में प्रकट हुए। ३९