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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०५ में लिखते हैं कि रावण द्वारा भेजे गये राक्षस बाल्यावस्था में ही राम को समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु वे स्वयं मारे जाते हैं। उनके डर से दशरथ राम को गुप्त स्थान पर भेज देते हैं। सरयूपार गोपप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित और उनकी पत्नी मांगल्या राम का पालन-पोषण करते हैं। विवाह के पूर्व अयोध्या के प्रमोदवन में देवावतार गोपियों एवं परा शक्ति सीता के साथ राम रास-लीला करते हैं। मिथिला पहुँच कर एक पक्षी द्वारा वे सीता के पास अपना एक चित्र भेजते हैं। चित्रदर्शन से सीता उन्हें प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित होती हैं। दशरथ के अश्वमेधयज्ञ में विजित राजाओं की सहस्रों कन्याओं को वे (राम) स्वीकार करते हैं। चित्रकूट में गोप और गोपिकाओं के संग रास-क्रीड़ा का आयोजन होता है। सीता के अतिरिक्त सहजा सखी का भी राम की पत्नी के रूप में उल्लेख है। सहजा भी जनकवंशीय कन्या कही गयी है। सीता ज्ञानपरक भक्ति और सहजा प्रेमा भक्ति की प्रतीक कही गयी हैं (दे० पृष्ठ ९७ रामभक्ति में रसिकसम्प्रदाय)। बुल्के आदि ऐसे कथनों को अत्यन्त अर्वाचीन और कृष्णलीला का अनुकरणमात्र मानते हैं। परन्तु यह पाश्चात्यों की अशुद्ध विचारपद्धति है। वास्तविक दृष्टि नहीं है। वैदिक ऋषियों की दृष्टि से कोई भी कथावस्तु नवीन नहीं है। वेद, पुराण आदि अनादि हैं। अनादि ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि की कथाएँ हैं। कृष्णोपनिषत् के अनुसार तो अनेक साधक राम के वरदान से ही कृष्णावतार में गोपीभाव प्राप्त कर सके हैं। नारदपाञ्चरात्र आदि आगमों में भी राम को कृष्ण से पहले का माना गया है। फिर जन्मान्तर में कृष्ण भी राम से और पहले के हैं। तभी तो वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्णरूप भी कहा गया है— 'कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।' (वा० रा० ६।११९।१५) अवश्य ही एकपत्नीव्रत मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामजी के सम्बन्ध में उक्त चरित्र सङ्गत नहीं दिखते हैं। तथापि कल्पभेद से राम के साथ उक्त चरित्रों का सम्बन्ध असम्भव नहीं है। १८१वें अनु० में कहा गया है कि महारामायण का भी रामदासकृत हिन्दुत्व में उल्लेख है। इसके पाँच अध्याय (४७-५२) अयोध्या में संवत् १९८५ में छपे हैं। इसमें रामचरणों की ४८ रेखाओं का उल्लेख एवं रामो- पासकों के संस्कारों का वर्णन है। जिनमें एक धनुर्बाण-संस्कार है। राम के अक्षरातीत ब्रह्म होने के साथ उनकी सखी- भाव से उपासना करने का उल्लेख है। सीता की ३३ शक्तियों की नामावली तथा उनके कार्यों का वर्णन है। राम- नाम-माहात्म्य के प्रसङ्ग में रमु धातु से रामनाम की व्युत्पत्ति का प्रतिपादन तथा रास-क्रीड़ा का उल्लेख है। बुल्के के अनुसार सम्भव है यह भुशुण्डिरामायण से अभिन्न हो। परन्तु बुल्के का उक्त कथन असङ्गत एवं निष्प्रमाण है। अनादिकाल से विभिन्न सम्प्रदायों में राम की उपासना होती आयी है। तदनुसार रामायण के सम्बन्ध में विभिन्न आर्ष पद्धतियाँ हैं। समुचित हेतु के बिना किसी को अप्रामाणिक एवं अर्वाचीन कहने का साहस पाश्चात्य एवं तदनुयायी ही कर सकते हैं। १८२वें अनु० में मन्त्ररामायण की चर्चा बुल्के ने की है। उसमें रामायण के वेदमूलकत्व का प्रतिपादन किया गया है। "वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥" यह लव-कुश द्वारा विहित मङ्गलाचरण का श्लोक रामायणपाठकों की परम्परा में प्रचलित है। इसका अर्थ है—वेदवेद्य परमेश्वर जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तो साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि से रामायण के रूप में प्रकट हुए। ३९

३०६ रामायणमीमांसा नवम मन्त्ररामायण के आधार पर नीलकण्ठ ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक के सम्पूर्ण चरित्रों का वर्णन किया है। ऋक्संहिता के दशवें मण्डल के ९९वें सूक्त में आर्ष 'वभ्र' का उल्लेख है। 'वभ्र' वाल्मीकि ही हैं। इन्द्र, राम, रुद्रगण, हनुमान् तथा उनके साथियों आदि का वर्णन है। बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं— “नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति ।” (पृ० २६) बुल्के ने मन्त्ररामायण को समझने का प्रयत्न नहीं किया । नीलकण्ठजी ठीक ही कहते हैं कि यह स्थाणु का अपराध नहीं है जो कि अन्धा उसे नहीं देखता । वेदमन्त्र विशेषतः ऋग्वेद के मन्त्र बहुत कठिन हैं। इसलिए निरुक्त, निघण्टु तथा ब्राह्मण और सूत्र का आश्रय लेकर ही उनका अर्थ किया जाता है। पुराणों तथा महाभारत में कहा गया है कि वेद अल्पश्रुत से डरता है कि वह बेसमझ अवश्य मुझपर, अर्थ का अनर्थ कर, प्रहार करेगा । “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” इसी लिए इतिहासपुराणों द्वारा वेदों का उपबृंहण कहा गया है। वाल्मीकिरामायण में भी कहा गया है कि वेदों के उपबृंहणार्थ ही वाल्मीकि ने लव और कुश को रामायण महाकाव्य पढ़ाया था— “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” (वा० रा० १।४।६ ) नीलकण्ठ ने प्रमाणों के आधार पर मन्त्रों की व्याख्या करते हुए रामचरित का वर्णन किया है। उलटे बुल्के ने ही मन्त्रार्थ न समझकर “दशरथस्य शोणाः” दशरथशब्दमात्र के आधार पर ऋक्संहिता में राजा दशरथ का उल्लेख मान लिया है। इसी लिए बुल्के का साहस नहीं हुआ कि नीलकण्ठ के किसी मन्त्र के व्याख्यान का उद्धरण करके उसमें दोष दिखा सकें । मन्त्ररामायण की संक्षिप्त व्याख्या पृथक् देखें । बुल्के कहते हैं मन्त्ररामायण के प्रथम श्लोक में गायत्रीस्वरूप का उल्लेख किया गया है । गायत्रीरामायण विद्यारण्यकृत रामायणरहस्य ( श्रीशङ्करगुरुकुल-पत्रिका भाग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (बालकाण्ड सर्ग ५) गोविन्द- राजकृत भूषण टीका आदि में रामायण के गायत्रीस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। तर्क यह है कि रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है। “प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।” ( रामायणरहस्य ६३ ) बुल्के कहते हैं, वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता है । विद्यारण्य ने वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्रीस्वरूप कहा है। “गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम् ।” परशुराम ने क्यों क्षत्रियों का नाश किया और फिर भी क्षत्रिय-वंश का नाश क्यों नहीं हुआ ? राम के इन प्रश्नों का समाधान करते हुए वाल्मीकि ने वेदान्तरामायण कहा है। इसमें परशुराम के चरित्र का वर्णन है । इसका प्रकाशन, लहरी प्रेस, बनारस (सं १९१४) में हुआ है। हिन्दुत्व में वस्तीनिवासी पं० धनराजशास्त्री की दी हुई टिप्पणी के आधार पर १९ रामायणों की कथावस्तु का संक्षिप्त परिचय दिया है। जैमिनिभारत १८५ वाँ अनु० : जैमिनिभारत या जैमिनीयाश्वमेध की रचना बुल्के के अनुसार “भागवतपुराण के बाद १३वीं शती पूर्व की है, क्योंकि जैमिनीयाश्वमेध में भागवत का उल्लेख है तथा इसका १३वीं शती में कन्नड भाषा में अनुवाद हुआ है। इसका मुख्य विषय युधिष्ठिर के अश्वमेध का वर्णन है। इसमें कुशलवोपाख्यान अ० २५-३६ में

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०७ दिया गया है। इसके अनुसार धोबी द्वारा सीतानिन्दा के फलस्वरूप सीतात्याग, कुश और लव का जन्म तथा यज्ञाश्व के कारण राम सेना से युद्ध, अनन्तर राम और सीता का सम्मिलन वर्णित। यह सुखान्त रामकथा पद्मपुराण के पातालखण्ड के वृत्तान्त से मिलती जुलती है।” वस्तुतः जैमिनीयाश्वमेध आर्ष ग्रन्थ है। भागवत के नामोल्लेखमात्र से वह अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि प्रायः सभी पुराणों में सभी पुराणों के नाम हैं। जो कि सर्वज्ञकल्प व्यासजी के द्वारा ही सम्भव हैं। जैमिनि व्यास के शिष्य तथा उनके समकाल के ही हैं। मैरावणचरित (मद्रास मैनुस्क्रिप्ट कैटलाग नं० डी २०८२) अथवा हनुमद्विजय (वही, डी १२२१५) के अध्यायों की पुष्पिका में इसे 'जैमिनिभारत' का एक अंश माना गया है। इसमें मैरावण पर रुद्रांश हनुमान् की विजय का वर्णन अगस्त्य द्वारा सुनाया गया है। मेघनाद-वध के बाद मैरावण राम तथा लक्ष्मण को पाताल ले जाता है। हनुमान् अपने पुत्र मत्स्यराज या मकरध्वज की सहायता से मैरावण का वध करके राम और लक्ष्मण को फिर से युद्धभूमि में लाते हैं। रामचरितमानस के क्षेपकों में भी इस कथा का उल्लेख है। थाईलैण्ड की रामकीर्ति में भी इसका उल्लेख है। मूलतः यह कथा भी आर्ष है। सहस्रमुखरावणचरित्रम् (मद्रास कैटलाग डी २०९८) यह रचना भी महाभारत के आश्रमवासिपर्व का एक अंश मानी जाती है। अद्भुतरामायण के वृत्तान्त से इसकी कथावस्तु मिलती जुलती है। रावण पर सीता की विजय के विषय में हस्तलिपियों का भी पता चला है। सीताविजय, जो वसिष्ठोत्तररामायण का एक भाग है, में सीता की शतस्कन्ध रावण पर विजय का वर्णन है। सत्योपाख्यान "सत्योपाख्यान (वेंकटेश्वर प्रेस) में वाल्मीकि-मार्कण्डेय-संवाद वर्णित है। इसकी कथावस्तु से पता चलता है कि यह अध्यात्मरामायण के बहुत बाद की रचना है जब रामकथा तथा रामभक्ति पर कृष्णलीला का गहरा प्रभाव पड़ने लगा था।” बुल्के का यह कथन निराधार है, क्योंकि इसका पीछे खण्डन हो चुका है। उसमें राम, लक्ष्मण आदि विष्णु, शेष, सुदर्शन एवं शङ्ख के अवतार हैं, यह उल्लेख (अध्याय १-२) करने के पश्चात् मन्थरा कैकेयी-संवाद दिया गया है, जिसमें दशरथ और कैकेयी के विवाह की चर्चा है (अध्याय ३-९)। तदुपरान्त मन्थरा के पूर्व जन्म की कथा का वर्णन है जिसके अनुसार वह दैत्य विरोचन की पुत्री थी। विष्णु की आज्ञा से इन्द्र द्वारा वज्र से मारी गयी थी (अध्याय १०-१५)। पूर्वार्द्ध के शेष अध्यायों (१६-४९) में राम की बाललीला का विस्तार से वर्णन है। इसकी विशेष कथाएँ यों हैं—देवताओं का अयोध्या में आगमन, दशरथ द्वारा उनका स्वागत (अध्याय १७-२३)। काकभुशुण्डि का राम की रोटी (शष्कुली) चुराना, बाद में राम से क्षमा मांगना, राम में निश्चल भक्ति की प्रार्थना करना एवं उनके द्वारा गरुड़ को रामतत्त्व सिखलाने का उल्लेख है (अध्याय २६)। जिन ग्रन्थों में राम की भक्ति का वर्णन होगा, बुल्के उन्हें अपनी कसौटी के अनुसार अर्वाचीन कहेंगे। इसका क्या इलाज ? परन्तु आस्तिक लोग तो वाल्मीकिरामायण को भी रामभक्ति का ही ग्रन्थ मानते हैं। पर बुल्के उसमें भी भक्तिवाले अंश को अर्वाचीन प्रक्षेप मान लेते हैं। वस्तुतः यह उनकी कुनीयतमात्र है। कोई विचार नहीं है। तुलसी के रामचरितमानस में काकभुशुण्डि-गरुड़संवाद की कथा प्रसिद्ध है। राम की बाललीलाओं का भी वहाँ वर्णन है। रत्नमाला और उसके पति का वृत्तान्त, अगले जन्म में उनको नन्द और यशोदा बनने का आश्वासन (अध्याय २९, ३०)। राम का गुह से मृगया की शिक्षा पाना (अध्याय ४३ में) है। उत्तरार्द्ध में सीता-स्वयंवर का वर्णन किया गया है। उसमें प्रहस्त की उपस्थिति का उल्लेख भी किया गया है। सीता-राम के विवाह के बाद

३०८ रामायणमीमांसा नवम उनकी तीर्थयात्रा का वर्णन है। जल-विहार, वन-विहार, सीता की मानलीला, होलिकोत्सव आदि शृङ्गारात्मक वर्णन किये गये हैं। इन्हीं अंशों को देखकर बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान् श्रीकृष्ण-लीला का प्रभाव मान लेते हैं। परन्तु यह कल्पना निराधार है। राम अवतार श्रीकृष्ण से पहले हुआ। उनकी स्वतन्त्र लीलाएँ हैं। वेदमन्त्र सभी अनादि हैं तो भी मन्त्रों की तुल्यता देखकर उनको एक दूसरे से प्रभावित नहीं कहा जा सकता है। पुरुषसूक्त प्रायः विभिन्न संहिता में हैं। उनमें बहुत कुछ तुल्यता है ही। धर्मखण्ड १८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "धर्मखण्ड की कई हस्तलिपियाँ मद्रास के राजकीय ओरिएण्टल पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। यह रचना स्कन्दपुराण का एक अंश है। इसका रचनाकाल १५वीं या १६वीं शती प्रतीत होता है।" कालनिर्णयसम्बन्धी पूर्व वर्णित अनुमानों के तुल्य यह अनुमान भी निराधार है। स्कन्दपुराण का अंश होने से इसे भी व्यास की कृति ही मानना समुचित है। इस रामकथा में शिव को विशेष रूप से महत्त्व दिया गया है। सीता-स्वयंवर में पार्वती के साथ शिवजी रामजी को धनुष तोड़ने का आदेश देते हैं। इसमें राम और शिव की अभिन्नता दिखलायी गयी है। वनवास के समय शिव ब्राह्मण का रूप धारण कर उनसे मिलते हैं। संवाद में राम सुस्पष्ट शब्दों में अपना तथा शिव का अभेद व्यक्त करते हैं— “शिवं मां प्रतिजानीहि नावयोरन्तरमण्व् ।” ( अध्याय ३८ ) अन्यत्र राम ने हनुमान् को भेजते समय उनसे कहा था कि तुम शिव के अवतार हो और मैं स्वयं शिव हूँ ( अ० ९८)। धर्मखण्ड की रामकथा की निम्नोक्त विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं—कैकेयी का पश्चात्ताप ( अध्याय ३८ ), सीता-हरण का वृत्तान्त ( अध्याय ८१ ), अशोकवन में रावण-सीता-संवाद के समय हनुमान् का प्रकट होना तथा रावण को भगा देना ( अध्याय १०५ ) एवं मृत्यु द्वारा मायामयी सीता का रूप धारण करना ( अध्याय १३० )। उपनिषदों में भी राम और शिव का अभेद प्रतिपादित है। तुलसीदास ने भी अपने रामचरितमानस में राम और शिव का अभेद कहा है। उनके अनुसार शिवजी रामजी के सेवक, स्वामी तथा सखा भी हैं। ऐसे परम सिद्धान्त के प्रतिपादक ग्रन्थ को बुल्के आधुनिक कहते हैं, यह उनकी मनोवृत्ति का नमूना है। वे यह मानकर चलते हैं कि पहले राम एक अच्छे मनुष्य थे। लोग उन्हें मनुष्य ही मानते थे। उनका ईश्वर का अवतार होना यह बाद की कल्पना है। शिव और राम का अभेद उससे और भी बाद की कल्पना है। परन्तु उनका यह निर्णय भी निराधार है, क्योंकि वेद-उपनिषदों के अनुसार राम का परब्रह्म होना सिद्ध है, अतः शिव का उनसे अभिन्न होना स्वाभाविक है। ईश्वर एवं उसका अवतार होना यह मन्त्रों एवं ब्राह्मणों और उपनिषदों से सिद्ध ही है। हनुमत्संहिता १९०वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "हनुमत्संहिता की सं० १७१५ की एक हस्तलिपि का उल्लेख राजेन्द्र- लाल मित्र के कैटलाग में किया गया है ( भाग ७ पृ० २५० )। इस रचना का महारासोत्सव के नाम से सन् १९०४ में लखनऊ से प्रकाशन हुआ है। इसमें हनुमान् और अगस्त्य के संवाद के रूप में सरयू-तट पर राम की रासलीला तथा जल-विहार का वर्णन है। इसमें सीता अपने शरीर से १८४०८ नारियों की सृष्टि करती हैं

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०९ तथा इनके साथ रास करने के लिए राम कृष्ण की भाँति उतने ही रूप धारण करते हैं। इसका विस्तार २६० श्लोकों का है।" बुल्के के अनुसार "रामकथा पर यह प्रभाव अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। फिर भी सं० १७१५ की हस्तलिपि से पता चलता है गोस्वामी तुलसीदासजी के जीवनकाल में उसका सूत्रपात अवश्य हो चुका होगा।" पर बुल्के की यह कल्पना निराधार है। यह कई बार कहा जा चुका है कि कृष्ण-लीलाओं के अनुसार भी वृन्दावन की रासलीला नित्य रासलीला का एक अंश ही है। गोलोकधाम में रासलीला नित्य प्रचलित है। वृन्दावन की रासलीला में भी मुख्य सिद्धान्त यही है कि श्रीराधा की कायव्यूहरूपा गोपाङ्गनाएँ ही नित्य रासलीला की परिकर हैं। भक्त अपने आप को भगवान् की लीलाओं का अङ्गोपाङ्ग बनाना चाहता है। वह चाहता है मैं कोटि-कोटि कानों से भगवान् का चरित्र सुनूँ, कोटि-कोटि नेत्रों से भगवान् का मङ्गलमय रूप देखूं, कोटि-कोटि हाथों से तथा कोटि-कोटि शरीरों से भगवान् की सेवा करूँ। इसी दृष्टि से सीता कोटि-कोटि देहों से भगवान् राम की लीलाओं को प्रोत्साहन देती हैं। ऐसी स्थिति में हनुमत्संहिता की कथावस्तु शुद्ध वैदिक सिद्धान्तों पर ही आधारित है। बृहत्कोसलखण्ड १९१वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "राजेन्द्रलाल मित्र के कैटलाग में उसकी एक हस्तलिपि सं० १९१४ का विवरण दिया गया है (भाग ९ पृ० ५२)। उन्होंने उसे बेतिया (चम्पारन) में देखा है। उसका विस्तार ३०७२ श्लोकों का बताया गया है। संवत् २००१ में लाहोर के श्रीरोशनलाल अग्रवाल ने हिन्दी टीकासहित इसकी १३० प्रतियाँ छपवायी थी। यह हिन्दी रसवर्धिनी टीका श्रीरामवल्लभीशरणजी महाराज की लिखी हुई है। वेदव्यासकृत बृहत्कोसलखण्ड ब्रह्मरामायण का अंश माना जाता है। इसके १५ अध्यायों का कथानक तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। १—विवाह के पूर्व राम की लीला (अ० १-५)। प्रारम्भ में यज्ञोपवीत संस्कार तथा विद्याभ्यास के पश्चात् सखा-रास का वर्णन किया गया है। राम के सखा, जिनमें रुद्र भी शामिल हैं, स्त्री का रूप धारण कर राम के साथ रास का आयोजन करते हैं (अध्याय १)। अनन्तर गोपिकाओं, देवकन्याओं और राजकन्याओं के साथ राम के रास का वर्णन किया गया है। किसी अवसर पर राम को देखकर गोपियों का मन आकर्षित हुआ और वे उनको पतिरूप में प्राप्त करने के उद्देश्य से तप तथा पार्वती की पूजा करने लगीं। पिता की आज्ञा लेकर राम शिकार करने के बहाने यमुना तट पर पहुँचते हैं। शिव की आज्ञा से निकुम्भ आँधी उत्पन्न करता है, जिसमें गोधन भाग जाता है तथा गोप उसका पीछा करते-करते चले जाते हैं। इतने में राम गोपियों के पास चले जाते हैं। उनके साथ वसन्तोत्सव मानते हैं तथा रासलीला भी करते हैं। इसमें लक्ष्मी, सरस्वती, उमा आदि मालिन का रूप धारण कर भाग लेती हैं। अन्त में गोपियों को बिदा कर राम अपने सखाओं को योगनिद्रा से जगाकर अयोध्या लौटते हैं (अध्याय २)। अगले अध्याय में दशरथ राम को दही का कर वसूल करने के लिए गोपों के यहाँ भेज देते हैं। वे राम को अपनी पुत्रियाँ समर्पित कर देते हैं। राम सबसे विवाह कर अयोध्या लौट आते हैं। अनन्तर सान्तानिक वन की लताओं से देवकन्याएँ प्रकट होकर राम के साथ विविध विलास करती हैं। अन्त में उनकी रासलीला का भी विधान होता है (अध्याय ३)। अब देवता अयोध्या पहुँचकर राम से निवेदन करते हैं कि वे उनकी कन्याओं को भी ग्रहण करें। इसके बाद दशरथ राम को शम्बरासुर का वध करने के लिए भेज देते हैं। राम उसका वैजयन्त नामक पुर घेरकर उसके पुत्र का वध करते हैं तथा शम्बरासुर द्वारा हरण की गयी राजा, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष आदि की कन्याओं को लेकर अयोध्या आते हैं। उनके साथ भी रासक्रीड़ा करते हैं (अध्याय ४,५)। २—राम और सीता का विवाह (अध्याय ६,७)। एक तपस्विनी से राम के कार्यों का वर्णन सुनकर अष्टवर्षीया सीता विरह से व्याकुल होने लगती हैं। महेश्वर जनक को स्वप्न में दिखायी पड़ते हैं और परामर्श देते

हैं कि स्वयंवर का आयोजन हो जो उनका धनुष चढ़ाने में समर्थ हो वही सीता का पति होने योग्य है। बहुत से राजा असफल होकर युद्ध करते हैं, किन्तु पराजय के बाद वे अपनी पुत्रियों को जानकी की सखी बनाने के लिए मिथिला में ले आते हैं। सीता राम का रूप धारण अपनी सखियों के साथ रास करती हैं (अध्याय ६)। नारद राम के पास जाकर सीता के वियोग का वर्णन करते हैं तथा उनके स्वयंवर का समाचार सुनाकर चले जाते हैं। शिव की प्रेरणा से विश्वामित्र राम तथा लक्ष्मण को मिथिला ले जाते हैं। वहाँ राम धनुष तोड़कर सीता को प्राप्त करते हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के भी विवाह होते हैं। ३—विवाह के पश्चात् राम की लीला (अध्याय ८-१५)। विवाह के बाद राम असंख्य कन्याओं के साथ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित प्रासाद में निवास करते हैं। समय-समय पर विविध उत्सव मनाते हैं। वन में जाकर रास-लीला करते हैं। बुल्के के अनुसार गोप-कन्या, देव-कन्या, गन्धर्व-कन्या, किन्नर-सुता, विद्याधर-कन्या, सिद्धकुमारी, राज- कन्या, साध्य-कन्या, यक्ष-कन्या तथा नागकन्याओं के सङ्ग रासलीला के वर्णन प्रसङ्गों में कृष्ण की रासलीला का स्पष्ट अनुकरण किया गया है। उदाहरणार्थ राम का बहुत से रूप धारण करना, अन्तर्धान हो जाना, सीता की मान-लीला आदि।" वस्तुतः— "राम अनन्त अनन्त गुनानी। अगणित जन्म कर्म नामानी ॥" (रा० मा० ७।५१।२) तुलसीदासजी के अनुसार राम के अनन्त अवतार तथा अनन्त लीलाएँ हैं। किसी कल्प में राम ने भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिए रासलीला की है। राम ब्रह्मस्वरूप हैं। प्राणिमात्र उनके अनन्त माधुर्य पर मुग्ध होते हैं। "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।" (गी० ११।४४) पुत्र पर पिता का जैसा, सखा पर सखा का जैसा एवं प्रिया पर प्रिय का जैसा भगवान् का अनुग्रह सब चाहते हैं। किसी कल्प में भगवान् राम ने अपने भक्तों की वाञ्छाएँ कृष्णावतार में पूरी की हैं और किसी कल्प में स्वयं अपने ही रूप में भक्तवाञ्छाकल्पद्रुम भगवान् ने भक्तवाञ्छा पूरी की है। इसमें कृष्ण के अनुकरण की कल्पना निराधार ही है। हिन्दुत्व में वर्णित रामकथा अनु० १९२ से अनु० २१०: हिन्दुत्व में प्रदर्शित रामायण में से महारामायण शङ्कर-पार्वती-संवादरूप ३,५०,००० श्लोकों का ग्रंथ है। इसमें कनकभवनविहारी राम की ९९ रासलीलाओं का वर्णन है। नारदकृत संवृतरामायण का विस्तार २४,००० श्लोकों का है। इसमें स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की तपस्या तथा दशरथ और कौशल्या के रूप में आविर्भाव का वर्णन है। लोमशरामायण लोमश ऋषि की कृति में ३२,००० श्लोक हैं। इसमें राजा कुमुद और वीरवती के दशरथ तथा कौशल्या के रूप में जन्म का वर्णन है। अगस्त्यरामायण १६,००० श्लोकों का है। इसमें भानुप्रताप अरिमर्दन की कथा है तथा राजा कुन्तल और सिन्धुमती का दशरथ और कौशल्या के रूप में जन्म वर्णित है। मञ्जुलरामायण सुतीक्ष्णकृत १,२०,००० श्लोकों का है। इसमें भानुप्रताप अरिमर्दन की कथा तथा शबरी के प्रति राम द्वारा नवधा भक्ति का वर्णन है।

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३११ अत्रिकृत सौपद्मरामायण ६२,००० श्लोकों का है। इसमें वाटिकाप्रसङ्ग वर्णित है। रामायणमहामाला शिव-पार्वती-संवादरूप ५६,००० श्लोकों का है। इसमें भुशुण्डि द्वारा गरुड़-मोहनिवारण वर्णित है। सौहार्दरामायण शरभङ्गकृत ४०,००० श्लोकों का है। इसमें राम और लक्ष्मण का वानरी भाषा समझने और बोलने का उल्लेख है। रामायणमणिरत्न वसिष्ठ-अरुन्धती-संवादरूप ३६,००० श्लोकों का है। इसमें मिथिला तथा अयोध्या में राम का वसन्तोत्सव मनाने का उल्लेख है। सौर्यरामायण में हनुमान् और सूर्य का संवाद वर्णित है। यह ६२,००० श्लोकों का है। इसमें शुकचरित्र तथा शुक का रजक बन कर सीतात त्याग का कारण बनना वर्णित है। चान्द्ररामायण ७५,००० श्लोकों का है। केवट के पूर्व जन्म की कथा इसकी विशेषता है। मैन्द रामायण मैन्द-कौरव-संवाद ५२,००० श्लोकों का है। इसमें वाटिकाप्रसङ्ग विस्तारपूर्वक वर्णित है। स्वायम्भुवरामायण ब्रह्म-नारद-संवाद १८,००० श्लोकों का है। इसमें मन्दोदरी के गर्भ से सीता के जन्म का वर्णन है। सुब्रह्मरामायण ३२,००० श्लोकों का है। सुवर्चरामायण सुग्रीव-तारा-संवाद १५,००० श्लोकों का है। इसमें सुलोचना की कथा, धोबी- धोबिन-संवाद तथा रावण के चित्र के कारण शान्ता की चुगली, शान्ता के प्रति सीता का शाप तथा उसकी पक्षी-योनि की प्राप्ति एवं महारावण का वध-वर्णन है। देवरामायण १,००,००० श्लोकों का है। इसमें इन्द्र और जयन्त का संवाद वर्णित है। श्रवणरामायण इन्द्र-जनक-संवादरूप १,२५,००० श्लोकों का है। इसमें मन्थरा की उत्पत्ति तथा चित्रकूट में भरत की यात्रा के समय जनक का आगमन वर्णित है। दुरन्तारामायण वसिष्ठ-जनकसंवादरूप ६१,००० श्लोकों का है। इसमें भरत की महिमा का वर्णन है। रामायणचम्पू शिव-नारद-संवादरूप १५,००० श्लोकों का है। इसमें शीलनिधि राजा के यहाँ स्वयंवर का वर्णन है। ये सभी कल्पभेद से प्रमाणकोटि में माने जाने चाहिये। ✤

दशम अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा २११वें अनु० में बुल्के कहते हैं, प्रचलित वाल्मीकिरामायण के विषय में कहा गया है कि यह कवियों का आधार सिद्ध होगा । “परं कवीनामाधारम् ।” ( वा० रा० १।४।२७ ) वस्तुस्थिति तो यही है । परन्तु बुल्के तो पूरे बालकाण्ड को प्रक्षिप्त ही मानते हैं । उसी के अनुसार कहा जा सकता है—रामायण ही कवियों एवं सभी काव्यों का आधार है । बृहद्धर्मपुराण में ठीक ही लिखा है— ' रामायणमहाकाव्यमादौ वाल्मीकिना कृतम् । तन्मूलं सर्वकाव्यानामितिहासपुराणयोः ॥ संहितानाञ्च सर्वासां मूलं रामायणं मतम् । तदेवादर्शमाराध्य वेदव्यासो हरेः कला ।। चक्रे भारताख्यामितिहासं पुरातनम् ।" ( बृह० पु० पूर्वार्ध २५।२८,२९ ) वाल्मीकि द्वारा कृत रामायण सभी काव्यों तथा इतिहास-पुराणों का आधार है। वही सभी संहिताओं का मूल है। उसी आदर्श की आराधना करके भगवान् हरि की कला वेदव्यास ने महाभारत आख्यानमय इतिहास का निर्माण किया है। ब्रह्मप्रेरिता सरस्वती ही शोकापनोदनार्थं महर्षि के मुख से “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।” इत्यादि श्लोक के रूप में प्रकट हुई थी । 'प्रसन्नराघवम्' की प्रस्तावना में नट सूत्रधार से पूछता है उसके उत्तर में सूत्रधार की निम्नोक्ति भी ठीक ही है । “स्वसूक्तीनां पात्रं रघुतिलकमेकं कलयतां कवीनां को दोषः स तु गुणगणानामवगुणः । यदेतैर्निःशेषैरपरगुणलुब्धैरिव जगत्यसावेकश्चक्रे सततसुखसंवासवसतिः ॥” सब कवि क्यों रामचन्द्र का ही पुनः-पुनः वर्णन करते हैं ? नट के इस प्रश्न पर सूत्रधार कहता है एकमात्र रघुकुलतिलक राम को ही अपनी सूक्तियों का पात्र बनाते हुए कवियों का यह दोष नहीं है, किन्तु यह तो श्रीराघवेन्द्र राम के गुणगणों का ही अवगुण है जिनपर मुग्ध हो सभी कवियों ने एकमात्र राम को ही अपनी सूक्तियों का विश्राम- स्थान बनाया है । महाकाव्य अनु० २१२ में बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि यह शृङ्गारिक वर्णन राक्षसों के विषय में किया गया था। बाद में सीता-राम के सम्बन्ध में भी कवियों ने शृङ्गार-वर्णन किया है, क्योंकि ऋग्वेद के वृषाकपिसूक्त और अपालासूक्त में तथा उर्वशी-पुरूरवासूक्त आदि में देवताओं और मनुष्यों के सम्बन्ध में पर्याप्त शृङ्गार का वर्णन है । ( देखो हमारा भक्तिरसार्णव ) । हर्षवर्धन तथा महाकवि कालिदास का रघुवंश वर्तमान वाल्मीकिरामायण का ही समर्थन करते हैं। कालिदास विक्रमादित्य की सभा के दिव्य रत्नों में से प्रमुख हैं। फलतः विक्रम शती ही उनका

अध्याय संस्कृत ललित साहित्य में रामकथा ३१३ काल है । ई० चौथी शती उनका काल नहीं है । सीता-त्याग, लवण-वध, कुशलव-जन्म, शम्बूक-वध, अयोनिजा सीता का अलौकिक जन्म तथा सीता की अग्नि-परीक्षा भी कालिदास को मान्य थी । अतः उस सम्बन्ध में बुल्के की कल्पनाएँ सर्वथा निस्सार ही हैं । २१४ वाँ अनु० : रावणवध अथवा सेतुबन्ध जो कि बुल्के के अनुसार ५५०-६०० ई० का है। महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में वाल्मीकिकृत युद्धकाण्ड का वर्णन है । २१५ वाँ अनु० : भट्टिकाव्य काव्य होता हुआ भी व्याकरण है । इसके आधार पर व्याकरण का सम्यक् प्रबोध होता है । इसमें वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही रामचरित्र का वर्णन है । इसमें सीता की अग्निपरीक्षा का वर्णन है । यत्र तत्र भेद अकिञ्चित्कर है । जानकीहरण तथा अभिनन्दकृत रामचरित में मूलरूप से वाल्मीकिरामायण का अनुसरण करते हुए भी कतिचित् स्थलों में संकोच-विकास किया गया है। रामायणमञ्जरी, दशावतारचरित, उदारराघव आदि ग्रन्थों में भी लाघव-गौरव तथा संकोच-विकास का आश्रय लिया गया है । जानकीपरिणय १७ वीं ई० श० का माना जाता है । इसमें दशरथ-यज्ञ से परशुराम के तेजोभङ्ग तक की प्रधान घटनाओं का ८ सर्गों में वर्णन है । रामलिङ्गामृत, जानकीरामक्रीड़ाह्निक, राघवोल्लास, रामरहस्य आदि ग्रन्थों में राम के व्यष्टि-समष्टि चरित्रों का क्वचिद्विकास और क्वचित्संकोच किया गया है । राघवोल्लास की रचना बुल्के के अनुसार लन्दन में सुरक्षित है। उसके प्रारम्भिक ३ सर्ग अप्राप्य हैं । शेष नौ सर्गों में १००० छन्द हैं । लिपिक का नाम मानमादि कायस्थ है । लिपिकाल है सन् १६२५ इण्डिया आफिस कैटलाग नं० ३९१५ । रामचरितमानस की भाँति मर्यादित शृङ्गार इस काव्य की विशेषता है । इसमें राम-सीता के पूर्वानुराग का वर्णन करते हुए कहीं भी सीता का नख-शिख वर्णन नहीं किया गया है । कथानक रामजन्म से प्रारंभ होकर विवाह के पश्चात् अयोध्या प्रत्यागमन पर समाप्त हो जाता है । राम का जन्म, उनका सौन्दर्य-वर्णन, उनके चतुर्भुज रूप का दर्शन, संक्षिप्त बाललीला, विश्वामित्र द्वारा रामावतार की व्याख्या, दशरथ की मूर्च्छा, राम द्वारा शरीर की नश्वरता का उपदेश, ताड़का, सुबाहु, मारीच, विश्वामित्र द्वारा राम-नाममहिमा का वर्णन, पाषाणभूता अहल्या का उद्धार, अहल्या द्वारा राम की स्तुति, जनकपुर में आगमन, सीता का पूर्वानुराग, धनुर्भङ्ग एवं कौतुक-लीला ( सीता राम के ललाट पर केसर का तिलक लगाती है ) का वर्णन है । नाटकों के प्रसंग में २२५ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं "दसवीं शताब्दी के पूर्व के नाटकों में केवल उत्तररामचरित और कुन्दमाला में उत्तरकाण्ड की सामग्री का वर्णन किया गया है। दोनों नाटकों को सुखान्त बनाने के लिए सीता के भूमि-प्रवेश की कथा बदल दी गयी है ।।" परन्तु यह परिवर्तन भी मनमानी नहीं हुआ; किन्तु कल्प-भेद से कथा-भेद के ही आधार पर हुआ है । अतएव जैमिनीयाश्वमेध तथा पद्मपुराण में भी वैसा ही वर्णन है । आनन्दरामायण तथा कथासरित्सागर में भी वैसा ही वर्णन है । "कलपभेद हरिचरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥" ( रा० मा० १।३२।४ ) उन्होंने छलितराम और रामानन्द नामक नाटकों की भी चर्चा की है, किन्तु दोनों को अप्राप्य कहा है । उनके अनुसार प्रतिमानाटक, मैथिलीकल्याण, दूताङ्गद, उन्मत्तराघव जैसे नाटकों को छोड़कर अन्य सब राम- कथाविषय से सम्बद्ध नाटक रामाभिषेक पर ही समाप्त हो जाते हैं । ४०

२२६ वें अनु० में "प्रतिमानाटक या अभिषेकनाटक के सम्बन्ध में बुल्के का कहना है कि यह भासकृत न होकर किसी दक्षिणनिवासी अन्य कवि द्वारा निर्मित है एवं कालिदास के बहुत बाद रचा गया है।" किन्तु वास्तव में इसकी गणना भास की कृतियों में ही है। इसमें सीता को लक्ष्मी का अवतार कहा जाना भी स्वाभाविक है। राम-वनवास के समय शत्रुघ्न की उपस्थिति इस नाटक की विशेषता है। राम की अनन्त कथाओं में कोई कथा उक्त प्रकार की भी हो सकती है। जब जैन और बौद्धों ने राम के आदर्श के विरुद्ध भी अपने दृष्टिकोण से कल्पनाएँ की हैं तो तदविरुद्ध कल्पनाओं में कोई न कोई मूल तो हो ही सकता है। इसी तरह दशरथ की मृत्युशय्या पर दशरथ को दिलीप, रघु, अज आदि पूर्वजों का दर्शन होना भी असम्भव नहीं है। प्रतिमा-गृह में अन्य राजाओं के समान दशरथ की मूर्ति देखकर भरत को दशरथ की मृत्यु का अनुमान हो जाना भी सङ्गत ही है। इसी तरह महर्षिशाप से बचाने के लिए वसिष्ठ एवं वामदेव के परामर्श से कैकेयी राम के वनवासी होने में सहायक हुई थी, यह कथन भी असङ्गत नहीं है। अध्यात्मरामायण और रामचरित- मानस में भी सब घटनाएँ पूर्वनियोजित ही थीं, यह स्वीकृत है। जनस्थान में भरत-राम का मिलन और वहाँ अभिषेक की बात भी कल्पान्तरीय कथा हो सकती है। अभिषेकनाटक में सेतुबन्ध के स्थान पर समुद्र विभक्त हो जाता है और सेना समुद्र-तल से ही पार उतरती है, यह कथा भी कल्पान्तरीय है। इसमें राम और लक्ष्मण के मायामय सिर सीता को दिखलाये गये हैं। यह भी कल्पान्तरीय कथा है। उसी का अनुसरण हनुमन्नाटक तथा जावा के प्राचीन रामायण और मलय के सेरीराम में किया जाना सम्भव हो सकता है। "इमां भगवतीं लक्ष्मीं जानीहि जनकात्मजाम् । सा भवन्तमनुप्राप्ता मानुषीं तनुमास्थिता ।। (हनु० ना० ६।२८) अग्नि द्वारा उपर्युक्त कथन सङ्गत है। "सीता ही भगवती लक्ष्मी हैं जो मानुषी तनु धारण कर आप को प्राप्त हुई हैं" वैसा कथन वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण और रामाश्वमेध आदि के अनुकूल ही है। २२८ वें अनु० में बुल्के महावीरचरित और उत्तररामचरित के सम्बन्ध में कहते हैं। काल की कल्पना अन्य ग्रन्थों जैसी ही इनकी भी वास्तविकता से दूर हैं। धनुर्भङ्ग के समय रावण के दूत का उपस्थित रहना सङ्गत ही है। रावण जैसा महान् नीतिज्ञ ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना से उदासीन कैसे हो सकता था। रामचरितमानस के अनुसार रावण और बाणासुर धनुषयज्ञ में आये थे, पर उन्होंने प्रत्यक्षरूप से धनुष उठाने का प्रयत्न नहीं किया। "रावण बाण छुयो नहिं चापा।" (रा० मा० १।२५५।२) कैकेयी का जाली पत्र लेकर शूर्पणखा मन्थरा के रूप में मिथिला पहुँचती है। इस पत्र में कैकेयी वर के बलपर राम का वनवास माँगती है जिसके फलस्वरूप राम भरत को अपनी पादुका देकर मिथिला से ही सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन चले जाते हैं (अङ्क ४)। वस्तुतः कवि अपनी प्रौढ़ोक्तियों द्वारा अपने मुख्य नायक का महत्त्व वर्णन करता है ! श्रीराम इतने राज्यनिरपेक्ष, आप्तकाम, पूर्णकाम और माता-पिता के भक्त थे कि यथाकथञ्चित् पत्रमात्र के आधार पर भी राज्य छोड़कर वन चले गये। यही अंश दिखलाने के उद्देश्य से उसमें यह परिवर्तन हुआ है। माल्यवान् की प्रेरणा से वाली राम को मार्ग में रोकता है और द्वन्द्वयुद्ध में राम के द्वारा मारा जाता है। वैसी कथा यदि कल्पान्तरीय न भी हो तो भी राम को निर्दोष और वालिवध में समर्थ सिद्ध करने की दृष्टि से यह कविकल्पना भी हो सकती है। यह किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि वाली के सामने जो भी युद्ध करने जाता था उसका आधा बल वाली को मिल जाता था। इसी लिए राम ने वृक्ष की ओट में छिपकर उसे मारा, इसके प्रतिवादस्वरूप द्वन्द्वयुद्ध की कल्पना भी सङ्गत हो सकती है।

काव्य तथा नाटकों के लिए यह तो निर्देश है कि उनकी कथावस्तु किसी आर्ष इतिहास पुराण से प्रमाणित होनी चाहिये, तथापि नायक के महत्त्ववर्णनार्थ, कथासौष्ठव-संपादनार्थ और रोचकता-संपादनार्थ किसी सीमा तक कवि-कल्पना का भी अवकाश मान्य है। उत्तररामचरित की कथा तो अधिकांशतः वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार ही है। सीता- वनवास, वन में कुश और लव का जन्म, शम्बूक-वध आदि मूलतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही हैं। तथापि लक्ष्मण का लौट आना, प्रसव-पीड़ा से निराश होकर सीता का गङ्गा में कूद पड़ना, गङ्गा में ही कुश और लव का जन्म होना, पृथ्वी और गङ्गा द्वारा पुत्रसहित सीता को रसातल ले जाकर उनका पोषण करना, कुछ बड़े होने पर दोनों पुत्रों को शिक्षा के लिए वाल्मीकि को सौंपना आदि अंश भी कल्पान्तरीय कथा ही है। राम की सेना से लव और कुश का युद्ध करना उत्तररामचरित की विशेषता नहीं है—यह तो अति प्राचीन पद्मपुराण के पातालखण्ड में विस्तृतरूप से वर्णित है। उत्तररामचरित में वाल्मीकि के आश्रम में राम तथा अयोध्या की जनता के सामने सीता-चरितसम्बन्धी एक वाल्मीकिकृत नाटक के अभिनय का वर्णन है, जिसके कारण समस्त प्रेक्षकगण सीता की निर्दोषता पर विश्वास करते हैं और सीता तथा लव और कुश के साथ राम अयोध्या लौट आते हैं। नाटक के अभिनय के अतिरिक्त अन्य सब कथा पद्मपुराण और जैमिनीयाश्वमेध का ही संक्षिप्त रूप है। अनु० २३० : बुल्के के अनुसार उदात्तराघव नाटक ८वीं श० ई० का है। इसमें सीताहरण का वृत्तान्त नवीन ढंग से अङ्कित किया गया है। राक्षसों द्वारा रामपक्षवालों का रूप धारण कर अनेक प्रकार से वञ्चना करने का प्रयास करना आदि भी इसमें वर्णित है। एक राक्षस हनुमान् का रूप धारण कर सुग्रीव को रावण द्वारा सीता-वध का समाचार देता है। इसपर सुग्रीव अङ्गद को राज्य सौंप कर चिता में प्रवेश करना चाहते हैं। वास्तविक हनुमान् के ठीक समय पर पहुँच जाने से उनकी रक्षा हो जाती है। अन्तिम अङ्क में एक राक्षस वसिष्ठ का शिष्य बनकर भरत को संदेश देता है कि लक्ष्मण युद्ध में मारे गये हैं। एक असुर नारद के रूप में पहुँचकर कहता है कि राम का भी देहान्त हो गया है। एक राक्षस सीता का रूप बनाकर उस कथन का समर्थन करता है। भरत सरयू में डूबकर मरने को प्रस्तुत होते हैं, किन्तु श्रीहनुमान् शुभ समाचार लेकर आते हैं और उनको मरने से रोकते हैं। हनुमान् से यह भी पता लगता है कि एक असुर ने सुमन्त्र का रूप धारण कर राम को समाचार दिया कि भरत मरणासन्न हैं। अनु० २३१ : कुन्दमालाकी कथावस्तु उत्तररामचरित से मिलती-जुलती है, परन्तु उसमें कुश-लव युद्ध का वर्णन नहीं है। चतुर्थ अङ्क में कहा गया है कि वाल्मीकि ने अपने तपोबल से आश्रम की स्त्रियों को अदृश्य होने का वरदान दे दिया था, अतः सीता अदृश्य रहकर राम से मिलती हैं। राम जल में सीता की छाया देखकर विरहजन्य तीव्र ताप से मूर्च्छित हो जाते हैं। अन्तिम अङ्क में कुश और लव रामायण का गान करते हैं; सब अत्यन्त प्रभावित होते हैं। राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। कुश वनदेवी को अपनी माता कहते हैं पर पिता के सम्बन्ध में जानकारी का अभाव बताते हैं। पर लव कहते हैं "हाँ, हमें मालूम है हमारे पिता का नाम 'निरनुक्रोश' है, क्योंकि एक दिन माता ने कुपित होकर कहा था 'निरनुक्रोशतनयौ'। सभा में सीता के शपथ करने पर पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता की निर्दोषिता का साक्ष्य देती हैं। इसपर राम सीता को स्वीकार करते हैं। पृथ्वी अन्तर्धान हो जाती हैं, यह भी पद्मपुराण के अनुसार ही है। अनु० २३२ : मुरारिकृत अनर्घराघव की रचना ९०० ई० की कही जाती है। विश्वामित्र के आगमन से लेकर राम के राज्याभिषेक तक का वृत्तान्त ही उसकी कथा-वस्तु है। इसके तृतीय अङ्क में रावण-दूत शोष्कल मिथिला जाकर रावण की ओर से सीता की माँग करता है। महावीरचरित में भी रावण का एक दूत विश्वामित्र के आश्रम में रावण की ओर से सीता की माँग करता है।

३१६ रामायणमीमांसा दशम अनु० २३३ : राजशेखरकृत बालरामायण । इसकी रचना दसवीं शती ई० में हुई थी । सीता-स्वयंवर से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा का इसमें वर्णन है। प्रहस्त धनुषपरीक्षा करना अस्वीकार करता है तथा सीता के पति को शत्रु घोषित कर लौटता है और परशुराम से सहायता भी माँगता है । इसके अनुसार मिथिला में ही परशुराम मिलते हैं, किन्तु लक्ष्मण ही विष्णु-धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं । इसके अनुसार अयोध्या में दशरथ तथा कैकेयी की अनु- पस्थिति पाकर मायामय शूर्पणखा तथा एक परिचारिका कैकेयी और मन्थरा का रूप धारणकर राम को निर्वासित करने में सफल होते हैं । २३४ अनु० : बुल्के के अनुसार "हनुमन्नाटक की प्रथम रचना दसवीं शती ई० में हुई, परन्तु १४वीं शती तक इसमें प्रक्षेप जुड़ते रहे हैं । फलस्वरूप इसमें भिन्नपाठ प्रचलित हैं । दामोदर मिश्र तथा बंगाल के मधुसूदन का पाठ प्रचलित है । दामोदरमिश्र का पाठ मूलरचना के अत्यधिक निकट और प्राचीन है ।" वस्तुतः प्रसिद्धि के अनुसार यह श्रीहनुमान्जी के द्वारा वर्णित रामकथा है । कहते हैं हनुमान् ने स्वयं राम के साथ रहकर ही बहुत से वृत्तान्तों को प्रत्यक्ष देखा और सुना था । वाल्मीकि ने तो एकान्त में अरण्य में बैठ कर रामायण का निर्माण किया था, अतः आँखों देखी घटनाओं का वर्णन ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है । परन्तु किसी भी महर्षि ने श्रीहनुमान् की इस रामकथा पर अपनी सम्मति नहीं दी और राम के सम्मुख रखने की ही राय सबने दी । राम के सामने आने पर उन्होंने देखा और उसकी प्रशंसा भी की, परन्तु रामचरित्र के सम्बन्ध में वाल्मीकि की ऋतम्भराप्रज्ञाप्रसूत वाल्मीकि- रामायण को ही सर्वाधिक प्रमाण बताया । कहा जाता है कि राम का अभिप्राय जानकर हनुमान् ने पाषाणों पर लिखी अपनी रामकथा को समुद्र में विसर्जित कर दिया । कालान्तर में किसी को उन पाषाणों में से कुछ पाषाण प्राप्त हुए, कुछ नहीं भी मिले, इसी लिए अनेक स्थानों में यह रचना अपूर्ण है । विरोधी प्रमाणान्तर उपलब्ध न होने से ऐसी प्रसिद्धियाँ भी प्रमाण ही मानी जाती हैं । इसके निम्न विषय उल्लेख्य हैं । १. सीता-स्वयंवर :- स्वयंवर में रावण के दूत की उपस्थिति तथा परशुराम का मिथिला में ही आगमन वर्णित है । २. सीता-रामविलास-बुल्के के कथनानुसार इस प्रसङ्ग में शृङ्गार अश्लीलता की सीमा तक पहुँच गया है । पर शृंगार को अश्लीलता समझना उनका भ्रम ही है । वस्तुतः जीवब्रह्म का सम्मिलन और कहीं-कहीं प्रकृति में परमपुरुष द्वारा गर्भाधान का वर्णन गीता तथा वेद जैसे ग्रन्थों में भी विद्यमान है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।” (गी० १४।३ ) इस उक्ति से स्वयं भगवान् कहते हैं "प्रकृति मेरी योनि-पत्नी है, उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ ।" "उसी से सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति होती है ।" ब्रह्मचैतन्य का प्रतिबिम्बरूप गर्भाधान पाकर ही प्रकृति महदादि के क्रम से विश्वप्रपञ्च का निर्माण करती है । यह वस्तुस्थिति है । गंगा में शीतलता और पवित्रता के समान ही परमानन्दघन राम में माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री ही सीता है । सीता और राम में अत्यन्त अभेद है । ३ राम के वन-गमन के समय भरत का अयोध्या में विद्यमान होना भी इसमें वर्णित है तथा अहल्याोद्धार का वृत्तान्त अगस्त्वाश्रम से पञ्चवटी की ओर जाते समय वर्णित किया गया है । सीता के रक्षणार्थ भूमि पर धनुष से रेखा खींचकर राम लक्ष्मण को साथ लेकर मायामृग को मारने जाते हैं। कल्पान्तरीय कथा का आश्रयण कर उक्त वृत्तान्त की भी संगति लगायी ही जा सकती है । धनुष-रेखा की कथा तो प्रायः बहुसम्मत है ही । ४. मृग का शिकार- राम तथा लक्ष्मण मृग का शिकार करने के लिए साथ-साथ जाते हैं। वस्तुतः कवि को विवक्षित यह है कि राम को अपनी धनुषरेखा पर पूर्ण विश्वास था कि संसार में किसी की शक्ति नहीं है जो

अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३१७ रेखा का लङ्घन कर या बाहर से ही सीता को छू सके । इसलिए राम लक्ष्मण को भी लेकर निश्चिन्तता के साथ चले जाते हैं । पर मायावियों से महाशक्तिमान् को भी सावधान रहना चाहिये, क्योंकि उनकी माया के कारण ही स्वेच्छा से ही जानकीजी भिक्षा प्रदान करने के लिए रेखा से बाहर आयीं और उनका हरण हुआ । ५. वालिवध का प्रचार—इसमें भी महावीरचरित के समान है। राम को वाली ललकारता है और द्वन्द्वयुद्ध में राम के द्वारा मारा जाता है । हनुमान् को रुद्रावतार बतलाया गया है । ६. हनुमद्विजय—इसमें सीता हनुमान् को तीन अभिज्ञान देती हैं। चूडामणि, काक की कथा तथा राम का सीता को तिलक लगाने का वृत्तान्त । यह कथा प्रायः प्रसिद्ध ही है । ७. सेतुबन्ध—राम के बाण चलाने का उल्लेख नहीं है । ८. अंगदाधिक्षेपण—अपने पिता के वध के कारण राम से वैर रखकर अंगद रावण को युद्ध में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से रावण का अपमान करते हैं । ९. मन्त्रिसभा—लङ्का की मन्त्रिसभा का वर्णन । १०. रावण पहले राम और लक्ष्मण के मायामय सिर सीता को दिखलाता है । अनन्तर रावण राम का रूप धारण कर तथा अपने दस मायामय मस्तक हाथ में लेकर सीता को ठगने का प्रयत्न करता है । ११. इसमें अंगद द्वारा राक्षसी प्रभञ्जनी के वध का भी उल्लेख है । १२. इन्द्रजित्-वध । १३. लक्ष्मणशक्तिभेद । इसमें लक्ष्मण और रावण के युद्ध के समय नारद हनुमान् के समीप आते हैं और हरिगुण-गान करते हैं । श्रीहनुमान् युद्ध करते हुए भी नारद-कृत हरिगुणगान से आकृष्ट होते हैं । नारद धीरे-धीरे पीछे हटते हैं । इसीसे लक्ष्मण को शक्ति द्वारा आहत करने का अवसर रावण को मिल जाता है । रावण के वैद्य सुषेण द्वारा लक्ष्मण की चिकित्सा का वृत्तान्त भी आता है । १४. राम की विजय वर्णित है । रावणदूत लोहिताक्ष राम के पास आकर रावण की ओर से सन्धि का प्रस्ताव करता है । जामदग्न्य के परशु के लिए रावण सीता को लौटाना चाहता है । राम प्रस्ताव को अस्वीकार करते हैं । रावण-वध के बाद अंगद अपने पिता का बदला लेने के लिए समस्त सेना को ललकारता है जिसपर आकाशवाणी द्वारा कहा जाता है कि कृष्णावतार में वाली व्याध के रूप में कृष्ण से बदला लेगा ? इस तरह किन्हीं अंशों में त्रुटित होने के कारण कहीं कहीं नयी कथाओं के जुड़ जाने से महानाटक में कुछ विभिन्नता आ गयी है । २३५ वाँ अनु० : शक्तिभद्रकृत आश्चर्यचूड़ामणि । यह दक्षिण भारत का नाटक ९वीं शती का माना जाता है । कुछ लोग इसकी इतनी प्राचीनता में सन्देह करते हैं । इसमें शूर्पणखा के आगमन से सीता की अग्निपरीक्षा पर्यन्त की कथा सात अङ्कों में वर्णित है । इसकी विशेषता यह है कि राम और सीता के पास मुनियों से प्राप्त एक अँगूठी और चूड़ामणि है । जिनके प्रभाव से छद्मवेशी राक्षस राम अथवा सीता के स्पर्श से अपने वास्तविक रूप में व्यक्त हो जाता है । इस घटना के कारण ही इस नाटक का नाम आश्चर्यचूड़ामणि है । राम का रूप धारण करनेवाला रावण लक्ष्मण का रूप धारण करनेवाले सारथि की सहायता से सीता का हरण करता है । इतने में शूर्पणखा सीता के रूप में राम से बातचीत करती है तथा मारीच राम के रूप में लक्ष्मण से । आश्चर्यपूर्ण नाटक निर्माण की दृष्टि से उक्त कल्पना कविकृत भी हो सकती है । २३६ वाँ अनु० : राघवानन्द, मायापुष्पक तथा स्वप्नदशानन रामकथा-सम्बन्धी अप्राप्य नाटक भी काव्य-शास्त्रों के अनेक उद्धरणों से विदित होते हैं । क्षीर-स्वामी कृत अभिनवराघव १०वीं शती की रचना है ।

३१८ रामायणमीमांसा दशम इसका उल्लेख हेमचन्द्र के शिष्यों द्वारा हुआ है। रघुविलास और राघवाभ्युदय भी अप्राप्य हैं। यशोवर्मा का रामाभ्युदय ८वीं शती की रचना है। इसमें शूर्पणखा के विरूपीकरण से आरम्भ कर सीता की अग्निपरीक्षा के पश्चात् सुग्रीव तथा विभीषण के अयोध्या के लिए प्रस्थान करने तक की ही कथावस्तु वर्णित है। शारदातनय एक अन्य रामानन्द नाटक का उद्धरण करते हैं। उसमें सीता-हरण के पहले ही विभीषण का परिचय मिलता है। "प्रागेव सीताहरणाद् यद्विभीषणवर्णनम्" (दे० भावप्रकाशन, ८)। छलित्रराम का भी रचयिता अज्ञात है। उसमें रावण-वध के पश्चात् राम के अयोध्या-गमन से प्रारम्भ कर रामाश्वमेध पर्यन्त का वृत्तान्त वर्णित है। इसके अनुसार सीतात्याग का कारण अयोध्या की जनता का अपवाद नहीं है, किन्तु लवण दो राक्षसों को राम के पास भेजता है जो राम के अन्तरङ्ग सखा बन कर उनको सीता के प्रति अपरक्त करते हैं। लवण के इस छल-कपट के कारण नाटक का नाम छलित्रराम रखा गया है। लव-कुश का युद्ध भी मौलिक है। लक्ष्मण लव को कैदी बनाकर उनको राम के दरबार में ले जाते हैं। लव अश्वमेध के मण्डप में सुवर्णमयी सीता को देख कर अपनी माता सीता को पहचानते हैं। इससे राम को पता चलता है कि सीता जीवित है। बुल्के इस अंश को मौलिक मानते हैं; अर्थात् जो नवीन कल्पनाएँ होती हैं उन्हें आधुनिक लोग मौलिक कहते हैं। जो मूल-रहित है वही मौलिक है। कृत्यारावण नाटक में रावण की कृत्या (माया) का वर्णन है। माया-मृग के अतिरिक्त राक्षसी माया का परिचय शूर्पणखा के विभिन्न रूपों से तथा सीता के सामने राम-वध के प्रदर्शन से मिलता है। कथानक का मुख्य परिवर्तन सीता-हरण का एक नवीन रूप है जिसमें सीता लक्ष्मण के प्रति कटु शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं, अपितु शूर्पणखा ही सीता का रूप धारण कर लक्ष्मण की भर्त्सना करती है। छठे अङ्क में 'दारुणिका' राक्षसी को सीता का वध करने का आदेश दिया जाता है। वह सोता को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से उनके सामने मायामय राम का वध करवाती है। अपने स्वामी की हत्या देख कर सीता अग्नि-प्रवेश का निश्चय करती हैं। इस निश्चय का समाचार राम को दिया जाता है। नाट्य-दर्पण में जो सीता-विपत्तिश्रवण का उद्धरण मिलता है वह इस प्रसङ्ग की ओर ही निर्देश करता है। माया अव्यवस्थित होती है, अतः उसके सम्बन्ध के सभी वर्णन सङ्गति- निरपेक्ष ही होते हैं। २३७ वाँ अनु० : जयदेवकृत प्रसन्नराघव १२वीं या १३वीं शताब्दी की रचना है। इसपर मुरारिकृत अनर्घराघव का स्पष्ट प्रभाव है। इसके प्रथम अङ्क में सीता-स्वयंवर में रावण तथा बाणासुर की उपस्थिति और धनुष-संधान का निष्फल प्रयत्न वर्णित है। दूसरे अङ्क में धनुर्भङ्ग के पूर्व राम और सीता का मिथिला के चण्डि- कायतन में मिलना वर्णित है। तुलसीदासजी के रामचरितमानस में भी इन अंशों का वर्णन है। पञ्चम अङ्क में यमुना गङ्गा, गोदावरी और सरयू का मानवीकरण और उनका सागर-तट पर मिल कर अपने भू-भाग से सम्बन्धित राम- कथा का सुनाना भी वर्णित है। वैदिक संस्कृति में "अभिमानिव्यपदेशस्तु" (ब्र० सू० १।१।५) के अनुसार पृथिवी और जल के अधिष्ठाता देवता होते हैं; तदनुसार गङ्गा आदि की भी अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। रसगङ्गाधरकार पण्डित- राज जगन्नाथ को उसी गङ्गा का दर्शन हुआ था। २३८वें अनु० में उल्लाघराघव की रचना १३वीं शती की कही जाती है। इसकी अपूर्ण हस्तलिपि भण्डारकर ईस्टिट्यूट पूना में सुरक्षित है। कैटलाग में इसका नाम रामायणनाटक लिखा गया है। इसमें वाल्मीकि- रामायण के बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड के अन्त तक का वृत्तान्त आठ अङ्कों में प्रस्तुत है। प्रथम अङ्क में राम-सीता-विवाह के पश्चात् मिथिला से प्रस्थान का वर्णन है। इसके बाद कञ्चुकी हरिदत्त परशुराम के तेजोवध की कथा सुनाते हैं। शेष सब कथा वाल्मीकिरामायण की ही है। अनन्तर लवण का एक गुप्तचर मुनि का रूप धारण कर अयोध्या में यह समाचार फैलाता है कि रावण राम और लक्ष्मण का वध कर अयोध्या पर

अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३१९ आक्रमण करने आ रहा है। सेना को बुलाया जाता है। कौशल्या और सुमित्रा अग्नि में प्रवेश की तैयारियाँ करती हैं। लङ्का से सदल राम को लेकर पुष्पक विमान के पहुँचने पर भरत विभीषण पर बाण चलाना चाहते हैं, किन्तु वसिष्ठ उनको रोकते हैं। २३९ वाँ अनु० : जैनकवि हस्तिमल्ल के मैथिलीकल्याण तथा अञ्जनापवनञ्जय १२९० ई० के माने जाते हैं। मैथिलीकल्याण शृङ्गारप्रधान रचना है। अञ्जनापवनञ्जय में अधिकांश विमलसूरि के पउमचरियं का अनुसरण है। प्रथम अङ्कमें अञ्जना के स्वयंवर की तैयारियाँ, द्वितीय अङ्क में स्वयंवर और पवनञ्जय एवं अञ्जना का विवाह तथा युद्ध के लिए पवनञ्जय का प्रस्थान। तृतीय अङ्क में पवनञ्जय का रात्रि के समय अञ्जना से मिलना तथा प्रातः छिपकर युद्ध-क्षेत्र में लौट जाना। चतुर्थ अङ्क में गर्भवती अञ्जना का उसके मायके महेन्द्रपुर भेजा जाना। पञ्चम अङ्क में वरुण की पराजय के बाद पवनञ्जय अञ्जना के विषय में सुनते हैं और उसकी खोज करते हैं। छठे अङ्क में गन्धर्वराज मणिचूड़ के राज्य में हनुमान् का जन्मना। पउमचरियं के अनुसार विवाह के पश्चात् पवनञ्जय २२ वर्ष तक उदासीन रहता है। युद्ध-क्षेत्र में अचानक अञ्जना के प्रति आकर्षित होकर रात के समय छिपकर अञ्जना के पास जाता है। परन्तु हस्तिमल्ल इस अंश को छोड़कर स्वयंवर का वर्णन कर मौलिकता का प्रदर्शन करते हैं। सिद्धान्तदृष्टि से तो मौलिकता का अर्थ निर्मूलता ही है। यद्यपि पउमचरियं भी कल्पनाप्रधान ही है तथापि अपेक्षाकृत वह राम या हनुमान् के चरित्रमूलक हो सकता है। वैदिक वाल्मीकि- रामायण के अनुसार हनुमान् रुद्रावतार होने पर भी एक विशिष्ट वानर थे, परन्तु जैनों ने रामकथा को विकृत कर अपने ढंग से रचनाएँ की हैं। उनके अनुसार हनुमान् आदि वानर वानर न होकर विद्याधर थे। २४० वाँ अनु० : सुभटकृत दूताङ्गद १२वीं शती की रचना है। अङ्गद के दूतत्व का प्रथम दो अङ्कों में वर्णन है। अनन्तर रावण-पराजय और राम के विजयोत्सव का चित्रण है। २४१ वाँ अनु० : भास्करभट्टकृत उन्मत्तरावव १४वीं शती में दुर्वासा के शाप से सीता के मृगरूप में बदल जाने पर राम का सर्वत्र सीता को ढूँढ़ना तथा अगस्त्य की सहायता से पुनः प्राप्त करने का उल्लेख है। बुल्के के अनुसार यह विक्रमोर्वशीयं के चतुर्थ अङ्क का अनुकरण है। २४२ वाँ अनु० : विरूपाक्षकृत उन्मत्तराघव ( १५ वीं ई० शती ) की रचना है। इसमें विप्रलम्भशृङ्गार प्रधान रस है। इसमें वाल्मीकीयरामायण के अनुसार सीताहरण वर्णित है। किन्तु कनकमृग मारने के बाद सीता को न पाकर राम उन्मत्त हो जाते हैं। लक्ष्मण अकेले ही जाकर वानरों की सहायता से रावण को मारकर सीता को राम के सामने उपस्थित करते हैं। श्रीराम की उन्मत्तता जैसी स्थिति तो वाल्मीकि तथा अन्य ग्रन्थों में भी वर्णित है जो कि स्वाभाविक भी है, परन्तु अन्य अंश स्वतन्त्र कवि की कल्पना है। २४३ वाँ अनु० : व्यासमिश्रदेवकृत रामाभ्युदय ( १५ वीं शती ) में लङ्कायुद्ध, सीता की अग्निपरीक्षा, पुष्पक से अयोध्या आगमन तथा अभिषेक वर्णित है। २४४ वाँ अनु० : दक्षिणनिवासी महादेवकृत अद्भुतदर्पण ( १७ वीं शती ) में राम को एक ऐन्द्रजालिक दर्पण द्वारा लङ्का की घटनाएँ दिखायी गयी हैं। उसी काल के रामभद्र दीक्षित के जानकीपरिणय में सीताहरण के उद्देश्य से विराध रामरूप धारण करता है। शूर्पणखा राम को रोकने के उद्देश्य से सीता का रूप धारण करती है। दोनों आश्रम में पहुँचकर एक दूसरे को नहीं पहचानते हैं। फलस्वरूप विराध शूर्पणखा को ले जाता है। अन्त में छद्मवेषी शूर्पणखा रामवध का झूठा समाचार लेकर हनुमान् के पूर्व ही अयोध्या में पहुँच कर भरत और शत्रुघ्न को सूचित करती है। अद्भुत के आस्वादन के लिए रामायण के प्रसिद्ध श्रीराम, श्रीसीता आदि का आश्रयण कर उक्त

३२० रामायणमीमांसा दशम काल्पनिक कथाएँ कल्पनामात्र तो हैं ही, परन्तु उन प्रसङ्गों में श्रीराम और सीता का चिन्तन पुण्यजनक भी हो ही सकता है। स्फुटकाव्य २४५ वाँ अनु० : श्लेषकाव्य का सन्ध्याकरनन्दि ने १२वीं शती में निर्माण किया है। इसमें २२० आर्या छन्दों में समस्त रामकथा की घटनाओं का श्लेषात्मक शब्दों में वर्णन है। उनके साथ ही साथ वङ्गीयराजा रामपाल का चरित्र भी वर्णित है। यह भी कवियों का विनोदमात्र है। राघवपाण्डवीय १२वीं शती की रचना है। इसमें भी श्लेषात्मक शब्दों में रामायण और महाभारत की कथाओं का वर्णन है। हरदत्तसूरिकृत राघवनेषधीय में राम और नल का चरित्र वर्णित है। सङ्कटनाशनस्तोत्र (१८वीं शती) में राम और कृष्ण का वर्णन है। सन्नीतिरामायण १५वीं शती) में प्रत्येक श्लोक के पूर्वार्द्ध में नीति-वाक्य है और उक्तरार्द्ध में रामकथा वर्णित है। सात काण्डों में समस्त रामकथा प्रस्तुत है। यथा- ''धर्मार्थसाधकं कुर्याद् व्यापारं स्वकुलोचितम्। इक्ष्वाकुवंशजोऽरक्षत् क्षोणीं दशरथोऽखिलाम् ॥'' अर्थात् मनुष्य को चाहिये की अपनी कुल-परम्परा के अनुसार धर्म और अर्थ साधक कार्य करे। जैसे इक्ष्वाकुवंशज दशरथ ने अखण्ड भूमण्डल की रक्षा की। यह कार्य उनके धर्म और अर्थ दोनों का साधक था। २४७ वाँ अनु० : सूर्यदेवकृत राम-कृष्णविलोमकाव्य १५४० ई० की रचना ३६ छन्दों में वर्णित है। यह काव्य स्वाभाविक क्रम से राम का वर्णन करता है और विपरीत क्रम से कृष्ण का। यादवराघवीय (१७ वीं शती) में ३०० छन्दों में राम और कृष्ण का पूर्वोक्त क्रम से ही वर्णन है। राघवीययादव ६४ श्लोकों का है; विषय पूर्वोक्त ही है। २४८ वाँ अनु० : कृष्णमोहनकृत रामलीलामृत १२० छन्दों का है। इसमें विश्वामित्र के आगमन से रावण-वध तक की रामकथा का वर्णन है। इनमें पद्मबन्ध, सोपानबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध आदि चित्रालङ्कारों का व्यापक प्रयोग हुआ है। आन्ध्रदेशनिवासी वेङ्कटेशकृत चित्रबन्धरामायण में ६ सर्ग और ६२० छन्द हैं। २४९ वाँ अनु० : रामसम्बन्धी शृङ्गारिकखण्डकाव्य की रचना मेघदूत तथा गीतगोविन्द के अनुकरण पर हुई है—हंससंदेश तथा हंसदूत कहा जाता है वेङ्कटदेशिक वेङ्कटनाथ वेदान्ताचार्य ने १३वीं शती में हंससन्देश लिखकर रामकाव्य के एक नवीन रूप का प्रवर्तन किया है। इसमें हंस द्वारा सीता के समीप ले जाये गये राम के सन्देश का वर्णन है। भ्रमरदूत नैयायिक रुद्रवाचस्पति की रचना है। इसमें राम द्वारा सीता के समीप भ्रमर को भेजने का वर्णन है। कपिदूत में हनुमान् को दूत बनाकर भेजा गया है। कोकिलसन्देश वेङ्कटाचार्यकृत ३०० छन्दों का है। चन्द्रदूत कृष्णचन्द्रतर्कालङ्कार की रचना है (दे० हरप्रसादशास्त्री नोटिसेस भाग २० पृ० १५३)। गीतगोविन्द के अनुकरण पर रामगीतगोविन्द का निर्माण हुआ है। इसमें शृङ्गारात्मक स्थल मर्यादित हैं। इसमें जन्म के पश्चात् राम का अपना विष्णुरूप दिखलाने का उल्लेख है। कैकेयी के दशरथ-रथ का भग्न अक्ष सँभालने का उल्लेख है।

अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३२१ रामचरितमानस के अनुसार राम-विवाह में देवताओं की उपस्थिति तथा जनक द्वारा रामचरण धोने का भी उल्लेख है तथा जयन्त सीता-चरण पर चोंच मारकर भागता है— “शक्रसूनुरगमत् खगाकृतिः”, “विददार पदाङ्गुष्ठम्।” पम्पासर पर नारद-राम-संवाद का भी उल्लेख है। इसी प्रसङ्ग में बुल्के ने गीतराघव, रामविलास, जानकीगीता, सङ्गीतरघुनन्दन, राघवविलास, रामशतक, रामार्याशतक, आर्यारामायण आदि स्फुट काव्यों की भी चर्चा की है। कथासाहित्य २५२ वाँ अनु० : दशकुमारचरित, वासवदत्ता, हर्षचरित, कादम्बरी आदि की आख्यायिकाशैली में विस्तृत रामकथा का वर्णन नहीं हो पाया है, परन्तु गुणाढ्यकृत बृहत्कथा में, जिसकी रचना सम्भवतः प्रथम शती पूर्व हुई थी, रामकथा का वर्णन होने का अनुमान है; क्योंकि उसके रूपान्तर जैनियों के वसुदेवहिण्डि ( ५ वीं शती ) तथा सोमदेवकृत कथासरित्सागर में रामकथा का वर्णन है। वसुदेवहिण्डि ( वसुदेवभ्रमण ) जैन महाराष्ट्री गद्य में बृहत्कथा का रूपान्तर है। इसमें संक्षेप में रामकथा है। यह जैनी रामकथा से प्रभावित होने पर भी गौण परिवर्तनों के साथ वाल्मीकीय कथा ही है। इसमें सीता का जन्म लङ्का में माना गया है। इसमें रावण-जन्म, वंशावली, लङ्का में प्रवास, मन्दोदरी-विवाह एवं दशरथ तथा उनकी सन्तति का उल्लेख है। कौशल्या के पुत्र राम, सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण तथा कैकेयी के पुत्र भरत और शत्रुघ्न एवं रावण मन्दोदरी से उत्पन्न परित्यक्ता पुत्री सीता की जन्मकथा वर्णित है। वह मेनाक की पुत्री बन जाती है। इसमें सीता-स्वयंवर का वर्णन है। अन्य भाइयों के भी विवाह का संकेत इसमें मिलता है। राम के १२ वर्ष के निर्वासन के वर्णन में मन्थरा तथा कैकेयी के दो वरों का उल्लेख है। दशरथ-मरण के बाद भरत राम के पास जाते हैं। उसी अवसर पर कैकेयी पश्चात्ताप करती हुई राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध करती है। शूर्पणखा का विरूपी- करण आदि अन्य सब कथा वाल्मीकि के अनुसार है। बुल्के कहते हैं जैनी रामकथा के अनुसार इसमें लक्ष्मण ही रावण को मारते हैं। महाभारत में भी कुम्भकर्ण का वध लक्ष्मण के ही द्वारा वर्णित है। फिर भी टीकाकार नीलकण्ठ वहाँ लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण को मृतप्राय कहकर वास्तविक कुम्भकर्ण का मरण राम से ही मानते हैं। देवताओं द्वारा लक्ष्मण को आठवाँ वासुदेव घोषित किया जाना जैनी प्रभाव ही है। वानरों तथा राक्षसों को विद्याधर की पदवी प्रदान भी जैनी प्रभाव ही है। इसके अतिरिक्त सुग्रीव का निमन्त्रण स्वीकार कर भरत की सेना युद्ध में भाग लेती है तथा कैकेयी को दिये गये दो वरों के प्रदाने के निमित्त उक्त दो वरों के भिन्न अवसरों की कल्पना की गयी है। प्रथम वर काम-शास्त्र की निपुणता के कारण दिया जाता है। कैकेयी ने सेना का नेतृत्व कर विरोधी राजा को हराकर उनके द्वारा बन्दीकृत राजा को छुड़ाया, इस कारण कैकेयी को दूसरा वरदान मिलता है। यह वसुदेवहिण्डि के लेखक संघदास का मौलिक अंश माना जाता है। २५४ वाँ अनु० : सोमदेव की ११वीं शती की रचना कथासरित्सागर के १४वें लम्बक के १०७ तरङ्गों में वनवास से लेकर रावणवध के बाद अयोध्या आने तक की संक्षिप्त कथा वर्णित है। यह अंश वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है, पर अलंकारवती लम्बक में काञ्चनप्रभा विरह-व्याकुल नरवाहनदत्त को सान्त्वना देती हुई रामकथा का जो वर्णन करती है उसमें प्रारम्भ में विष्णु के अंश राम का निर्वासन, सीताहरण, रावण-वध का संक्षिप्त वर्णन के अनुसार धोबीवृत्तान्त से मिलती-जुलती सीता-त्याग की कथा दी गयी है। शेष वृत्तान्त की विशेषताएँ ये हैं— वाल्मीकि आश्रम में सीता की परीक्षा, जिसमें पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता को टिट्टिभसर के उस पार पहुँचाती है। ४१

३२२ रामायणमीमांसा दशम टिट्टिभसर की कथा यों है—किसी टिट्टिभी के सतीत्व को प्रमाणित करने के लिए लोकपालों ने टिट्टिभ-सरोवर का निर्माण किया था । आश्रम के कुछ ऋषियों के अनुसार उस टिट्टिभ-सरोवर के पास जाकर सीता अपने सतीत्व की शपथ खाकर जल ने प्रवेश करती है । इसपर पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता को अपनी गोद में लेकर सरोवर के उस पार पहुँचाती है । यह देखकर ऋषि लोग सीता के सतीत्व के प्रति विश्वस्त होकर राम को शाप देना चाहते हैं, परन्तु सीता के अनुरोध पर वे वैसा नहीं करते । इसमें लव के जन्म के बाद कुश के अलौकिक जन्म की कथा है । लव और कुश का रामसेना से युद्ध, राम और सीता के मिलन पर कथा की सुखान्त समाप्ति होती है । वस्तुतः प्रामाणिक ऐतिहासिक कथा वाल्मीकिरामायण की ही है। पुराणों तथा संहिताओं की अनेक कथाएँ अनेक भिन्न कल्पानुसारिणी हैं । पर्याप्त कालातिक्रमण के कारण अनेक काल्पनिक कथाएँ भी उनमें जुड़ गयी हैं। बहुत कवियों ने अपनी वाणी पवित्र करने के लिए, बहुतों ने विनोदवशात् एवं बहुतों ने अद्भुत-रस-वर्णन की दृष्टि से विभिन्न कल्पनाएँ की हैं, पर इतनेमात्र से राम की प्रामाणिक कथा कल्पनामात्र नहीं हो जाती है । किन्तु वह परम सत्य एवं महर्षि वाल्मीकि द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा अनुभूत है । २५५ वां अनु० : चम्पूरामायण (११वीं शती) विदर्भ के राजा भोज की कृति है । वह वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य-पाठ के अनुसार है । इसमें भोजकृत ५ काण्ड हैं; छठे युद्धकाण्ड का निर्माण लक्ष्मणभट्ट ने किया है । उत्तररामायणचम्पू की रचना वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार हुई है । २५६ वाँ अनु० : वासुदेव ने (१७वीं शती) रामकथा में ६ काण्डों की संक्षिप्त कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार गद्य में लिखी है । इसमें महाभारत के रामोपाख्यान के अनुसार मन्थरा एक दुन्दुभी नाम की गन्धर्वी का अवतार थी तथा अहल्या के वास्तव में ही पत्थर बन जाने का उल्लेख है । पिटर्सन की संस्कृत हस्तलिपियों की सूची में एक अनन्तभट्टकृत रामकल्पद्रुम का भी नाम मिलता है ।

एकादश अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा द्राविड़ भाषाओं के साहित्य में रामकथा तमिलरामायण २५७ वाँ अनु० : कहा जाता है कम्बरकृतरामायण द्राविड़ भाषा का सबसे प्राचीन काव्यग्रन्थ ( १२ वीं- श० ई० का ) है। इनमें बाल्मीकिरामायण के छहों काण्डों की कथा-वस्तु के साथ अनेक नये वृत्तान्त जोड़े गये हैं। कम्बर के पूर्व ओट्टक्कूतन ने भी तमिल भाषा में रामायण लिखी थी। कम्बर की रामायण सुन कर वे अपना काव्य नष्ट कर रहे थे। कम्बर ने जाकर उत्तर-काव्य को बचाया। तमिलरामायण का उत्तर-काण्ड ओट्टक्कूतन का है। उसमें धोबी के कारण सीता-त्याग की कथा है। इसमें राम और लक्ष्मण के विश्वामित्र के साथ मिथिला में प्रवेश का स्वतन्त्र वर्णन है। विस्तृत मिथिला- वर्णन के पश्चात् इसमें सीता और राम एक दूसरे को देखते हैं और दोनों विरह-व्याकुल होते हैं (बालका० सर्ग १०) । इसके बाद जनक द्वारा राम का स्वागत तथा सीता-स्वयंवर वर्णित है। उसमें सपत्नीक दशरथ की यात्रा का विस्तृत वर्णन है। सीताहरण के वृत्तान्त में रावण सीता को स्पर्श करने के भय से पृथ्वी खोदकर भूमिभाग के साथ-साथ उन्हें ले जाता है ( अरण्यकाण्ड सर्ग ८ ) । युद्धकाण्ड में विभीषण नृसिंहावतार की कथा सुनाकर नारायणावतार राम से युद्ध न करने का रावण से अनुरोध करते हैं ( सर्ग ३ ) । एक राक्षस जनक का रूप धारण कर सीता से अनुरोध करता है कि वे रावण को पतिरूप में स्वीकार कर लें ( सर्ग १६ ) । इन्द्र का विडालरूप धारण करना, इन्द्र तथा अहल्या के प्रति गौतम का शाप, हनुमान् के भूषणों का उल्लेख, लक्ष्मण द्वारा दुन्दुभि के अस्थिकङ्काल का प्रक्षेपण, विभीषण की पुत्री के रूप में त्रिजटा का उल्लेख, मन्दोदरी का सहगमन, केवल लक्ष्मण का नागपाशबन्धन, मायासीता-वध आदि अंशों में वाल्मीकिरामायण से उसमें विभिन्नता है। भक्तिभावना से प्रेरित होकर अनेक रामायणों और संहिताओं के आधार पर वर्णित तथा भावना से साक्षात्कृत अंशों का वर्णन मान्य कृतियों में सम्भव होता है; परन्तु ऐतिहासिक तथ्य की दृष्टि से आर्ष बाल्मीकिरामायण तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का ही अधिक महत्त्व है। तेलुगुरामायण २५८ वाँ अनु० : द्विपदरामायण १३ वीं शती की रचना मानी जाती है। यह बाल्मीकिरामायण के दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार है। इसमें कैकेयी का अपने पति द्वारा अपमानित होना, लङ्का-देवी-वृत्तान्त, रावण-सुग्रीव- युद्ध, अगस्त्य द्वारा राम को सूर्यस्तव का उपदेश, मैनाक, सुरसा, सिंहिका आदि का वर्णन दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार है। रङ्गनाथरामायण में ये सब विद्यमान हैं। उदीच्य पाठ की दशरथ-सागर-मैत्री, रावण-मन्दोदरी-संवाद आदि कथाएँ वर्णित हैं। पश्चिमोत्तर-पाठ के अनुसार कैकेयी के विद्याबल प्राप्त करने की कथा भी है। वाल्मीकिरामायण गौड़ीय पाठ के अनुसार द्विपदरामायण में भरत-हनुमान् का संवाद, इन्द्र द्वारा गौतम ऋषि की तपस्या भङ्ग करने के लिए अहल्या के सतीत्व को भङ्ग करना, जनक का यह कहना कि यज्ञ के समय हल चलाते समय मैंने सीता को एक मञ्जूषा में पाया, लक्ष्मण के द्वारा कुटी के चारों ओर सात रेखाएँ खींची जाने का

वृत्तान्त तथा लक्ष्मण के जागरण के वृत्तान्त में मानवीकरण, समुद्र मन्थन के समय वालि-सुग्रीव द्वारा देवताओं की सहायता तथा तारा की उत्पत्ति, नल द्वारा वर-प्राप्ति, रावण के छत्र-चामरों पर राम द्वारा बाण चलाने का वृत्तान्त, सुलोचना के सहगमन की कथा, रावण की नाभि में अमृत की स्थिति, अयोध्या प्रत्यागमन के समय शिव- प्रतिष्ठा, सेतुभङ्ग आदि का वर्णन है। २५९-२६३ अनु० : उत्तररामायण, निर्वचनोत्तररामायण, भास्कररामायण, मोल्लरामायण, गोपीनाथ- रामायण आदि भी तेलुगु भाषा में रचित रामायण हैं। मलयालम में रामचरितसाहित्य २६४ अनु० : रामचरितम् तथा रामकथप्पाट्टु की रामकथाओं में बाल्मीकिरामायण का अनुसरण है। २६५ अनु० : कण्णश्शरामायण ( १४वीं शती ) वाल्मीकिरामायण का अनुवाद-मात्र है। उनमें अना- वश्यक वृत्तान्त छोड़ दिये हैं। रामायणचम्पू आदि भी १५वीं ई० शती के हैं। २६७ अनु० : अध्यात्मरामायण १५७५ ई० में संस्कृत अध्यात्मरामायण का मलयाली भाषा में अनुवाद- मात्र है। केरलवर्मा रामायण वाल्मीकिरामायण का अनुवाद है। कन्नड़ रामायण २६८ अनु० : ११ वीं ई० शताब्दी से कन्नड़ भाषा में एक विस्तृत जैन रामकथा साहित्य की सृष्टि होने लगी थी। १६वीं शती में तोरवेनिवासी नरहरि ने तोरवेरामायण लिखी है। मैरावण-कालग ( मैरावण का युद्ध ) भी उन्हीं का है। सोलहवीं शताब्दी का जैमिनिभारत कर्नाटक में अत्यन्त लोकप्रिय है। इस कथा में सीता-वनवास का अत्यन्त करुणापूर्ण वर्णन है। इसमें वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ का अनुसरण है। तोरवेरामायण भक्तिभाव से ओत-प्रोत है। इसमें आनन्दरामायण का भी अनुकरण है। इसमें रावण का शिव-धनुष के नीचे दब जाना, इन्द्र की माला के कारण वाली की अजेयता, ब्रह्मा के अनुरोध से हनुमान् का पूंछ बढ़ाना बन्द करना, रावण की दाढ़ी का जलना, अन्ध मुनि के पुत्र का ताण्डव, नाम, अत्रि द्वारा जयन्त को शाप, विष्णुमाया के रूप में मन्थरा का उल्लेख, जाबालि का वन में राम से मिलना, ओषधि-पर्वत का अपने आप अदृश्य हो जाना, विभीषण के स्पर्शमात्र से माया सीता के शव का अदृश्य हो जाना आदि इस रामायण की असाधारण सामग्री हैं। आदिवासियों में प्रचलित रामकथाएँ २७० अनु० : आदिवासियों के साहित्य सुरक्षित न होने से उनमें राम-कथा ढूँढ़ना व्यर्थ है। उनमें से कई जातियों में शबरी की कथा मिलती है। बोंडो जाति में सीता-त्याग की कथा में धोबी का वृत्तान्त विकृत रूप में मिलता है। २७१ अनु० : बिहार और बंगाल की संथाल जाति में निम्नोक्त कथाएँ मिलती हैं। गुरु के आज्ञानुसार आम खाकर दशरथ की पत्नियाँ गर्भवती हुई थीं। कैकेयी के गर्भ से भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ है। रावण- वध के बाद लौटकर राम ने संथालों के यहाँ रह कर एक शिव-मन्दिर बनाया था। उसमें वे सीता के साथ नित्य- प्रति पूजा करने आते थे। सीता की खोज के समय राम ने गिलहरी और बेर को वरदान दिया एवं बगुले को दण्ड दिया। शरच्चन्द्र रायकृत बिर्होर ग्रन्थ ( पृ० ४०५-४२७ ) में विर्होर जाति में प्रचलित रामकथा का वर्णन है। उसमें राम के जन्म से लेकर रावण तथा कुम्भकर्ण के वध तक का वृत्तान्त वर्णित है। इसमें दशरथ की सात पत्नियों का उल्लेख है। इसके अनुसार पहले दशरथ ने विश्वामित्र के साथ भरत और शत्रुघ्न को भेज दिया;