रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३१९ आक्रमण करने आ रहा है। सेना को बुलाया जाता है। कौशल्या और सुमित्रा अग्नि में प्रवेश की तैयारियाँ करती हैं। लङ्का से सदल राम को लेकर पुष्पक विमान के पहुँचने पर भरत विभीषण पर बाण चलाना चाहते हैं, किन्तु वसिष्ठ उनको रोकते हैं। २३९ वाँ अनु० : जैनकवि हस्तिमल्ल के मैथिलीकल्याण तथा अञ्जनापवनञ्जय १२९० ई० के माने जाते हैं। मैथिलीकल्याण शृङ्गारप्रधान रचना है। अञ्जनापवनञ्जय में अधिकांश विमलसूरि के पउमचरियं का अनुसरण है। प्रथम अङ्कमें अञ्जना के स्वयंवर की तैयारियाँ, द्वितीय अङ्क में स्वयंवर और पवनञ्जय एवं अञ्जना का विवाह तथा युद्ध के लिए पवनञ्जय का प्रस्थान। तृतीय अङ्क में पवनञ्जय का रात्रि के समय अञ्जना से मिलना तथा प्रातः छिपकर युद्ध-क्षेत्र में लौट जाना। चतुर्थ अङ्क में गर्भवती अञ्जना का उसके मायके महेन्द्रपुर भेजा जाना। पञ्चम अङ्क में वरुण की पराजय के बाद पवनञ्जय अञ्जना के विषय में सुनते हैं और उसकी खोज करते हैं। छठे अङ्क में गन्धर्वराज मणिचूड़ के राज्य में हनुमान् का जन्मना। पउमचरियं के अनुसार विवाह के पश्चात् पवनञ्जय २२ वर्ष तक उदासीन रहता है। युद्ध-क्षेत्र में अचानक अञ्जना के प्रति आकर्षित होकर रात के समय छिपकर अञ्जना के पास जाता है। परन्तु हस्तिमल्ल इस अंश को छोड़कर स्वयंवर का वर्णन कर मौलिकता का प्रदर्शन करते हैं। सिद्धान्तदृष्टि से तो मौलिकता का अर्थ निर्मूलता ही है। यद्यपि पउमचरियं भी कल्पनाप्रधान ही है तथापि अपेक्षाकृत वह राम या हनुमान् के चरित्रमूलक हो सकता है। वैदिक वाल्मीकि- रामायण के अनुसार हनुमान् रुद्रावतार होने पर भी एक विशिष्ट वानर थे, परन्तु जैनों ने रामकथा को विकृत कर अपने ढंग से रचनाएँ की हैं। उनके अनुसार हनुमान् आदि वानर वानर न होकर विद्याधर थे। २४० वाँ अनु० : सुभटकृत दूताङ्गद १२वीं शती की रचना है। अङ्गद के दूतत्व का प्रथम दो अङ्कों में वर्णन है। अनन्तर रावण-पराजय और राम के विजयोत्सव का चित्रण है। २४१ वाँ अनु० : भास्करभट्टकृत उन्मत्तरावव १४वीं शती में दुर्वासा के शाप से सीता के मृगरूप में बदल जाने पर राम का सर्वत्र सीता को ढूँढ़ना तथा अगस्त्य की सहायता से पुनः प्राप्त करने का उल्लेख है। बुल्के के अनुसार यह विक्रमोर्वशीयं के चतुर्थ अङ्क का अनुकरण है। २४२ वाँ अनु० : विरूपाक्षकृत उन्मत्तराघव ( १५ वीं ई० शती ) की रचना है। इसमें विप्रलम्भशृङ्गार प्रधान रस है। इसमें वाल्मीकीयरामायण के अनुसार सीताहरण वर्णित है। किन्तु कनकमृग मारने के बाद सीता को न पाकर राम उन्मत्त हो जाते हैं। लक्ष्मण अकेले ही जाकर वानरों की सहायता से रावण को मारकर सीता को राम के सामने उपस्थित करते हैं। श्रीराम की उन्मत्तता जैसी स्थिति तो वाल्मीकि तथा अन्य ग्रन्थों में भी वर्णित है जो कि स्वाभाविक भी है, परन्तु अन्य अंश स्वतन्त्र कवि की कल्पना है। २४३ वाँ अनु० : व्यासमिश्रदेवकृत रामाभ्युदय ( १५ वीं शती ) में लङ्कायुद्ध, सीता की अग्निपरीक्षा, पुष्पक से अयोध्या आगमन तथा अभिषेक वर्णित है। २४४ वाँ अनु० : दक्षिणनिवासी महादेवकृत अद्भुतदर्पण ( १७ वीं शती ) में राम को एक ऐन्द्रजालिक दर्पण द्वारा लङ्का की घटनाएँ दिखायी गयी हैं। उसी काल के रामभद्र दीक्षित के जानकीपरिणय में सीताहरण के उद्देश्य से विराध रामरूप धारण करता है। शूर्पणखा राम को रोकने के उद्देश्य से सीता का रूप धारण करती है। दोनों आश्रम में पहुँचकर एक दूसरे को नहीं पहचानते हैं। फलस्वरूप विराध शूर्पणखा को ले जाता है। अन्त में छद्मवेषी शूर्पणखा रामवध का झूठा समाचार लेकर हनुमान् के पूर्व ही अयोध्या में पहुँच कर भरत और शत्रुघ्न को सूचित करती है। अद्भुत के आस्वादन के लिए रामायण के प्रसिद्ध श्रीराम, श्रीसीता आदि का आश्रयण कर उक्त