भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३१८ रामायणमीमांसा दशम इसका उल्लेख हेमचन्द्र के शिष्यों द्वारा हुआ है। रघुविलास और राघवाभ्युदय भी अप्राप्य हैं। यशोवर्मा का रामाभ्युदय ८वीं शती की रचना है। इसमें शूर्पणखा के विरूपीकरण से आरम्भ कर सीता की अग्निपरीक्षा के पश्चात् सुग्रीव तथा विभीषण के अयोध्या के लिए प्रस्थान करने तक की ही कथावस्तु वर्णित है। शारदातनय एक अन्य रामानन्द नाटक का उद्धरण करते हैं। उसमें सीता-हरण के पहले ही विभीषण का परिचय मिलता है। "प्रागेव सीताहरणाद् यद्विभीषणवर्णनम्" (दे० भावप्रकाशन, ८)। छलित्रराम का भी रचयिता अज्ञात है। उसमें रावण-वध के पश्चात् राम के अयोध्या-गमन से प्रारम्भ कर रामाश्वमेध पर्यन्त का वृत्तान्त वर्णित है। इसके अनुसार सीतात्याग का कारण अयोध्या की जनता का अपवाद नहीं है, किन्तु लवण दो राक्षसों को राम के पास भेजता है जो राम के अन्तरङ्ग सखा बन कर उनको सीता के प्रति अपरक्त करते हैं। लवण के इस छल-कपट के कारण नाटक का नाम छलित्रराम रखा गया है। लव-कुश का युद्ध भी मौलिक है। लक्ष्मण लव को कैदी बनाकर उनको राम के दरबार में ले जाते हैं। लव अश्वमेध के मण्डप में सुवर्णमयी सीता को देख कर अपनी माता सीता को पहचानते हैं। इससे राम को पता चलता है कि सीता जीवित है। बुल्के इस अंश को मौलिक मानते हैं; अर्थात् जो नवीन कल्पनाएँ होती हैं उन्हें आधुनिक लोग मौलिक कहते हैं। जो मूल-रहित है वही मौलिक है। कृत्यारावण नाटक में रावण की कृत्या (माया) का वर्णन है। माया-मृग के अतिरिक्त राक्षसी माया का परिचय शूर्पणखा के विभिन्न रूपों से तथा सीता के सामने राम-वध के प्रदर्शन से मिलता है। कथानक का मुख्य परिवर्तन सीता-हरण का एक नवीन रूप है जिसमें सीता लक्ष्मण के प्रति कटु शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं, अपितु शूर्पणखा ही सीता का रूप धारण कर लक्ष्मण की भर्त्सना करती है। छठे अङ्क में 'दारुणिका' राक्षसी को सीता का वध करने का आदेश दिया जाता है। वह सोता को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से उनके सामने मायामय राम का वध करवाती है। अपने स्वामी की हत्या देख कर सीता अग्नि-प्रवेश का निश्चय करती हैं। इस निश्चय का समाचार राम को दिया जाता है। नाट्य-दर्पण में जो सीता-विपत्तिश्रवण का उद्धरण मिलता है वह इस प्रसङ्ग की ओर ही निर्देश करता है। माया अव्यवस्थित होती है, अतः उसके सम्बन्ध के सभी वर्णन सङ्गति- निरपेक्ष ही होते हैं। २३७ वाँ अनु० : जयदेवकृत प्रसन्नराघव १२वीं या १३वीं शताब्दी की रचना है। इसपर मुरारिकृत अनर्घराघव का स्पष्ट प्रभाव है। इसके प्रथम अङ्क में सीता-स्वयंवर में रावण तथा बाणासुर की उपस्थिति और धनुष-संधान का निष्फल प्रयत्न वर्णित है। दूसरे अङ्क में धनुर्भङ्ग के पूर्व राम और सीता का मिथिला के चण्डि- कायतन में मिलना वर्णित है। तुलसीदासजी के रामचरितमानस में भी इन अंशों का वर्णन है। पञ्चम अङ्क में यमुना गङ्गा, गोदावरी और सरयू का मानवीकरण और उनका सागर-तट पर मिल कर अपने भू-भाग से सम्बन्धित राम- कथा का सुनाना भी वर्णित है। वैदिक संस्कृति में "अभिमानिव्यपदेशस्तु" (ब्र० सू० १।१।५) के अनुसार पृथिवी और जल के अधिष्ठाता देवता होते हैं; तदनुसार गङ्गा आदि की भी अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। रसगङ्गाधरकार पण्डित- राज जगन्नाथ को उसी गङ्गा का दर्शन हुआ था। २३८वें अनु० में उल्लाघराघव की रचना १३वीं शती की कही जाती है। इसकी अपूर्ण हस्तलिपि भण्डारकर ईस्टिट्यूट पूना में सुरक्षित है। कैटलाग में इसका नाम रामायणनाटक लिखा गया है। इसमें वाल्मीकि- रामायण के बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड के अन्त तक का वृत्तान्त आठ अङ्कों में प्रस्तुत है। प्रथम अङ्क में राम-सीता-विवाह के पश्चात् मिथिला से प्रस्थान का वर्णन है। इसके बाद कञ्चुकी हरिदत्त परशुराम के तेजोवध की कथा सुनाते हैं। शेष सब कथा वाल्मीकिरामायण की ही है। अनन्तर लवण का एक गुप्तचर मुनि का रूप धारण कर अयोध्या में यह समाचार फैलाता है कि रावण राम और लक्ष्मण का वध कर अयोध्या पर