रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३१७ रेखा का लङ्घन कर या बाहर से ही सीता को छू सके । इसलिए राम लक्ष्मण को भी लेकर निश्चिन्तता के साथ चले जाते हैं । पर मायावियों से महाशक्तिमान् को भी सावधान रहना चाहिये, क्योंकि उनकी माया के कारण ही स्वेच्छा से ही जानकीजी भिक्षा प्रदान करने के लिए रेखा से बाहर आयीं और उनका हरण हुआ । ५. वालिवध का प्रचार—इसमें भी महावीरचरित के समान है। राम को वाली ललकारता है और द्वन्द्वयुद्ध में राम के द्वारा मारा जाता है । हनुमान् को रुद्रावतार बतलाया गया है । ६. हनुमद्विजय—इसमें सीता हनुमान् को तीन अभिज्ञान देती हैं। चूडामणि, काक की कथा तथा राम का सीता को तिलक लगाने का वृत्तान्त । यह कथा प्रायः प्रसिद्ध ही है । ७. सेतुबन्ध—राम के बाण चलाने का उल्लेख नहीं है । ८. अंगदाधिक्षेपण—अपने पिता के वध के कारण राम से वैर रखकर अंगद रावण को युद्ध में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से रावण का अपमान करते हैं । ९. मन्त्रिसभा—लङ्का की मन्त्रिसभा का वर्णन । १०. रावण पहले राम और लक्ष्मण के मायामय सिर सीता को दिखलाता है । अनन्तर रावण राम का रूप धारण कर तथा अपने दस मायामय मस्तक हाथ में लेकर सीता को ठगने का प्रयत्न करता है । ११. इसमें अंगद द्वारा राक्षसी प्रभञ्जनी के वध का भी उल्लेख है । १२. इन्द्रजित्-वध । १३. लक्ष्मणशक्तिभेद । इसमें लक्ष्मण और रावण के युद्ध के समय नारद हनुमान् के समीप आते हैं और हरिगुण-गान करते हैं । श्रीहनुमान् युद्ध करते हुए भी नारद-कृत हरिगुणगान से आकृष्ट होते हैं । नारद धीरे-धीरे पीछे हटते हैं । इसीसे लक्ष्मण को शक्ति द्वारा आहत करने का अवसर रावण को मिल जाता है । रावण के वैद्य सुषेण द्वारा लक्ष्मण की चिकित्सा का वृत्तान्त भी आता है । १४. राम की विजय वर्णित है । रावणदूत लोहिताक्ष राम के पास आकर रावण की ओर से सन्धि का प्रस्ताव करता है । जामदग्न्य के परशु के लिए रावण सीता को लौटाना चाहता है । राम प्रस्ताव को अस्वीकार करते हैं । रावण-वध के बाद अंगद अपने पिता का बदला लेने के लिए समस्त सेना को ललकारता है जिसपर आकाशवाणी द्वारा कहा जाता है कि कृष्णावतार में वाली व्याध के रूप में कृष्ण से बदला लेगा ? इस तरह किन्हीं अंशों में त्रुटित होने के कारण कहीं कहीं नयी कथाओं के जुड़ जाने से महानाटक में कुछ विभिन्नता आ गयी है । २३५ वाँ अनु० : शक्तिभद्रकृत आश्चर्यचूड़ामणि । यह दक्षिण भारत का नाटक ९वीं शती का माना जाता है । कुछ लोग इसकी इतनी प्राचीनता में सन्देह करते हैं । इसमें शूर्पणखा के आगमन से सीता की अग्निपरीक्षा पर्यन्त की कथा सात अङ्कों में वर्णित है । इसकी विशेषता यह है कि राम और सीता के पास मुनियों से प्राप्त एक अँगूठी और चूड़ामणि है । जिनके प्रभाव से छद्मवेशी राक्षस राम अथवा सीता के स्पर्श से अपने वास्तविक रूप में व्यक्त हो जाता है । इस घटना के कारण ही इस नाटक का नाम आश्चर्यचूड़ामणि है । राम का रूप धारण करनेवाला रावण लक्ष्मण का रूप धारण करनेवाले सारथि की सहायता से सीता का हरण करता है । इतने में शूर्पणखा सीता के रूप में राम से बातचीत करती है तथा मारीच राम के रूप में लक्ष्मण से । आश्चर्यपूर्ण नाटक निर्माण की दृष्टि से उक्त कल्पना कविकृत भी हो सकती है । २३६ वाँ अनु० : राघवानन्द, मायापुष्पक तथा स्वप्नदशानन रामकथा-सम्बन्धी अप्राप्य नाटक भी काव्य-शास्त्रों के अनेक उद्धरणों से विदित होते हैं । क्षीर-स्वामी कृत अभिनवराघव १०वीं शती की रचना है ।