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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 393

३१६ रामायणमीमांसा दशम अनु० २३३ : राजशेखरकृत बालरामायण । इसकी रचना दसवीं शती ई० में हुई थी । सीता-स्वयंवर से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा का इसमें वर्णन है। प्रहस्त धनुषपरीक्षा करना अस्वीकार करता है तथा सीता के पति को शत्रु घोषित कर लौटता है और परशुराम से सहायता भी माँगता है । इसके अनुसार मिथिला में ही परशुराम मिलते हैं, किन्तु लक्ष्मण ही विष्णु-धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं । इसके अनुसार अयोध्या में दशरथ तथा कैकेयी की अनु- पस्थिति पाकर मायामय शूर्पणखा तथा एक परिचारिका कैकेयी और मन्थरा का रूप धारणकर राम को निर्वासित करने में सफल होते हैं । २३४ अनु० : बुल्के के अनुसार "हनुमन्नाटक की प्रथम रचना दसवीं शती ई० में हुई, परन्तु १४वीं शती तक इसमें प्रक्षेप जुड़ते रहे हैं । फलस्वरूप इसमें भिन्नपाठ प्रचलित हैं । दामोदर मिश्र तथा बंगाल के मधुसूदन का पाठ प्रचलित है । दामोदरमिश्र का पाठ मूलरचना के अत्यधिक निकट और प्राचीन है ।" वस्तुतः प्रसिद्धि के अनुसार यह श्रीहनुमान्जी के द्वारा वर्णित रामकथा है । कहते हैं हनुमान् ने स्वयं राम के साथ रहकर ही बहुत से वृत्तान्तों को प्रत्यक्ष देखा और सुना था । वाल्मीकि ने तो एकान्त में अरण्य में बैठ कर रामायण का निर्माण किया था, अतः आँखों देखी घटनाओं का वर्णन ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है । परन्तु किसी भी महर्षि ने श्रीहनुमान् की इस रामकथा पर अपनी सम्मति नहीं दी और राम के सम्मुख रखने की ही राय सबने दी । राम के सामने आने पर उन्होंने देखा और उसकी प्रशंसा भी की, परन्तु रामचरित्र के सम्बन्ध में वाल्मीकि की ऋतम्भराप्रज्ञाप्रसूत वाल्मीकि- रामायण को ही सर्वाधिक प्रमाण बताया । कहा जाता है कि राम का अभिप्राय जानकर हनुमान् ने पाषाणों पर लिखी अपनी रामकथा को समुद्र में विसर्जित कर दिया । कालान्तर में किसी को उन पाषाणों में से कुछ पाषाण प्राप्त हुए, कुछ नहीं भी मिले, इसी लिए अनेक स्थानों में यह रचना अपूर्ण है । विरोधी प्रमाणान्तर उपलब्ध न होने से ऐसी प्रसिद्धियाँ भी प्रमाण ही मानी जाती हैं । इसके निम्न विषय उल्लेख्य हैं । १. सीता-स्वयंवर :- स्वयंवर में रावण के दूत की उपस्थिति तथा परशुराम का मिथिला में ही आगमन वर्णित है । २. सीता-रामविलास-बुल्के के कथनानुसार इस प्रसङ्ग में शृङ्गार अश्लीलता की सीमा तक पहुँच गया है । पर शृंगार को अश्लीलता समझना उनका भ्रम ही है । वस्तुतः जीवब्रह्म का सम्मिलन और कहीं-कहीं प्रकृति में परमपुरुष द्वारा गर्भाधान का वर्णन गीता तथा वेद जैसे ग्रन्थों में भी विद्यमान है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।” (गी० १४।३ ) इस उक्ति से स्वयं भगवान् कहते हैं "प्रकृति मेरी योनि-पत्नी है, उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ ।" "उसी से सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति होती है ।" ब्रह्मचैतन्य का प्रतिबिम्बरूप गर्भाधान पाकर ही प्रकृति महदादि के क्रम से विश्वप्रपञ्च का निर्माण करती है । यह वस्तुस्थिति है । गंगा में शीतलता और पवित्रता के समान ही परमानन्दघन राम में माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री ही सीता है । सीता और राम में अत्यन्त अभेद है । ३ राम के वन-गमन के समय भरत का अयोध्या में विद्यमान होना भी इसमें वर्णित है तथा अहल्याोद्धार का वृत्तान्त अगस्त्वाश्रम से पञ्चवटी की ओर जाते समय वर्णित किया गया है । सीता के रक्षणार्थ भूमि पर धनुष से रेखा खींचकर राम लक्ष्मण को साथ लेकर मायामृग को मारने जाते हैं। कल्पान्तरीय कथा का आश्रयण कर उक्त वृत्तान्त की भी संगति लगायी ही जा सकती है । धनुष-रेखा की कथा तो प्रायः बहुसम्मत है ही । ४. मृग का शिकार- राम तथा लक्ष्मण मृग का शिकार करने के लिए साथ-साथ जाते हैं। वस्तुतः कवि को विवक्षित यह है कि राम को अपनी धनुषरेखा पर पूर्ण विश्वास था कि संसार में किसी की शक्ति नहीं है जो