रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाव्य तथा नाटकों के लिए यह तो निर्देश है कि उनकी कथावस्तु किसी आर्ष इतिहास पुराण से प्रमाणित होनी चाहिये, तथापि नायक के महत्त्ववर्णनार्थ, कथासौष्ठव-संपादनार्थ और रोचकता-संपादनार्थ किसी सीमा तक कवि-कल्पना का भी अवकाश मान्य है। उत्तररामचरित की कथा तो अधिकांशतः वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार ही है। सीता- वनवास, वन में कुश और लव का जन्म, शम्बूक-वध आदि मूलतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही हैं। तथापि लक्ष्मण का लौट आना, प्रसव-पीड़ा से निराश होकर सीता का गङ्गा में कूद पड़ना, गङ्गा में ही कुश और लव का जन्म होना, पृथ्वी और गङ्गा द्वारा पुत्रसहित सीता को रसातल ले जाकर उनका पोषण करना, कुछ बड़े होने पर दोनों पुत्रों को शिक्षा के लिए वाल्मीकि को सौंपना आदि अंश भी कल्पान्तरीय कथा ही है। राम की सेना से लव और कुश का युद्ध करना उत्तररामचरित की विशेषता नहीं है—यह तो अति प्राचीन पद्मपुराण के पातालखण्ड में विस्तृतरूप से वर्णित है। उत्तररामचरित में वाल्मीकि के आश्रम में राम तथा अयोध्या की जनता के सामने सीता-चरितसम्बन्धी एक वाल्मीकिकृत नाटक के अभिनय का वर्णन है, जिसके कारण समस्त प्रेक्षकगण सीता की निर्दोषता पर विश्वास करते हैं और सीता तथा लव और कुश के साथ राम अयोध्या लौट आते हैं। नाटक के अभिनय के अतिरिक्त अन्य सब कथा पद्मपुराण और जैमिनीयाश्वमेध का ही संक्षिप्त रूप है। अनु० २३० : बुल्के के अनुसार उदात्तराघव नाटक ८वीं श० ई० का है। इसमें सीताहरण का वृत्तान्त नवीन ढंग से अङ्कित किया गया है। राक्षसों द्वारा रामपक्षवालों का रूप धारण कर अनेक प्रकार से वञ्चना करने का प्रयास करना आदि भी इसमें वर्णित है। एक राक्षस हनुमान् का रूप धारण कर सुग्रीव को रावण द्वारा सीता-वध का समाचार देता है। इसपर सुग्रीव अङ्गद को राज्य सौंप कर चिता में प्रवेश करना चाहते हैं। वास्तविक हनुमान् के ठीक समय पर पहुँच जाने से उनकी रक्षा हो जाती है। अन्तिम अङ्क में एक राक्षस वसिष्ठ का शिष्य बनकर भरत को संदेश देता है कि लक्ष्मण युद्ध में मारे गये हैं। एक असुर नारद के रूप में पहुँचकर कहता है कि राम का भी देहान्त हो गया है। एक राक्षस सीता का रूप बनाकर उस कथन का समर्थन करता है। भरत सरयू में डूबकर मरने को प्रस्तुत होते हैं, किन्तु श्रीहनुमान् शुभ समाचार लेकर आते हैं और उनको मरने से रोकते हैं। हनुमान् से यह भी पता लगता है कि एक असुर ने सुमन्त्र का रूप धारण कर राम को समाचार दिया कि भरत मरणासन्न हैं। अनु० २३१ : कुन्दमालाकी कथावस्तु उत्तररामचरित से मिलती-जुलती है, परन्तु उसमें कुश-लव युद्ध का वर्णन नहीं है। चतुर्थ अङ्क में कहा गया है कि वाल्मीकि ने अपने तपोबल से आश्रम की स्त्रियों को अदृश्य होने का वरदान दे दिया था, अतः सीता अदृश्य रहकर राम से मिलती हैं। राम जल में सीता की छाया देखकर विरहजन्य तीव्र ताप से मूर्च्छित हो जाते हैं। अन्तिम अङ्क में कुश और लव रामायण का गान करते हैं; सब अत्यन्त प्रभावित होते हैं। राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। कुश वनदेवी को अपनी माता कहते हैं पर पिता के सम्बन्ध में जानकारी का अभाव बताते हैं। पर लव कहते हैं "हाँ, हमें मालूम है हमारे पिता का नाम 'निरनुक्रोश' है, क्योंकि एक दिन माता ने कुपित होकर कहा था 'निरनुक्रोशतनयौ'। सभा में सीता के शपथ करने पर पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता की निर्दोषिता का साक्ष्य देती हैं। इसपर राम सीता को स्वीकार करते हैं। पृथ्वी अन्तर्धान हो जाती हैं, यह भी पद्मपुराण के अनुसार ही है। अनु० २३२ : मुरारिकृत अनर्घराघव की रचना ९०० ई० की कही जाती है। विश्वामित्र के आगमन से लेकर राम के राज्याभिषेक तक का वृत्तान्त ही उसकी कथा-वस्तु है। इसके तृतीय अङ्क में रावण-दूत शोष्कल मिथिला जाकर रावण की ओर से सीता की माँग करता है। महावीरचरित में भी रावण का एक दूत विश्वामित्र के आश्रम में रावण की ओर से सीता की माँग करता है।