भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२२६ वें अनु० में "प्रतिमानाटक या अभिषेकनाटक के सम्बन्ध में बुल्के का कहना है कि यह भासकृत न होकर किसी दक्षिणनिवासी अन्य कवि द्वारा निर्मित है एवं कालिदास के बहुत बाद रचा गया है।" किन्तु वास्तव में इसकी गणना भास की कृतियों में ही है। इसमें सीता को लक्ष्मी का अवतार कहा जाना भी स्वाभाविक है। राम-वनवास के समय शत्रुघ्न की उपस्थिति इस नाटक की विशेषता है। राम की अनन्त कथाओं में कोई कथा उक्त प्रकार की भी हो सकती है। जब जैन और बौद्धों ने राम के आदर्श के विरुद्ध भी अपने दृष्टिकोण से कल्पनाएँ की हैं तो तदविरुद्ध कल्पनाओं में कोई न कोई मूल तो हो ही सकता है। इसी तरह दशरथ की मृत्युशय्या पर दशरथ को दिलीप, रघु, अज आदि पूर्वजों का दर्शन होना भी असम्भव नहीं है। प्रतिमा-गृह में अन्य राजाओं के समान दशरथ की मूर्ति देखकर भरत को दशरथ की मृत्यु का अनुमान हो जाना भी सङ्गत ही है। इसी तरह महर्षिशाप से बचाने के लिए वसिष्ठ एवं वामदेव के परामर्श से कैकेयी राम के वनवासी होने में सहायक हुई थी, यह कथन भी असङ्गत नहीं है। अध्यात्मरामायण और रामचरित- मानस में भी सब घटनाएँ पूर्वनियोजित ही थीं, यह स्वीकृत है। जनस्थान में भरत-राम का मिलन और वहाँ अभिषेक की बात भी कल्पान्तरीय कथा हो सकती है। अभिषेकनाटक में सेतुबन्ध के स्थान पर समुद्र विभक्त हो जाता है और सेना समुद्र-तल से ही पार उतरती है, यह कथा भी कल्पान्तरीय है। इसमें राम और लक्ष्मण के मायामय सिर सीता को दिखलाये गये हैं। यह भी कल्पान्तरीय कथा है। उसी का अनुसरण हनुमन्नाटक तथा जावा के प्राचीन रामायण और मलय के सेरीराम में किया जाना सम्भव हो सकता है। "इमां भगवतीं लक्ष्मीं जानीहि जनकात्मजाम् । सा भवन्तमनुप्राप्ता मानुषीं तनुमास्थिता ।। (हनु० ना० ६।२८) अग्नि द्वारा उपर्युक्त कथन सङ्गत है। "सीता ही भगवती लक्ष्मी हैं जो मानुषी तनु धारण कर आप को प्राप्त हुई हैं" वैसा कथन वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण और रामाश्वमेध आदि के अनुकूल ही है। २२८ वें अनु० में बुल्के महावीरचरित और उत्तररामचरित के सम्बन्ध में कहते हैं। काल की कल्पना अन्य ग्रन्थों जैसी ही इनकी भी वास्तविकता से दूर हैं। धनुर्भङ्ग के समय रावण के दूत का उपस्थित रहना सङ्गत ही है। रावण जैसा महान् नीतिज्ञ ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना से उदासीन कैसे हो सकता था। रामचरितमानस के अनुसार रावण और बाणासुर धनुषयज्ञ में आये थे, पर उन्होंने प्रत्यक्षरूप से धनुष उठाने का प्रयत्न नहीं किया। "रावण बाण छुयो नहिं चापा।" (रा० मा० १।२५५।२) कैकेयी का जाली पत्र लेकर शूर्पणखा मन्थरा के रूप में मिथिला पहुँचती है। इस पत्र में कैकेयी वर के बलपर राम का वनवास माँगती है जिसके फलस्वरूप राम भरत को अपनी पादुका देकर मिथिला से ही सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन चले जाते हैं (अङ्क ४)। वस्तुतः कवि अपनी प्रौढ़ोक्तियों द्वारा अपने मुख्य नायक का महत्त्व वर्णन करता है ! श्रीराम इतने राज्यनिरपेक्ष, आप्तकाम, पूर्णकाम और माता-पिता के भक्त थे कि यथाकथञ्चित् पत्रमात्र के आधार पर भी राज्य छोड़कर वन चले गये। यही अंश दिखलाने के उद्देश्य से उसमें यह परिवर्तन हुआ है। माल्यवान् की प्रेरणा से वाली राम को मार्ग में रोकता है और द्वन्द्वयुद्ध में राम के द्वारा मारा जाता है। वैसी कथा यदि कल्पान्तरीय न भी हो तो भी राम को निर्दोष और वालिवध में समर्थ सिद्ध करने की दृष्टि से यह कविकल्पना भी हो सकती है। यह किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि वाली के सामने जो भी युद्ध करने जाता था उसका आधा बल वाली को मिल जाता था। इसी लिए राम ने वृक्ष की ओट में छिपकर उसे मारा, इसके प्रतिवादस्वरूप द्वन्द्वयुद्ध की कल्पना भी सङ्गत हो सकती है।