भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

अध्याय संस्कृत ललित साहित्य में रामकथा ३१३ काल है । ई० चौथी शती उनका काल नहीं है । सीता-त्याग, लवण-वध, कुशलव-जन्म, शम्बूक-वध, अयोनिजा सीता का अलौकिक जन्म तथा सीता की अग्नि-परीक्षा भी कालिदास को मान्य थी । अतः उस सम्बन्ध में बुल्के की कल्पनाएँ सर्वथा निस्सार ही हैं । २१४ वाँ अनु० : रावणवध अथवा सेतुबन्ध जो कि बुल्के के अनुसार ५५०-६०० ई० का है। महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में वाल्मीकिकृत युद्धकाण्ड का वर्णन है । २१५ वाँ अनु० : भट्टिकाव्य काव्य होता हुआ भी व्याकरण है । इसके आधार पर व्याकरण का सम्यक् प्रबोध होता है । इसमें वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही रामचरित्र का वर्णन है । इसमें सीता की अग्निपरीक्षा का वर्णन है । यत्र तत्र भेद अकिञ्चित्कर है । जानकीहरण तथा अभिनन्दकृत रामचरित में मूलरूप से वाल्मीकिरामायण का अनुसरण करते हुए भी कतिचित् स्थलों में संकोच-विकास किया गया है। रामायणमञ्जरी, दशावतारचरित, उदारराघव आदि ग्रन्थों में भी लाघव-गौरव तथा संकोच-विकास का आश्रय लिया गया है । जानकीपरिणय १७ वीं ई० श० का माना जाता है । इसमें दशरथ-यज्ञ से परशुराम के तेजोभङ्ग तक की प्रधान घटनाओं का ८ सर्गों में वर्णन है । रामलिङ्गामृत, जानकीरामक्रीड़ाह्निक, राघवोल्लास, रामरहस्य आदि ग्रन्थों में राम के व्यष्टि-समष्टि चरित्रों का क्वचिद्विकास और क्वचित्संकोच किया गया है । राघवोल्लास की रचना बुल्के के अनुसार लन्दन में सुरक्षित है। उसके प्रारम्भिक ३ सर्ग अप्राप्य हैं । शेष नौ सर्गों में १००० छन्द हैं । लिपिक का नाम मानमादि कायस्थ है । लिपिकाल है सन् १६२५ इण्डिया आफिस कैटलाग नं० ३९१५ । रामचरितमानस की भाँति मर्यादित शृङ्गार इस काव्य की विशेषता है । इसमें राम-सीता के पूर्वानुराग का वर्णन करते हुए कहीं भी सीता का नख-शिख वर्णन नहीं किया गया है । कथानक रामजन्म से प्रारंभ होकर विवाह के पश्चात् अयोध्या प्रत्यागमन पर समाप्त हो जाता है । राम का जन्म, उनका सौन्दर्य-वर्णन, उनके चतुर्भुज रूप का दर्शन, संक्षिप्त बाललीला, विश्वामित्र द्वारा रामावतार की व्याख्या, दशरथ की मूर्च्छा, राम द्वारा शरीर की नश्वरता का उपदेश, ताड़का, सुबाहु, मारीच, विश्वामित्र द्वारा राम-नाममहिमा का वर्णन, पाषाणभूता अहल्या का उद्धार, अहल्या द्वारा राम की स्तुति, जनकपुर में आगमन, सीता का पूर्वानुराग, धनुर्भङ्ग एवं कौतुक-लीला ( सीता राम के ललाट पर केसर का तिलक लगाती है ) का वर्णन है । नाटकों के प्रसंग में २२५ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं "दसवीं शताब्दी के पूर्व के नाटकों में केवल उत्तररामचरित और कुन्दमाला में उत्तरकाण्ड की सामग्री का वर्णन किया गया है। दोनों नाटकों को सुखान्त बनाने के लिए सीता के भूमि-प्रवेश की कथा बदल दी गयी है ।।" परन्तु यह परिवर्तन भी मनमानी नहीं हुआ; किन्तु कल्प-भेद से कथा-भेद के ही आधार पर हुआ है । अतएव जैमिनीयाश्वमेध तथा पद्मपुराण में भी वैसा ही वर्णन है । आनन्दरामायण तथा कथासरित्सागर में भी वैसा ही वर्णन है । "कलपभेद हरिचरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥" ( रा० मा० १।३२।४ ) उन्होंने छलितराम और रामानन्द नामक नाटकों की भी चर्चा की है, किन्तु दोनों को अप्राप्य कहा है । उनके अनुसार प्रतिमानाटक, मैथिलीकल्याण, दूताङ्गद, उन्मत्तराघव जैसे नाटकों को छोड़कर अन्य सब राम- कथाविषय से सम्बद्ध नाटक रामाभिषेक पर ही समाप्त हो जाते हैं । ४०