रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशम अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा २११वें अनु० में बुल्के कहते हैं, प्रचलित वाल्मीकिरामायण के विषय में कहा गया है कि यह कवियों का आधार सिद्ध होगा । “परं कवीनामाधारम् ।” ( वा० रा० १।४।२७ ) वस्तुस्थिति तो यही है । परन्तु बुल्के तो पूरे बालकाण्ड को प्रक्षिप्त ही मानते हैं । उसी के अनुसार कहा जा सकता है—रामायण ही कवियों एवं सभी काव्यों का आधार है । बृहद्धर्मपुराण में ठीक ही लिखा है— ' रामायणमहाकाव्यमादौ वाल्मीकिना कृतम् । तन्मूलं सर्वकाव्यानामितिहासपुराणयोः ॥ संहितानाञ्च सर्वासां मूलं रामायणं मतम् । तदेवादर्शमाराध्य वेदव्यासो हरेः कला ।। चक्रे भारताख्यामितिहासं पुरातनम् ।" ( बृह० पु० पूर्वार्ध २५।२८,२९ ) वाल्मीकि द्वारा कृत रामायण सभी काव्यों तथा इतिहास-पुराणों का आधार है। वही सभी संहिताओं का मूल है। उसी आदर्श की आराधना करके भगवान् हरि की कला वेदव्यास ने महाभारत आख्यानमय इतिहास का निर्माण किया है। ब्रह्मप्रेरिता सरस्वती ही शोकापनोदनार्थं महर्षि के मुख से “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।” इत्यादि श्लोक के रूप में प्रकट हुई थी । 'प्रसन्नराघवम्' की प्रस्तावना में नट सूत्रधार से पूछता है उसके उत्तर में सूत्रधार की निम्नोक्ति भी ठीक ही है । “स्वसूक्तीनां पात्रं रघुतिलकमेकं कलयतां कवीनां को दोषः स तु गुणगणानामवगुणः । यदेतैर्निःशेषैरपरगुणलुब्धैरिव जगत्यसावेकश्चक्रे सततसुखसंवासवसतिः ॥” सब कवि क्यों रामचन्द्र का ही पुनः-पुनः वर्णन करते हैं ? नट के इस प्रश्न पर सूत्रधार कहता है एकमात्र रघुकुलतिलक राम को ही अपनी सूक्तियों का पात्र बनाते हुए कवियों का यह दोष नहीं है, किन्तु यह तो श्रीराघवेन्द्र राम के गुणगणों का ही अवगुण है जिनपर मुग्ध हो सभी कवियों ने एकमात्र राम को ही अपनी सूक्तियों का विश्राम- स्थान बनाया है । महाकाव्य अनु० २१२ में बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि यह शृङ्गारिक वर्णन राक्षसों के विषय में किया गया था। बाद में सीता-राम के सम्बन्ध में भी कवियों ने शृङ्गार-वर्णन किया है, क्योंकि ऋग्वेद के वृषाकपिसूक्त और अपालासूक्त में तथा उर्वशी-पुरूरवासूक्त आदि में देवताओं और मनुष्यों के सम्बन्ध में पर्याप्त शृङ्गार का वर्णन है । ( देखो हमारा भक्तिरसार्णव ) । हर्षवर्धन तथा महाकवि कालिदास का रघुवंश वर्तमान वाल्मीकिरामायण का ही समर्थन करते हैं। कालिदास विक्रमादित्य की सभा के दिव्य रत्नों में से प्रमुख हैं। फलतः विक्रम शती ही उनका