रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० रामायणमीमांसा दशम काल्पनिक कथाएँ कल्पनामात्र तो हैं ही, परन्तु उन प्रसङ्गों में श्रीराम और सीता का चिन्तन पुण्यजनक भी हो ही सकता है। स्फुटकाव्य २४५ वाँ अनु० : श्लेषकाव्य का सन्ध्याकरनन्दि ने १२वीं शती में निर्माण किया है। इसमें २२० आर्या छन्दों में समस्त रामकथा की घटनाओं का श्लेषात्मक शब्दों में वर्णन है। उनके साथ ही साथ वङ्गीयराजा रामपाल का चरित्र भी वर्णित है। यह भी कवियों का विनोदमात्र है। राघवपाण्डवीय १२वीं शती की रचना है। इसमें भी श्लेषात्मक शब्दों में रामायण और महाभारत की कथाओं का वर्णन है। हरदत्तसूरिकृत राघवनेषधीय में राम और नल का चरित्र वर्णित है। सङ्कटनाशनस्तोत्र (१८वीं शती) में राम और कृष्ण का वर्णन है। सन्नीतिरामायण १५वीं शती) में प्रत्येक श्लोक के पूर्वार्द्ध में नीति-वाक्य है और उक्तरार्द्ध में रामकथा वर्णित है। सात काण्डों में समस्त रामकथा प्रस्तुत है। यथा- ''धर्मार्थसाधकं कुर्याद् व्यापारं स्वकुलोचितम्। इक्ष्वाकुवंशजोऽरक्षत् क्षोणीं दशरथोऽखिलाम् ॥'' अर्थात् मनुष्य को चाहिये की अपनी कुल-परम्परा के अनुसार धर्म और अर्थ साधक कार्य करे। जैसे इक्ष्वाकुवंशज दशरथ ने अखण्ड भूमण्डल की रक्षा की। यह कार्य उनके धर्म और अर्थ दोनों का साधक था। २४७ वाँ अनु० : सूर्यदेवकृत राम-कृष्णविलोमकाव्य १५४० ई० की रचना ३६ छन्दों में वर्णित है। यह काव्य स्वाभाविक क्रम से राम का वर्णन करता है और विपरीत क्रम से कृष्ण का। यादवराघवीय (१७ वीं शती) में ३०० छन्दों में राम और कृष्ण का पूर्वोक्त क्रम से ही वर्णन है। राघवीययादव ६४ श्लोकों का है; विषय पूर्वोक्त ही है। २४८ वाँ अनु० : कृष्णमोहनकृत रामलीलामृत १२० छन्दों का है। इसमें विश्वामित्र के आगमन से रावण-वध तक की रामकथा का वर्णन है। इनमें पद्मबन्ध, सोपानबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध आदि चित्रालङ्कारों का व्यापक प्रयोग हुआ है। आन्ध्रदेशनिवासी वेङ्कटेशकृत चित्रबन्धरामायण में ६ सर्ग और ६२० छन्द हैं। २४९ वाँ अनु० : रामसम्बन्धी शृङ्गारिकखण्डकाव्य की रचना मेघदूत तथा गीतगोविन्द के अनुकरण पर हुई है—हंससंदेश तथा हंसदूत कहा जाता है वेङ्कटदेशिक वेङ्कटनाथ वेदान्ताचार्य ने १३वीं शती में हंससन्देश लिखकर रामकाव्य के एक नवीन रूप का प्रवर्तन किया है। इसमें हंस द्वारा सीता के समीप ले जाये गये राम के सन्देश का वर्णन है। भ्रमरदूत नैयायिक रुद्रवाचस्पति की रचना है। इसमें राम द्वारा सीता के समीप भ्रमर को भेजने का वर्णन है। कपिदूत में हनुमान् को दूत बनाकर भेजा गया है। कोकिलसन्देश वेङ्कटाचार्यकृत ३०० छन्दों का है। चन्द्रदूत कृष्णचन्द्रतर्कालङ्कार की रचना है (दे० हरप्रसादशास्त्री नोटिसेस भाग २० पृ० १५३)। गीतगोविन्द के अनुकरण पर रामगीतगोविन्द का निर्माण हुआ है। इसमें शृङ्गारात्मक स्थल मर्यादित हैं। इसमें जन्म के पश्चात् राम का अपना विष्णुरूप दिखलाने का उल्लेख है। कैकेयी के दशरथ-रथ का भग्न अक्ष सँभालने का उल्लेख है।