भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में रामकथा ३२१ रामचरितमानस के अनुसार राम-विवाह में देवताओं की उपस्थिति तथा जनक द्वारा रामचरण धोने का भी उल्लेख है तथा जयन्त सीता-चरण पर चोंच मारकर भागता है— “शक्रसूनुरगमत् खगाकृतिः”, “विददार पदाङ्गुष्ठम्।” पम्पासर पर नारद-राम-संवाद का भी उल्लेख है। इसी प्रसङ्ग में बुल्के ने गीतराघव, रामविलास, जानकीगीता, सङ्गीतरघुनन्दन, राघवविलास, रामशतक, रामार्याशतक, आर्यारामायण आदि स्फुट काव्यों की भी चर्चा की है। कथासाहित्य २५२ वाँ अनु० : दशकुमारचरित, वासवदत्ता, हर्षचरित, कादम्बरी आदि की आख्यायिकाशैली में विस्तृत रामकथा का वर्णन नहीं हो पाया है, परन्तु गुणाढ्यकृत बृहत्कथा में, जिसकी रचना सम्भवतः प्रथम शती पूर्व हुई थी, रामकथा का वर्णन होने का अनुमान है; क्योंकि उसके रूपान्तर जैनियों के वसुदेवहिण्डि ( ५ वीं शती ) तथा सोमदेवकृत कथासरित्सागर में रामकथा का वर्णन है। वसुदेवहिण्डि ( वसुदेवभ्रमण ) जैन महाराष्ट्री गद्य में बृहत्कथा का रूपान्तर है। इसमें संक्षेप में रामकथा है। यह जैनी रामकथा से प्रभावित होने पर भी गौण परिवर्तनों के साथ वाल्मीकीय कथा ही है। इसमें सीता का जन्म लङ्का में माना गया है। इसमें रावण-जन्म, वंशावली, लङ्का में प्रवास, मन्दोदरी-विवाह एवं दशरथ तथा उनकी सन्तति का उल्लेख है। कौशल्या के पुत्र राम, सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण तथा कैकेयी के पुत्र भरत और शत्रुघ्न एवं रावण मन्दोदरी से उत्पन्न परित्यक्ता पुत्री सीता की जन्मकथा वर्णित है। वह मेनाक की पुत्री बन जाती है। इसमें सीता-स्वयंवर का वर्णन है। अन्य भाइयों के भी विवाह का संकेत इसमें मिलता है। राम के १२ वर्ष के निर्वासन के वर्णन में मन्थरा तथा कैकेयी के दो वरों का उल्लेख है। दशरथ-मरण के बाद भरत राम के पास जाते हैं। उसी अवसर पर कैकेयी पश्चात्ताप करती हुई राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध करती है। शूर्पणखा का विरूपी- करण आदि अन्य सब कथा वाल्मीकि के अनुसार है। बुल्के कहते हैं जैनी रामकथा के अनुसार इसमें लक्ष्मण ही रावण को मारते हैं। महाभारत में भी कुम्भकर्ण का वध लक्ष्मण के ही द्वारा वर्णित है। फिर भी टीकाकार नीलकण्ठ वहाँ लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण को मृतप्राय कहकर वास्तविक कुम्भकर्ण का मरण राम से ही मानते हैं। देवताओं द्वारा लक्ष्मण को आठवाँ वासुदेव घोषित किया जाना जैनी प्रभाव ही है। वानरों तथा राक्षसों को विद्याधर की पदवी प्रदान भी जैनी प्रभाव ही है। इसके अतिरिक्त सुग्रीव का निमन्त्रण स्वीकार कर भरत की सेना युद्ध में भाग लेती है तथा कैकेयी को दिये गये दो वरों के प्रदाने के निमित्त उक्त दो वरों के भिन्न अवसरों की कल्पना की गयी है। प्रथम वर काम-शास्त्र की निपुणता के कारण दिया जाता है। कैकेयी ने सेना का नेतृत्व कर विरोधी राजा को हराकर उनके द्वारा बन्दीकृत राजा को छुड़ाया, इस कारण कैकेयी को दूसरा वरदान मिलता है। यह वसुदेवहिण्डि के लेखक संघदास का मौलिक अंश माना जाता है। २५४ वाँ अनु० : सोमदेव की ११वीं शती की रचना कथासरित्सागर के १४वें लम्बक के १०७ तरङ्गों में वनवास से लेकर रावणवध के बाद अयोध्या आने तक की संक्षिप्त कथा वर्णित है। यह अंश वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है, पर अलंकारवती लम्बक में काञ्चनप्रभा विरह-व्याकुल नरवाहनदत्त को सान्त्वना देती हुई रामकथा का जो वर्णन करती है उसमें प्रारम्भ में विष्णु के अंश राम का निर्वासन, सीताहरण, रावण-वध का संक्षिप्त वर्णन के अनुसार धोबीवृत्तान्त से मिलती-जुलती सीता-त्याग की कथा दी गयी है। शेष वृत्तान्त की विशेषताएँ ये हैं— वाल्मीकि आश्रम में सीता की परीक्षा, जिसमें पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता को टिट्टिभसर के उस पार पहुँचाती है। ४१